दिल हूम हूम करे’ से लेकर ‘ओ गंगा तू बहती हो क्यों’ तक भूपेन हजारिका के अमर गीत, जिन्होंने दिए खास संदेश

अधूरे इश्क का 40 साल पूरा रिश्ता निभाकर प्रेम को किया अमर, नहीं रचाया विवाह

 

अजित प्रसाद/ सिलीगुड़ी: पड़ोसी राज्य असम में अगर आप ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे जालुकबाड़ी स्थित भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका के समाधि स्थल आपको अपनी ओर आकर्षित करता है। इसलिए उनके शताब्दी जन्मजयंती समारोह के पूर्व नया
नाम अब से ‘समन्वय तीर्थ’ रखा गया है।भूपेन हजारिका असम के एक गीतकार, संगीतकार, फिल्ममेकर और गायक थे। वह असमिया भाषा के लेखक और असम संगीत के अच्छे जानकार थे। हजारिका को संगीत विरासत में मिला। उनकी मां गायिका थीं। भूपेन हजारिका ने 10 साल की उम्र में अपना पहला गाना लिखा था और उसे गाया था। उन्होंने बारह वर्ष की आयु में असमिया भाषा की फिल्म ‘इंद्रमालती’ में काम किया। भारत रत्न भूपेन हजारिका की आवाज का हर कोई दीवाना है। उनका हर एक सुर, हर एक बोल सीधे दिल को छू जाता है। उन्हें लोग प्यार से भूपेन दा बुलाते थे। वह शानदार गायक और बेहतरीन संगीतकार थे।भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की 100वीं जन्म जयंती देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भावपूर्ण लेख के माध्यम से उनकी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक योगदान को याद किया। अपने आधिकारिक ब्लॉग पर प्रकाशित ‘भूपेन दा को श्रद्धांजलि’ शीर्षक वाले इस लेख में पीएम ने भूपेन दा की जीवनी, उनके संगीत की यात्रा और सामाजिक योगदान को सरल शब्दों में बयां किया है। उन्होंने बताया कि कैसे भूपेन दा ने असम की मिट्टी से जुड़कर दुनिया को मानवता का संदेश दिया। यह लेख शताब्दी वर्ष की शुरुआत पर उनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प दिलाता है।बचपन से ही उन्हें संगीत से प्रेम था। उनकी मां उन्हें पारंपरिक लोरियां सुनाया करती थीं, और वहीं से उनके दिल में संगीत की लौ जल उठी थी। वह अपने गीतों को खुद ही लिखते, उनका संगीत बनाते और फिर उन्हें गाते भी थे। उनका हर गाना एक सोच लेकर आता था, एक सवाल उठाता था, या फिर गहरे दर्द को सामने रखता था।
उनके सबसे प्रसिद्ध गीतों में से एक ‘दिल हूम हूम करे, घबराए…’ है। यह गाना फिल्म ‘रुदाली’ से है और इसे भूपेन दा ने खुद संगीतबद्ध किया था। इस गीत में दिल की बेचैनी, दर्द और अकेलेपन को इतने सादे लेकिन असरदार शब्दों में कहा गया है कि सुनते ही आंखें नम हो जाती हैं। लता मंगेशकर और भूपेन दा की आवाज ने मिलकर इस गाने को यादगार बना दिया। भूपेन दा ने सिर्फ प्रेम या दर्द के गीत नहीं गाए, उन्होंने समाज को भी अपने गीतों से आईना दिखाया। उन्होंने ‘ओ गंगा तू बहती हो क्यों…’ के जरिए समाज को संदेश दिया कि देश में नैतिकता खत्म हो रही है, लेकिन गंगा नदी फिर भी शांत तरीके से बह रही है। उनके हर एक गीत के पीछे मकसद और गहरी सोच छुपी होती थी।
उनका एक और गाना जो बहुत ही सुंदर और अर्थपूर्ण है, वह ‘समय ओ धीरे चलो’ है। इसमें भूपेन दा समय से गुजारिश करते हैं कि वह धीरे-धीरे चले, ताकि दुखों से राहत मिल सके, ताकि कुछ खोया हुआ वापस पाया जा सके। इस गीत की भाषा बेहद सरल है और इसका संगीत शांति और गहराई से भरपूर है।
उन्होंने ऐसे कई गाने बनाए जो गरीबों, मजदूरों, महिलाओं और वंचितों की आवाज बने। उनके गीतों में लोक संगीत की मिठास होती थी, लेकिन उनमें एक आधुनिक सोच भी होती थी। उन्होंने असमिया, हिंदी, बांग्ला और कई भाषाओं में गीत गाए और सभी जगहों पर उन्हें उतना ही प्यार मिला।
भूपेश दा के गाने ‘एक कली दो पत्तियां’ में मासूमियत और बर्बरता, दोनों का जिक्र है। यह गाना पहले तो एक बगीचे की सुंदरता और नन्ही कली की बात करता है, फिर अचानक उस कली पर छा जाने वाले अंधेरे का वर्णन करता है। इस गाने में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और समाज की चुप्पी को दिखाया गया है। भूपेन हजारिका को एक शब्द में परिभाषित करना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है, ‘संगीत सम्राट’ और ‘बर’ (महानायक) के नाम से मशहूर भूपेन हजारिका अपने आप में पूरा साम्राज्य थे। कवि, संगीतकार, गायक, अभिनेता, पत्रकार, लेखक और फिल्मकार के रूप में उन्होंने लोगों के दिलों में जो जगह बनाई है वहां पहुंचना भी किसी के लिए दुर्लभ है।
