नेपाल के अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को पीएम मोदी ने दी बधाई ।

 

पीएम मोदी ने सुशीला कार्की को बधाई देते हुए कहा कि नेपाल की प्रगति और समृद्धि के लिए भारत पूरी तरह प्रतिबद्ध है। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर कहा, ‘नेपाल की अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री के रूप में पद ग्रहण करने पर माननीय सुशीला कार्की जी को हार्दिक शुभकामनाएं. नेपाल के भाई-बहनों की शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए भारत पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाली भाषा में भी ट्वीट कर बधाई दी है।नेपाल में हाल की हिंसा के बाद जनजीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। नेपाली सेना की निगरानी में बॉर्डर खोले गए हैं और उत्तर प्रदेश के सोनौली बॉर्डर पर आवाजाही शुरू हो गई है। आवश्यक सामानों की आपूर्ति शुरू हो गई है। भारत के नेपाल के साथ घनिष्ठ और पारंपरिक संबंध हैं। भारत की यह भी दिलचस्पी है कि नेपाल, भारत और चीन के बीच एक गैर-गठबंधन बफर स्टेट बना रहे। सांस्कृतिक और शैक्षिक रिश्ते पहले से मौजूद हैं। नेपाल की तरह भारत भी गैर-कृषि क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने की दिशा में सक्रिय है। ऊर्जा सहयोग भविष्य की विकास योजनाओं का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।तकनीकी शिक्षा, तकनीक विकास और अनुसंधान एवं विकास में करीबी सहयोग B2B (बिजनेस टू बिजनेस) संबंधों में और मूल्य जोड़ सकता है। बहुपक्षीय मंचों पर और अधिक सहयोग और सीमाओं के पार निर्बाध व्यापार, दोनों देशों के बीच भरोसे को मजबूत करेगा. 1,751 किलोमीटर लंबी यह खुली सीमा 1816 से अस्तित्व में है।लेकिन सबसे अहम बात यह है कि भारत अगर नेपाल के लोकतांत्रिक संकट को अपना मानकर तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सहयोग दे, ताकि नागरिकों और कारोबार पर पड़ने वाले असर को कम किया जा सके, तो यह न सिर्फ उचित होगा बल्कि यह भी साबित करेगा कि एक राजनीतिक रूप से स्थिर और आर्थिक रूप से मजबूत नेपाल से भारत को ही फायदा है। नेपाल पड़ोसी देश बार-बार क्रांति के रास्ते पर चलकर भी वहीं का वहीं क्यों खड़ा रह जाता है? नेपाल में हर 10-15 साल में युवा सड़कों पर उतरते हैं, पुरानी सत्ता हिलती है, उम्मीदें जगती हैं, मगर नतीजा वही पुराना धोखा। नेपाल की राजधानी काठमांडू की सड़कें एक बार फिर धुएं और आग से लिपटी हुई हैं, संसद जल रही है, पीएम केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया है, लेकिन तकरीबन 51 लोगों की मौत के बाद भी जनता का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है। सत्ता बदल जाती है, नए चेहरे आते हैं, लेकिन सामाजिक न्याय, समानता और सच्चे लोकतंत्र की जड़ें कभी गहरी नहीं हो पातीं, और फिर अंजाम वही, अधूरी आशाएं अगले तूफान को जन्म देती हैं।
नेपाल के इतिहास की हर एक अधूरी क्रांति का ज़िक्र फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी किताब नेपाली क्रांति की कथा में किया है. उनकी नजर में क्रांति का मकसद सिर्फ सत्ता बदलना नहीं था, बल्कि ये समानता और न्याय की पहली कोशिश थी, और आज की ये आवाजें, हिंसक या शांतिपूर्ण, उसी पुरानी न्याय और समानता की भूख की गूंज हैं, जो दशकों से अधूरी है. क्लियर कट में खोलेंगे इसी अधूरे संघर्ष की परतें, और देखेंगे क्या इस बार वाकई कुछ बदलेगा, या फिर मिलेगा वही धोखा? चलिए, इतिहास के आईने में झांकते हैं। 1951: पहली क्रांति, राणा शासन का पतन और लोकतंत्र का प्रारंभ
