दीपावाली पर खुशियाँ ग्रीन पटाखे से ही मनायें और जीवन बचायें

लाल बिहारी लाल

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साधारण पटाखों से निकलने वाली गैसों में सल्फर डाई आक्साइड-जिससे ,गले एवं छाती में संक्रमण, श्वसन में परेशानी,कार्बन मोनो आक्साइड –खाँसी, त्वचा में परेशानी, उच्च रक्त चाप, मानसिक एवं हृदय की बिमारियाँ उतपन्न, पोटेशियम नाइट्रेट जो कैंसर के मुख्य वजह है। हाइड्रोजन सल्फाइड जो छाती में दिक्कत, ब्रोमियम आक्साइट आँखों की त्वचा तथा गंध सूघने की क्षमता का नष्ट कर देता है। इसेक साथ ही उच्च शोर से मानव के कान का पर्दे भी फट सकते है।

देश के सबसे प्रदूषित शहरों में दिल्ली ,एन.सी.आर. की 5 शहरें है। उनमें दिल्ली पहले स्थान पर,गाजियाबाद दूसरे, ग्रेटर नोएडा तीसरे तथा नोएडा पांचवे स्थान पर है जबकि दीपावाली आना अभी बाकी है।
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भगवान रामचन्द्र कई दुर्दांत राक्षसों का वध कर वनवास से अयोध्या वापस आये तो इसी खुशियों को मनाने के लिए पूरी अयोध्या को दीपों से सजाया गया था जो कलांतर में दीपावली का रुप ले लिया। पर धीरे-धीरे खुशियाँ मनाने का तरीका बदल गया और आज हर मौसम या हर खुशी में पटाखों को सुमार कर लिया गया है। बढ़ती हुई आबादी और घटते हुए वन ने पर्यावरण पर काफी दबाब बढ़ा दिया है, ऐसे में इस मौसम में अन्य मौसम की तुलना में हवायें काफी प्रदूषित होती है उपर से पटाखो का शोर और धुआं जीवों के लिए काफी हानिकारक साबित हो रही है। इसी को ध्यान में रखकर कई पर्यावरण संस्थानों के सुझाव पर सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2017 को देश में दीपावाली पर ग्रीन पटाखे को जलाने के लिए इजाजत दी थी यानी साधारण पटाखों पर बैन लगा दिया गया साथ ही साथ जलाने के समय सीमा भी रात्री में 8 बजे से 10 बजे निर्धारित कर दी औऱ इस वर्ष 2025 में भी देश के अन्य हिस्सों में पहले की तरह जारी रहेगा यानी ग्रीन पटाखे जलाने की इजाजत रहेगी जबकि वर्षों बाद दिल्ली में पटाखे जलाने की इजाजत कोर्ट ने दी है। । यह एक सकारात्मक पहल है पर यह तभी संभव है जब जनता जागरुक हो और सरकार का हाथ बटाये वरना पटाखों के इस जलन से जीव संकट में आ जायेंगे।

बात करते है ग्रीन पटाखों की तो दुनिया में चीन को बाद भारत दूसरे पायदान पर निर्माता(उत्पादक) के रुप में जाना जाता है। पटाखो के घटक में से अल्युमुनियम, बेरियम पोटेशियम नाइट्रेट तथा कार्बन की मात्रा कम या बिल्कुल नगन्य कर दी जाती है तो यही पटाखे ग्रीन पटाखे कहलाती है। इन पटाखों से वातावरण में 30-40% गैसे कम उत्यर्जित होती है जिससें वाताररण में 30-40 प्रतिशत प्रदूषण कम फैलते हैं। इन पटाखो का निर्माण राष्ट्रीय पर्यावरण अभियंत्रिकी संस्थान (NEERI/निरी),पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संस्थान(PESO/पेसो) के सहयोग से सी.एस. आई. आऱ. ने बनाया है। इन्हीं के फर्मूला का उपयोग अन्य पटाखा उत्पादक कंपनिया करती है जिन पर इको/ग्रीन पटाखे का लोगो होता है। साधारण पटाखों से निकलने वाली गैसों में सल्फर डाई आंक्साइड-जिससे ,गले एवं छाती में संक्रमण, श्वसन में परेशानी,कार्बन मोनो आक्साइड –खाँसी, त्वचा में परेशानी, उच्च रक्त चाप, मानसिक एवं हृदय की बिमारियाँ उतपन्न, पोटेशियम नाइट्रेट जो कैंसर के मुख्य वजह है। हाइड्रोजन सल्फाइड जो छाती में दिक्कत, ब्रोमियम आक्साइट आँखों की त्वचा तथा गंध सूघने की क्षमता का नष्ट कर देता है। इसेक साथ ही उच्च शोर से मानव के कान का पर्दे भी फट सकते है। पटाखों के जलाने से बच्चें, मानव, बृद्ध के साथ-साथ पर्यावरण के अन्य जीव जन्तुओं पर भी इसका असर पड़ता है। जिससे जीवों पर संकट उत्पन्न हो गया है। अतः सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सराहनीय है। अब मानव को भी आगे आना होगा औऱ कोर्ट के इस निर्णय में कदम से कदम मिलाना होगा तभी इस संकट से निजात मिल सकती है। वरना जीवों का जीना दुश्वार हो जायेगा। और मानव खुशियों की आड़ में अपना गला खुद घोंट लेगा।
इस साल दिल्ली की मुख्य मंत्री श्रीमति रेखा गुप्ता एवं पर्यावरण मंत्री मंजीदर सिंह सिरसा भी दिल्ली के लोगो की बात कोर्ट तक पहुँचाया औऱ सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय के लिए सुबह औऱ शाम में ग्रीन पटाखे जलाने की इजाजत दे दी है ताकि लोग इस खुशियों के त्योवहार को खुशी- खुशी मना सके।
आजकल संस्कृति के नाम पर कई संगठन पठाखे पर लगी बैन का विरोध कर रहे है। जबकि दिल्ली एन.सी.आर. का वायु गुणवता काफी खराब यानी बद से बदतर दूसरे शब्दों में कहें तो खतरनाक है। देश के प्रदूषित शहरों में दिल्ली ,एन.सी.आर. की 5 शहरें है। इसलिए जरुरी है कि पहले जीव औऱ पृथ्वी को बचाया जाये जीव रहेगा तभी संस्कृति रहेगी इसलिए हर मानव पर्यावरण संरक्षण में अपनी सहभागिता ईमानदारी से निभायें। तभी पर्यावरण का भला हो सकेगा और जीवों का कल्याण ।

लेखक- पर्यावरण प्रेमी एवं साहित्य टी.वी. के संपादक है।

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