महिषासुरमर्दिनी के रचयिता वाणी कुमार की जन्मस्थली उपेक्षित, घर बिक जाने से ग्रामीणों में मलाल
अजीत प्रसाद
**हावड़ा:** महालया की सुबह रेडियो पर बीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज में ‘आश्विनेर शारद प्राते…’ सुनते ही बंगाली जनमानस में दुर्गोत्सव का उल्लास छा जाता है। ‘महिषासुरमर्दिनी’ बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। लेकिन इस लोकप्रिय कार्यक्रम की पटकथा लिखने वाले वाणी कुमार को बहुत कम लोग जानते हैं। हावड़ा जिले के आमता-1 ब्लॉक के कानपुर गांव में जन्मे इस महान रचनाकार की जन्मस्थली से जुड़ी यादें आज भी ग्रामीणों के लिए गर्व का विषय हैं। हालांकि, जिस घर में उनका जन्म हुआ और बचपन बीता, उसके बिक जाने का मलाल स्थानीय लोगों को है।
वाणी कुमार का वास्तविक नाम वैद्यनाथ भट्टाचार्य था। उनके पूर्वजों का पैतृक घर हुगली जिले के आंटपुर में था। उनके पिता विधुभूषण भट्टाचार्य संस्कृत के विद्वान और इतिहासकार थे, जबकि उनकी माता का नाम अपर्णा देवी था। वाणी कुमार का जन्म उनके ननिहाल हावड़ा के कानपुर गांव में हुआ था और उनका बचपन भी यहीं बीता।
‘महिषासुरमर्दिनी’ बंगाल में महालया के अवसर पर प्रसारित होने वाला एक प्रतिष्ठित रेडियो कार्यक्रम है। बीरेंद्र कृष्ण भद्र की प्रभावशाली आवाज और वाणी कुमार की लेखनी ने इस प्रस्तुति को कालजयी पहचान दिलाई। आज भी महालया की सुबह बड़ी संख्या में लोग इस कार्यक्रम को सुनते हैं और मां दुर्गा के आगमन का स्वागत करते हैं।
कानपुर गांव के लोगों के लिए वाणी कुमार का नाम विशेष महत्व रखता है। ग्रामीणों का कहना है कि महालया आते ही गांव में उनके योगदान की चर्चा होने लगती है। उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनके गांव में ऐसे रचनाकार का जन्म हुआ, जिसकी लेखनी बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
हालांकि, वाणी कुमार के जन्म और बचपन से जुड़ा घर अब बिक चुका है। इसे लेकर स्थानीय लोगों में निराशा है। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसे प्रसिद्ध व्यक्तित्वों की जन्मस्थली को संरक्षित करने और उनके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए पहल की जानी चाहिए।
स्थानीय स्तर पर वाणी कुमार की स्मृतियों को सुरक्षित रखने, उनके जीवन से संबंधित जानकारी एकत्र करने और जन्मस्थली पर स्मृतिफलक लगाने की मांग उठ सकती है। संबंधित प्रशासन और सांस्कृतिक संस्थाएं इस दिशा में पहल करें, तो गांव की ऐतिहासिक पहचान को आगे बढ़ाया जा सकता है।
महालया के अवसर पर हर साल ‘महिषासुरमर्दिनी’ की धुन बंगाल के घर-घर में गूंजती है। ऐसे में इस कार्यक्रम के रचयिता वाणी कुमार को याद करना और उनकी जन्मस्थली को उचित पहचान दिलाना सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।