1951 में नेपाल में राणा कुलीनतंत्र का पतन हुआ, जो नेपाली कांग्रेस, वामपंथी समूहों और राजा त्रिभुवन की साझेदारी से संभव हुआ. हालांकि भारत की मध्यस्थता से राजा बहाल हुए, मगर साथ ही राजनीतिक दलों को मान्यता मिली और चुनाव का वादा किया गया. नेपाल में इस आंदोलन को आज़ादी का नया सवेरा माना गया. लेकिन जैसा नेपाली क्रांति की कथा किताब में कहा गया है कि, यह सिर्फ आधी क्रांति थी: राजशाही अभी भी सत्ता में थी, नौकरशाही वैसी ही रही और लोकतंत्र के वादे कमज़ोर रहे। 1959 में बीपी कोइराला पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से प्रधानमंत्री बने, लेकिन सिर्फ 18 महीने बाद राजा महेन्द्र ने उन्हें बर्खास्त करके संसद भंग कर दी, और जेल में डाल दिया, फिर नेपाल में पंचायती व्यवस्था थोप दी गई. इस तरह 1951 की आशाएं अधर में लटक गईं, और नेपाल तीन दशकों तक निर्देशित लोकतंत्र के जाल में फंसा रहा।1960-1990: पंचायत और विद्रोह के बीज: अब नेपाल के पंचायत युग पर नज़र डालें तो, 1960 से 1990 तक राजनीतिक पार्टियों पर प्रतिबंध रहा, असहमति को कुचला गया, लोकतांत्रिक आवाजें दबाई गईं. छात्र, मजदूर और छुपकर रहने वाले कार्यकर्ताओं में निराशा उफान मारने लगी, वो सालों से अपने अधिकारों और प्रतिनिधित्व की लड़ाई लड़ रहे थे, लेकिन राज्य की संरचना से उन्हें बार-बार ठोकर मिली. शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन में सुधार के प्लान कागजों पर ही अटके रहे, जमीन पर कुछ नहीं बदला. धीरे-धीरे असंतोष फैला, छोटे-छोटे विद्रोहों ने जन्म लिया। 1980 के अंत में आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और असमानता ने जनता के गुस्से को चरम पर पहुंचा दिया. आखिरकार 1990 में जनता सड़कों पर उतरी, हजारों प्रदर्शनकारी विद्रोह करने लगे, दर्जनों मौतें हुईं, आख़िरकार राजा बीरेंद्र शाह को झुकना पड़ा और बहुदलीय लोकतंत्र की राह खुली. यह विद्रोह सिर्फ राजशाही के खिलाफ नहीं था, बल्कि दबाई गई आवाजों का प्रतीक बना, जिसने नेपाल में लोकतांत्रिक चेतना के बीज बो दिए। नेपाल में 1990 का कमजोर लोकतंत्र: 1990 का नया संविधान आया तो नेपाल की जनता में आशाओं की लहर दौड़ पड़ी। नेपाल संवैधानिक राजशाही और बहुदलीय लोकतंत्र में ढल गया. बरसों की कठोर राजशाही और असमानता के बाद पहली बार लोगों ने खुली राजनीतिक प्रक्रिया देखी, लोगों में उत्साह था कि अब जीवन बदलेगा. पार्टियां सत्ता की दौड़ में लगीं, लेकिन आपसी कलह और आंतरिक झगड़े फिर से भारी पड़े, और स्थिरता नहीं आ पाई। 1991 से 2001 तक नौ सरकारें घूम गईं. दलित, जनजाति, मधेसी और महिलाएं सत्ता से कोसों दूर रहीं. ग्रामीण इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास में कोई खास सुधार न हुआ. लोकतंत्र राजधानी की चमक तक सीमित रह गया, जबकि पिछड़े इलाकों में असमानता की जड़ें गहरी होती गईं. जनता को लगा कि बदलाव सिर्फ शहरों का दिखावा है, हक़ीक़त में इंसाफ दूर है और इसी एहसास ने जनता में माओवादी विद्रोह जैसे तूफान के बीज बो दिए।1996-2006: माओवादी जनयुद्ध: 1996 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने हथियार उठा लिए, सशस्त्र विद्रोह छेड़ा. उनका जनयुद्ध राजशाही उखाड़ने और समावेशी गणराज्य बनाने का सपना था. यह सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि जाति, वर्ग, लिंग की असमानताओं के खिलाफ जनता की पुकार थी।।10 सालों तक इस आग ने नेपाल को झुलसाए रखा. 17,000 से ज्यादा मौतें, हजारों लापता, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था चूर-चूर हो गई. विद्रोह ने साबित किया कि हाशिए के समुदाय अपनी दबी आवाजें बुलंद करने को तैयार हैं. मगर सत्ता का जवाब बेहद क्रूर था. पुलिस के हिंसक अभियान, हिरासतें, डर का साया हावी रहा। 2001 में शाही परिवार का नरसंहार हुआ, जिसमें राजा बिरेंद्र और उनके परिवार के कई लोग मारे गए, राजशाही की वैधता और कमजोर हो गई. इसके बाद 2005 में, राजा ज्ञानेंद्र की सत्ता के अधिग्रहण की कोशिश ने माओवादी और मुख्यधारा की पार्टियों को एकजुट कर दिया।