छत्तीसगढ़ की लेखिका और कवयित्री डॉ ममता तिवारी मृदुला से राजीव कुमार झा की बातचीत

साहित्य:साक्षात्कार

 

1. साहित्य साधिका के रूप में आपका परिचय, परिवार व शिक्षा*

मेरा जन्म छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के ग्राम लाटा के मालगुजार परिवार में हुआ। मेरे पिता स्व. श्री केशव प्रसाद दुबे शिक्षक थे और माता श्रीमती लक्ष्मी देवी गृहिणी। मैं तीन भाइयों के बीच एकमात्र बहन हूँ।

प्राथमिक शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई बिलासपुर में ही पूर्ण हुई। हमारे घर का वातावरण अत्यंत पुस्तक-प्रेमी था – घर एक छोटे पुस्तकालय जैसा प्रतीत होता था। प्रतिमाह विभिन्न विषयों की पत्रिकाएँ नियमित रूप से आती थीं। पढ़ने-लिखने का बीज वहीं अंकुरित हुआ।

विवाह के पश्चात गृहस्थी और बच्चों के प्रति कर्तव्य-निर्वहन करते हुए, मैंने शिक्षिका पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। जब बच्चे अपनी नौकरी व गृहस्थी में व्यवस्थित हो गए, तब मैंने मोबाइल को डायरी के रूप में उपयोग कर लेखन की पुनः शुरुआत की। छंद-शास्त्र का ज्ञान मैंने गूगल और व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से स्वाध्याय द्वारा अर्जित किया। बाकी मैंने अपनी साहित्यिक उपलब्धि अपने परिचय में आपको दी ही है।

2. जयशंकर प्रसाद कृत ‘आँसू’ का छत्तीसगढ़ी अनुवाद – भाव एवं शिल्प सौंदर्य

जी हाँ, ‘आँसू’ छायावादी युग की एक जगत-प्रसिद्ध अनुपम काव्यकृति है। इसमें विरह, समर्पण, भावनाओं और आत्मिक करुणा की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। ‘आँसू’ खड़ी हिंदी में मोतियों जैसे अनमोल शब्दों को चुनकर ‘मानव छंद’ में रचित खंडकाव्य है। इस कृति की अपार लोकप्रियता के कारण आज इस छंद को हम ‘आँसू छंद’ के नाम से भी जानते हैं।

‘आँसू’ का प्रत्येक चरण भावगम्य एवं माधुर्य का सागर है – जिसमें उतरकर पाठक किनारे लगने की अभिलाषा ही त्याग देता है। इसका शब्द-शब्द जितना सहज-बोधगम्य है, अर्थ में उतना ही गूढ़ है, मानो गूढ़ता वस्तु हो और सरलता उसकी छाया। मैंने इसी ‘आँसू छंद’ में छत्तीसगढ़ी भाषा में इसके भाव एवं भाषानुवाद का विनम्र प्रयास किया है।

3. आपके गद्य संग्रह ‘पिघलता आईना’ के विषय में

‘पिघलता आईना’ मेरा 13वाँ प्रकाशित एवं एकमात्र गद्य-संकलन है। हम सभी का मन देश-दुनिया, धर्म-संस्कृति, राजनीति-समाज और परिवार को लेकर व्यवस्था, सुझाव, शिकायत या प्रशंसा के रूप में निरंतर चिंतन करता है। कभी हृदय कोमल-निर्दोष स्वप्न भी देखता है।
इन्हीं भावों को समेटे गद्य रचनाएँ इस संकलन में हैं – जैसे किसी की दैनिक लेखन डायरी हो। इसमें संस्मरण, लघुकथा, रिपोर्ताज, निबंध तथा छोटे-छोटे समाजोपयोगी लेख सम्मिलित हैं। यद्यपि मेरा रुझान पद्य की ओर अधिक रहा है, तथापि गद्य में भी मैंने यथाशक्ति सृजन किया है।

4. महाकाव्य ‘पांचाली’ [परिवर्तित नाम ‘गूँज’] की रचना का प्रसंग

‘पांचाली’, जिसका परिवर्तित नाम अब ‘गूँज’ है, वर्तमान में प्रकाशनाधीन है और समीक्षा हेतु वरिष्ठ साहित्यकारों के पास विचाराधीन है।

मैंने इसे ‘काव्य-उपन्यास’ विधा का नाम दिया है, क्योंकि हिंदी साहित्य में अभी तक ‘काव्य-उपन्यास’ जैसी मान्य विधा प्रचलित नहीं है। पाठकों को भ्रम न हो, इसलिए कोष्ठक में ‘महाकाव्य’ लिखती हूँ। वस्तुतः यह पद्य में रचित उपन्यास ही है, जो दो हजार से अधिक छंदों में विस्तृत है। इसमें वर्तमान बदलते एवं आधुनिक दौर की विभिन्न परिवेशों की नारियों की गाथा है, जो संघर्ष कर इतिहास रचती हैं। इसकी भाषा आधुनिक, मिश्रित एवं आम बोलचाल वाली सरल-सहज रखी गई है।

5. काव्य-कथा ‘नील-नलिनी’ के विषय में

‘नील-नलिनी’ एक पौराणिक युगल से प्रेरित प्रेम-कथा पर आधारित काव्य-खंड है। नील इस कथा का नायक है और नलीनी नायिका। इस काव्यकथा में काव्य-रसिकों के आस्वादन हेतु समस्त रसों का समावेश है। काव्य-प्रेमी पाठक इस 1000 छंदों वाली पुस्तक को पढ़कर अपने समय का सार्थक आनंद प्राप्त करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। इसके अतिरिक्त मेरा एक अन्य काव्य-खंड ‘कलयुग’ भी है, जो किसी कथा पर आधारित न होकर प्रकृति और कलयुग की विसंगतियों को समर्पित है।

6. छत्तीसगढ़ की आंचलिक संस्कृति की विशेषता

छत्तीसगढ़ राज्य के रूप में 1 नवंबर 2000 को मानचित्र पर अवश्य आया, किंतु यह ‘कौशल देश’ और ‘दंडकारण्य’ के नाम से त्रेता युग से ही चर्चित रहा है। यहाँ की समृद्ध ‘भाखा’ यानी छत्तीसगढ़ी है। यह मैदानी एवं वनाच्छादित अंचल है, ग्राम्य-प्रदेश है। इसलिए यहाँ के प्रत्येक पर्व-उत्सव, नृत्य, गीत-संगीत, पहनावा, खान-पान – सब कुछ प्रकृति के अनुकूल है। कृषि कार्य और कृषकों की तथा जनजातीय परंपरागत संस्कृति यहाँ प्रमुख है।

‘धान का कटोरा’ कहलाने वाले छत्तीसगढ़ का मुख्य भोजन चावल और चावल से बने विविध व्यंजन हैं।

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