मिट्टी और खेती को बचाने पर बल, ‘खेत बचाओ अभियान’ से टिकाऊ कृषि को मिलेगा बढ़ावा

 

नई दिल्ली, 16 जून। भारतीय कृषि आज जलवायु परिवर्तन, घटती मृदा उर्वरता, भूजल स्तर में गिरावट और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इन चुनौतियों से निपटने और कृषि को अधिक टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने के उद्देश्य से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया जा रहा है।

अभियान का मुख्य संदेश है— “मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी, किसान मजबूत होगा और देश समृद्ध बनेगा।” कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी की गुणवत्ता और स्वास्थ्य ही खेती की सफलता की आधारशिला है। यदि मिट्टी की उर्वरता लगातार घटती रही तो उत्पादन में कमी, लागत में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इस दिशा में इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। संस्था किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित पोषण प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रति जागरूक कर रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, लेकिन रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से कई क्षेत्रों में मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित हो रही है। साथ ही लाभकारी सूक्ष्मजीवों और जैविक कार्बन की मात्रा में कमी आने से भूमि की जलधारण क्षमता भी घट रही है।

अभियान के तहत सॉयल हेल्थ कार्ड के महत्व पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसके माध्यम से किसानों को वैज्ञानिक आधार पर यह जानकारी मिलती है कि उनके खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है और किस मात्रा में उर्वरकों की आवश्यकता है। इससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित होता है, लागत घटती है तथा मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।

प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देना भी अभियान का प्रमुख उद्देश्य है। गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और हरित खाद के उपयोग से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता में सुधार होता है तथा उसकी उत्पादकता लंबे समय तक बरकरार रहती है। किसानों को इन तकनीकों का प्रशिक्षण देकर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है।

जल संकट को देखते हुए अभियान में जल संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। किसानों को ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई, वर्षा जल संचयन और कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। इसके अलावा बीज उपचार, संतुलित पोषण प्रबंधन, आधुनिक बुवाई तकनीक, फसल विविधीकरण और स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त बीज एवं फसल चयन के बारे में भी जागरूक किया जा रहा है।

किसानों को नकली उर्वरकों और कीटनाशकों से होने वाले नुकसान के प्रति भी सतर्क किया जा रहा है। अभियान के तहत गुणवत्तापूर्ण कृषि आदानों की पहचान और उनके सही उपयोग की जानकारी देकर किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

आईपीएल के प्रबंध निदेशक डॉ. पी. एस. गहलौत ने कहा कि संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रयोग से मिट्टी की सेहत में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की बढ़ती कीमतों के बीच मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और संतुलित पोषण प्रबंधन की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि घटता मृदा स्वास्थ्य, उर्वरकों का असंतुलित उपयोग, कीटनाशकों के दुष्प्रभाव, मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव, भूजल स्तर में गिरावट और सुधारात्मक उपायों पर गंभीरता से ध्यान देकर ही कृषि को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है। ‘खेत बचाओ अभियान’ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button