2006: जनता आंदोलन और गणराज्य: अप्रैल 2006 में जनता आंदोलन II ने इतिहास रच दिया. लाखों लोग सड़कों पर उतर आए, कर्फ्यू तोड़ा, काठमांडू के चौराहों पर लोकतंत्र की मांग की. नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा, माओवादी पार्टी के प्रचंड और बाबुराम भट्टराई ने जन-आक्रोश को दिशा दी, सामाजिक मांगों को राष्ट्रीय मंच पर लाया गया. यह सिर्फ पार्टियों का संघर्ष नहीं था, बल्कि लंबी निराशा, अन्याय और सच्चे लोकतंत्र की आकांक्षा का प्रतीक था। भारत की मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय दबाव से राजा ज्ञानेंद्र को झुकना पड़ा, राजशाही खत्म हुई, नेपाल गणराज्य घोषित हुआ। माओवादी शांति प्रक्रिया में शामिल हुए, संविधान निर्माण शुरू हुआ. नेपाल के लिए यह मोड़ निर्णायक था. पहली बार राजशाही को चुनौती मिली, समावेशी गणराज्य की नींव रखी गई. जनता की भागीदारी ने इसे नेपाल के आधुनिक इतिहास का स्वर्णिम पल बना दिया। 2015: संविधान और बहिष्कार
फिर 2008 से 2012 की पहली संविधान सभा गतिरोध में फंसी, तो 2013 में दूसरी चुनी गई और 2015 में नया संविधान आया, जो संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और गणराज्यवाद का वादा करता था. नेपाल के लिए यह लोकतंत्र का नया दौर था, स्थिरता और न्याय की उम्मीद जगी. लेकिन मधेसी, थारू जैसे अल्पसंख्यक समुदायों ने इससे बहिष्कृत महसूस किया.
अप्रैल 2015 में भयानक भूकंप आया, देश बुरी तरह से टूट चुका था, भारतीय सीमा पर नाकेबंदी ने दर्द दोगुना कर दिया. संवैधानिक कमियां और असमान विकास ने पुराने तनाव फिर से उभार दिए. यह साबित हुआ कि बिना संरचनात्मक बदलाव के लोकतंत्र अधूरा है. 2015-2025: निराशा और उम्मीद
2015 के बाद नेपाल गणराज्य बना, लेकिन फिर भी वादे अधूरे रहे. कांग्रेस, यूएमएल, माओवादी सरकारें जिम्मेदारियों में लड़खड़ाईं. संघवाद लंगड़ा रहा, स्थानीय प्रशासन कमजोर, संसाधनों की कमी से विकास रुका रहा. भ्रष्टाचार फैला, युवाओं के रोजगार सीमित रहे, शिक्षा-स्वास्थ्य में सुधार नाममात्र ही था. ग्रामीण-सीमावर्ती इलाकों में जीवन वैसा ही रहा. लेकिन 2022 में बलेंद्र शाह उर्फ बालेन काठमांडू के मेयर बने- लोक नायक बने, अवैध निर्माण हटाए गए, जवाबदेही बढ़ाई गई. उनकी लोकप्रियता बताती है कि जनता पारदर्शी नेतृत्व चाहती है, हालांकि इससे राष्ट्रीय अस्थिरता को पूरी तरह से बदला नहीं जा सका। इतिहास के साए में 2025 का संघर्ष
8 सितंबर को जेन-ज़ी विद्रोह हो गया, नेपाल के नौजवानों ने पूरे सिस्टम को हिला दिया, उनके गुस्से की आंधी के सामने सबकुछ तहस-नहस हो गया. 9 सितंबर 2025 को पीएम केपी शर्मा ओली का इस्तीफा कोई साधारण घटना नहीं है, यह दशकों की जमा निराशा का एक बड़ा विस्फोट है. काठमांडू में धुआं, हिंसा, संसद जलना, यह शायद पिछली तमाम अधूरी क्रांतियों का हिसाब है। 1951 में राणा शासन का अंत हुआ लेकिन राजशाही बची रही, 1960 में राजा महेंद्र ने बीपी कोइराला को बर्खास्त कर पंचायत सिस्टम लागू कर दिया. 1990 में बहुदलीय लोकतंत्र आया, लेकिन कोइराला, देउबा जैसी सरकारें स्थिरता लाने में नाकाम रहीं। 1996 से 2006 के बीच माओवादी जनयुद्ध ने देश के सामाजिक और जातीय विभाजन को उभारा. 2006 में शेर बहादुर देउबा की सरकार और माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के साथ समझौते के बावजूद संविधान निर्माण में असमानताएं रहीं और कई वादे अधूरे रह गए. 2015 में संविधान लागू हुआ, लेकिन कई समूहों को बहिष्कृत महसूस करना पड़ा, और उनका भरोसा लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर कमजोर हुआ. आज नेपाल की सड़कों पर उठी आक्रोश की लहर सिर्फ मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता का नहीं, बल्कि इसी अधूरे हिसाब और बार-बार टली हुई उम्मीदों का नतीजा है।

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