भरत प्रसाद का नाम वर्तमान हिन्दी आलोचना और कविता में सुपरिचित है। आप पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग में प्रोफेसर हैं। यहां प्रस्तुत है इनसे साहित्य लेखन से जुड़े कुछ प्रसंगों के बारे में राजीव कुमार झा की बातचीत…
साहित्य:साक्षात्कार
प्रश्न: आपने साहित्य की की विधाओं में लेखन किया है। आलोचना और कविता में आपकी अपनी खास जगह है।
आलोचक के तौर पर साहित्य की अन्य विधाओं में लेखन करते हुए आपने जो कुछ भी महसूस किया उसके बारे में अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराइए?
उत्तर: जैसे गन्तव्य तक पहुंचने के एक से अधिक रास्ते हो सकते थे। भूख मिटाने के लिए कई व्यंजनों को अपनाते हैं और ज्ञान पाने लिए एकाधिक विषयों का अध्ययन करते हैं,वैसे ही सृजन के लिए एक से अधिक विधाओं की ओर यात्रा करना।आपकी ही तरह यह सवाल खुद मेरे मन में अपने प्रति अक्सर उठता रहता है। हमने अपने भीतर से संवाद किया उसे टटोला और कठोरता पूर्वक परखा भी तो पाया कि किसी एक विधा में बंधकर रह नहीं पाऊंगा। एक से ज्यादा विधाओं
में लिखने का कारण यह है कि कविता लिखता हूं तो लगता है जो रचना चाहिए था, वह छूट गया। जितनी और जैसी अभिव्यक्ति होनी चाहिए थी,वह अधूरी रह गयी। फिर अधूरेपन को भरने के लिए गद्य विधा की ओर रुख करता हूं। क्योंकि वहां
भरत तबियत अपनी बात,सोच, कल्पना को विस्तृत करने का आकाश होता है। बावजूद इसके, हमें पता है,एक साथ एकाधिक विधाओं में लेखन करना किसी दुर्गम और खड़ी ऊंचाई पर चढ़ने जैसा चुनौतीपूर्ण है!
प्रश्न: वर्तमान हिन्दी कविता की विशिष्टता को किस तरह रेखांकित किया जा सकता है?
उत्तर: समकालीन हिन्दी कविता कविता का गद्ययुग है, कथायुग और बुद्धि प्रधान युग है। जो कि कविता की प्रकृति के बहुत अनुकूल नहीं बैठता। आज भी कविता के प्राण लय में,आवेग, तरंग,लहर और संगीत में बसते हैं। आजतक हिन्दी का कोई क्लासिक नहीं हुआ जो लय,अंत:प्रवाह और संगीतात्मकता के बगैर सदियों तक याद किया जाय। मुक्तिबोध की कविता ऊपर से गद्यात्मक किन्तु भीतर से उद्धार आवेग लिए-दिए। इसीलिए समकालीन हिन्दी कविता अपना प्रतिनिधि हस्ताक्षर नहीं दे पा रही।इसकी उपलब्धि विषयों का वैविध्य और अभिव्यक्ति कौशल की बेलीक सूक्ष्मता है। इंकार, प्रतिरोध, प्रगतिशीलता इसके स्थायी तत्व हैं। परन्तु कविता का यह सुदीर्घ दौर हिन्दी कविता को ऐतिहासिक महत्व का सिद्ध कर पाएगी, इसमें शक है। यह तभी होगा,जब समकालीन कविता का अपना मुक्तिबोध पैदा हो।
बिना उत्तर मुक्तिबोध के यह दौर स्थायी महत्व की ऊंचाई नहीं छू पाएगा।
प्रश्न:आप काफी सालों से पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग में प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं। मेघालय के समाज संस्कृति और जनजीवन के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर: मेघालय ही नहीं समूचा पूर्वोत्तर शेष भारत, विशेष कर हिंदी क्षेत्र से नितांत भिन्न और अनोखा है। इतना सहज, नैसर्गिक, अकृत्रिम और प्रकृतिमय जीवन जीने वाले शायद ही देश में कहीं मिलें।पहाड़ी जीवन पहाड़ के अस्तित्व का ही रूपक है।अकेला, मजबूत,बीहड़ किन्तु हरा। यह क्षेत्र मुकम्मल मातृ प्रधान है। औरत को लेकर कोई टौबो नहीं।