40 वर्षों तक अनकहा रिश्ता निभाते रहे हजारिका, 23 साल छोटी कल्पना लाजिमी से करते थे प्यार : महान फनकार अपनी मोहब्बत को दुनिया के सामने पहचान नहीं दिला पाया और नतीजा ये हुआ कि वो 40 साल तक एक अनकहा रिश्ता जीते गए वो भी अधूरी मोहब्बत के साथ, जो समाज के सामने अनकहा और बेनाम ही रहा। जी हां यहां बात हो रही हैं उनकी मैनेजर और डायरेक्टर कल्पना लाजिमी की, जो उम्र में उनसे 23 साल छोटी थीं। जीवन के 40 साल तक दोनों साथ रहें, यहां तक कि भूपेन के अंतिम समय में सिवाय कल्पना के और कोई साथ नहीं था। दरअसल भूपेन हजारिका ने कल्पना से मिलने से पहले प्रियमदा पटेल से शादी की थी, जिससे उन्हें एक बेटा भी है लेकिन समय के साथ वैवाहिक संबंधों में दूरी आ गई और तब ही उनकी मुलाकात अपने से 23 साल छोटी कल्पना से हुई।जिन शब्दों से वो कठिन से कठिन बात आसानी से कह जाते थे, वो ही महान फनकार अपनी मोहब्बत को दुनिया के सामने पहचान नहीं दिला पाया और नतीजा ये हुआ कि वो 40 साल तक एक अनकहा रिश्ता जीते गए वो भी अधूरी मोहब्बत के साथ, जो समाज के सामने अनकहा और बेनाम ही रहा।
23 साल छोटी कल्पना लाजिमी से प्यार करते थे हजारिका: जी हां यहां बात हो रही हैं उनकी मैनेजर और डायरेक्टर कल्पना लाजिमी की, जो उम्र में उनसे 23 साल छोटी थीं। जीवन के 40 साल तक दोनों साथ रहें, यहां तक कि भूपेन के अंतिम समय में सिवाय कल्पना के और कोई साथ नहीं था। दरअसल भूपेन हजारिका ने कल्पना से मिलने से पहले प्रियमदा पटेल से शादी की थी, जिससे उन्हें एक बेटा भी है लेकिन समय के साथ वैवाहिक संबंधों में दूरी आ गई और तब ही उनकी मुलाकात अपने से 23 साल छोटी कल्पना से हुई।
कल्पना लाजमी और भूपेन हजारिका ने नहीं की शादी
कल्पना लाजमी और भूपेन हजारिका का रिश्ता विवाह में नहीं बदला, दोनों चालीस साल तक बिना शादी के एक ही छत के नीचे के रहे। दोनों के बीच प्रेम, समर्पण और भरोसा था लेकिन दुनिया की नजर में दोनों का रिश्ता बहुत सारे सवालों के घेरे में रहा, लोगों ने काफी उंगलियां भी उठाईं लेकिन इन दोनों ने तभी जमाने की परवाह नहीं की लेकिन आज तक साफ नहीं है कि दोनों ने आखिर शादी क्यों नहीं की थी?
कल्पना लाजिमी पर बहुत सारे लांछन भी लगाए गए थे:
भूपेन के अंतिम वक्त में कल्पना ही उनके साथ थीं, उन्होंने अपनी कंपनी, बैंक खाते, नकद राशि, सोने के आभूषण और अपनी सम्पत्ति सबकुछ उनके नाम लिख दी थी, जिस पर हजारिका के बेटे ने उनके निधन के बाद काफी उत्पात मचाया था और कल्पना लाजिमी पर बहुत सारे लांछन भी लगाए थे लेकिन कल्पना लाजिमी की ओर से कभी भी इस बारे में खुलकर कभी कुछ नहीं कहा गया।
अधूरा इश्क लेकिन पूरा रहा रिश्ता : भूपेन हजारिका ने साल 2011 में लंबी बीमारी के बाद 85 वर्ष की अवस्था में दुनिया को अलविदा कह दिया तो वहीं ‘रुदाली’, ‘दमन’ और ‘दरमियान’ जैसी बेहतरीन फिल्मों का निर्देशन करने वाली डायरेक्टर कल्पना लाजमी ने भी साल 2018 में किडनी के कैंसर की वजह से दुनिया से विदाई ले ली। दोनों ने साथ जीवन जिया, भले ही समाज की नजर में दोनों पति-पत्नी नहीं बन पाए लेकिन जीवन साथी की तरह दोनों ने लाइफ का हर लम्हा बखूबी और भरपूर आनंद उठाया, ये एक ऐसी प्रेम कहानी है, जो अधूरी होकर भी पूरी है और ये एक ऐसा रिश्ता था जो पूरा होकर भी अधूरा रहा। असमिया, हिंदी और बंगाली भाषा में अनगिनत गीत गाए: गौरतलब है कि भूपेन हजारिका ने असमिया, हिंदी और बंगाली भाषा में अनगिनत गीत गाए और लिखे। वे हिंदी फिल्मों में भी सक्रिय रहे। भूपेन हजारिका को उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।इनमें प्रमुख हैं:
पद्म भूषण (2001), भारत रत्न (2019, मरणोपरांत)
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1992)। आइए एक वर्ष तक होने वाले शताब्दी समारोह में आप भी हिस्सा लें।

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