बिहार में सरकार को राष्ट्रीय लौंडा नाच अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना करनी चाहिए

विरासत: बिहार में कला संस्कृति

 

राजीव कुमार झा

लौंडा नाच लोक शैली का नाट्य है।
बिहार के लौंडे सब सारे देश के राजे रजवाड़ों के यहां जाकर नाच गान करते थे। लालू प्रसाद को भी लौंडा नाच प्रिय था लेकिन इस नृत्य शैली के विकास और संरक्षण के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। आगामी विधानसभा चुनाव से बिहार विधानसभा में तमाम पार्टियों में विचलन का भाव व्याप्त है और भाजपा राजद के लोग एक दूसरे पर गंदे आरोप मढ़ने में व्यस्त हो गए हैं। हाल में भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने तेजस्वी यादव को लालू प्रसाद के लौंडा राज की याद जब दिलाई तो राजद के किसी नेता ने सम्राट चौधरी को लालू प्रसाद का कभी का लौंडा बताया।
इस तरह के बोलचाल से अब बिहार के गांव कस्बों में भी माहौल ख़राब हो जाने का अंदेशा पैदा हो रहा है और फिर ऐसी वारदातों के घटित होने से बिहार की सारे देश में अत्यंत बदनामी होगी। हमलोग कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगे। सम्राट चौधरी को लालू प्रसाद के बारे में ऐसी अनाप शनाप बातों को बोलने कहने से पर हेज करना चाहिए और लालू प्रसाद पत्नी बेटा बेटी वाले नेता हैं। होली में लौंडा नाच हर जगह होता है और लौंडा नाच यहां की लोकनृत्य शैली है। बिहार के लोक कलाकार भिखारी ठाकुर ने इस लोक नृत्य शैली को सारे देश में प्रतिष्ठित किया। बिहार के उपमुख्यमंत्री के तौर पर
सम्राट चौधरी को बिहार में भिखारी ठाकुर की जन्मभूमि सारण के कुतुबपुर में राष्ट्रीय लौंडा नाच प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान स्थापित करने की घोषणा करनी चाहिए और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के विशेषज्ञों की सेवा भी लेनी चाहिए।
बिहार सरकार लालू प्रसाद को इस संस्था का चेयरमैन बना सकती है ‌ । लौंडा नाच विलुप्तप्राय नाट्य शैलियों में माना जाता है। बड़हिया के लाटा शैली के होली गीतों की तरह लौंडा नाच के गीत भी भूले बिसरे गीत होते जा रहे हैं। लौंडा नाच के गीतों में मनोरंजन और हास परिहास के भावों की प्रधानता होती है और अश्लीलता से लौंडा नाच के गीत दूर होते हैं।

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