पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला;

* स्पीकर के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार  

* बागी तृणमूल ऋतब्रत बनर्जी ही नेता प्रतिपक्ष के पद पर बने रहेंगे।

कोलकाता, पश्चिम बंगाल : पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) की मान्यता को लेकर चल रहे हाई-प्रोफाइल विवाद में आज कलकत्ता हाईकोर्ट से एक बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रथींद्रनाथ बोस के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जिसके तहत उन्होंने बागी टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी थी।जस्टिस कृष्ण राव की एकल पीठ (Single Bench) ने इस मामले में कोई भी अंतरिम राहत देने से मना करते हुए कहा कि फिलहाल संतुलन याचिकाकर्ता के पक्ष में नहीं है। कोर्ट ने मामले को खारिज नहीं किया है, बल्कि विस्तृत जांच के लिए सभी पक्षों (राज्य सरकार, स्पीकर और टीएमसी) से हलफनामा (Affidavit) तलब किया है। अगले तीन हफ्तों के बाद इस मामले पर अगली सुनवाई होगी। तब तक ऋतब्रत बनर्जी ही नेता प्रतिपक्ष के पद पर बने रहेंगे।क्या है पूरा विवाद?पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आधिकारिक नेतृत्व (ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी) ने वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने का प्रस्ताव स्पीकर को भेजा था।बागी गुट का दावा: इसी बीच, तृणमूल कांग्रेस के ही 58 से अधिक विधायकों के एक बागी गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग करते हुए स्पीकर को अलग से पत्र सौंप दिया। बागी गुट ने आरोप लगाया था कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय वाले प्रस्ताव में कुछ विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी थे।स्पीकर का फैसला: विधानसभा अध्यक्ष रथींद्रनाथ बोस ने टीएमसी के आधिकारिक प्रस्ताव को होल्ड पर रखकर, बहुमत का हवाला देते हुए बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया। इसके तुरंत बाद टीएमसी ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया था।हाईकोर्ट में चुनौती:स्पीकर के इसी फैसले को चुनौती देते हुए टीएमसी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। टीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने दलील दी थी कि किसी निष्कासित या बागी नेता को पार्टी की सहमति के बिना नेता प्रतिपक्ष बनाना संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) और मूल ढांचे के खिलाफ है।कोर्ट ने उठाए सवाल, पर नहीं लगाई रोकपिछले दो दिनों से चल रही मैराथन सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्ण राव ने स्पीकर की कार्यप्रणाली पर भी कई तीखे सवाल उठाए थे कि आखिर पार्टी के आधिकारिक प्रस्ताव को दरकिनार कर चैंबर में बैठकर इतनी जल्दबाजी में बागी गुट के फैसले को मान्यता क्यों दी गई?हालांकि, आज अंतिम आदेश सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि इस कानूनी बिंदु की विस्तृत जांच की जरूरत है कि क्या स्पीकर किसी राजनीतिक दल की सहमति के बिना ऐसा फैसला ले सकते हैं। लेकिन फिलहाल इस व्यवस्था पर कोई अंतरिम रोक (Stay) नहीं लगाई जा रही है। इस फैसले को कोर्ट से ममता बनर्जी खेमे के लिए एक बड़ा झटका और बागी विधायकों के गुट के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।

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