वह सामाजिक प्रतिष्ठा का सिंबल भी नहीं। देवी,कुललक्ष्मी भी नहीं। घर की सबसे छोटी बेटी पैतृक सम्पत्ति की वारिस होती है। वहीं बूढ़े मां-बाप की देखभाल करती है। प्रेम-विवाह को व्यापक सामाजिक मान्यता मिली हुई है। विवाह के बाद लड़की ससुराल जाकर नहीं रहती, बल्कि लड़का ससुराल में आकर रहता है। दहेज प्रथा कल्पना की पहेली है यहां।प्रकृति पूजा आज भी यहां प्रत्येक जनजाति के बीच प्रतिष्ठित है। यहां लगभग २२० जनजातियों के 400 समुदाय हैं। इनकी भाषाएं भारतीय मूल की नहीं हैं।
प्रश्न: अपने उपन्यास “काकुलम” की विषयवस्तु और इसके कथानक के बारे में बताइए।
उत्तर: “काकुलम” उपन्यास अपने कथाकार मन को जमीन पर आजमाने का पहला प्रयोग है। कह सकते हैं यह आपबीती कथा है, किन्तु पूर्णतः आपबीती नहीं। किशोरावस्था के छात्र जीवन से लेकर युवा होने की उम्र तक का ताना-बाना इसमें देखा जा सकता है। इसकी टैग लाइन है- “युवा सपनों की उड़ान की मुक्तिगाथा।” बेशक यह उपन्यास गाथा तो नहीं,बस कथा है -किन्तु अंतर्भाव इसका व्यापक उद्देश्य लिए हुए है। यह धवल नामक एक मध्यमवर्गीय युवक की उबड़-खाबड़ जीवन यात्रा ही नहीं। बार-बार गिरकर हर बार उठने और हार-हारकर हार न मानने की जिद्द की शब्दकथा है।
इंटरमीडिएट स्कूल, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जेएनयू तीन वे शिक्षा केन्द्र हैं,जो धवल के अधकचरे व्यक्तित्व को वैचारिक परिपक्वता के सांचे में तब्दील कर देते हैं।
संक्षिप्त परिचय
भरत प्रसाद
●जन्म : 25 जनवरी, 1970 ई. ग्राम –हरपुर ,संतकबीर नगर (उ.प्र.)
● काव्य संग्रह : 04 पुस्तकें ( एक पेड़ की आत्मकथा : पुरस्कृत) ● उपन्यास : 01पुस्तक “काकुलम” : सामयिक प्रकाशन: नयी दिल्ली : 2024 ई.● वैचारिकी : 01पुस्तक ” भारत एक स्वप्न” वाणी प्रकाशन,नयी दिल्ली वर्ष-2025 ई.● आलोचना : 10 पुस्तकें : कविता की समकालीन संस्कृति-2017 : भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली ● कहानी संकलन: 02 पुस्तकें .
मूल्यांकन : ” शब्द-शब्द प्रतिबद्ध” ( मूल्यांकन : भरत प्रसाद) ● सम्पादित पुस्तकें : 05 ● पुरस्कार – 1. शमशेर सम्मान-2022( कथेतर गद्य) 2.आयाम सम्मान-2024, गोरखपुर-उ.प्र. 3. मलखानसिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार –
2014 ई.
● अतिथि-सम्पादन : जनपथ,साहित्य विमर्श,इरावती
●कविताओं का नेपाली , मराठी,उड़िया, अंग्रेजी, बांग्ला, असमिया और गुजराती भाषाओं में अनुवाद।
● संपादक : देशधारा : वार्षिक साहित्यिक पत्रिका
● सम्प्रति : प्रोफेसर,हिंदी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय ,शिलांग – 793022, (मेघालय)
●मेल : bharatharpur25@gmail.com
●मो.न. 09077646022 ( Whatapp No.)
09383049141
■■■


