कल बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाएगा ”गोवर्धन पूजा” या ”अन्नकूट पर्व
मंदिरों में तैयारी के साथ सुरक्षा के भी ज्यादा इंतजाम
– बलि की पूजा, गोवर्धन पूजा, गौ-पूजा, अन्नकूट होता है तो इस दिन वरूण, इन्द्र, अग्निदेव आदि देवताओं की पूजा
अजित प्रसाद / सिलिगुडी: सनातन परंपरा में अन्नकूट के पर्व का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. यह पर्व हर साल दिवाली के अगले दिन कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि पर मनाया जाता है, लेकिन इस साल तिथि में अंतर आ जाने के कारण 22 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा।।
भारत त्योहारों की भूमि है । हर पर्व अपने भीतर भक्ति, परंपरा और संस्कृति की गहराई समेटे हुए है। दीपावली के बाद मनाया जाने वाला ”गोवर्धन पूजा” या ”अन्नकूट पर्व” इन्हीं में से एक है। दरअसल प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 21 अक्टूबर शाम 5:54 बजे होगी. वहीं इसका समापन अगले दिन 22 अक्टूबर को शाम 8:16 बजे होगा. इसी कारण पूजा का मुहूर्त सुबह के 6:30 बजे से 8:47 बजे तक रहने वाला है. इस दौरान आप आराम से पूजा-पाठ कर सकते हैं।
इस दिन क्या करना चाहिए?गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएं। भगवान कृष्ण की मूर्ति की स्थापना करें
56 भोग या अन्नकूट तैयार करें। भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन महाराज को भोग लगाएं. इस दिन गाय की पूजा करनी चाहिए।
गोवर्धन पर्वत की बनाई गई आकृति की सात बार परिक्रमा करें।
भगवान कृष्ण के मंदिर में दर्शन करने चाहिए। जब ना अंधेरा हो, ना ही सूर्य अपनी किरणें बिखेर चुका हो, उस समय करनी चाहिए गोवर्धन पूजा। जिनका मन स्थिर नहीं, चित्त शांत नहीं, हमेशा भटकाव रहता है, ऐसे लोगों के लिए यह त्यौहार अत्यंत महत्वपूर्ण है. भले ही आप माँ लक्ष्मी की पूजा करके देर से सोए हो लेकिन गोवर्धन पूजा पूरी श्रद्धा के साथ जरूर करें।
शास्त्रों में वर्णित गोवर्धन पूजा का महत्व: शास्त्रों और वेदों में इस दिन बलि की पूजा, गोवर्धन पूजा, गौ-पूजा, अन्नकूट होता है तो इस दिन वरूण, इन्द्र, अग्निदेव आदि देवताओं की पूजा का विधान है। एक बार देवराज इन्द्र ने कुपित होकर सात दिन की वर्षा की अखंड झड़ी लगा दी। परंतु श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ अंगुली पर उठाकर ब्रज को बचा लिया तथा इंद्र को लज्जित होने के पश्चात् उनसे क्षमायाचना करनी पड़ी। गोवर्धन पूजा शुभ मुहूर्त: गोवर्धन पूजा प्रकृति के पूजन का प्रतीक है. भगवान श्रीकृष्ण ने सदियों पहले ही समझा दिया था कि इंसान तभी सुखी रह सकता है, जब वह प्रकृति को प्रसन्न रखें. प्रकृति को ही परमात्मा मानें और परमात्मा के रूप में ही प्रकृति की पूजा करें, हर हाल में प्रकृति की रक्षा करे। इस बार गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06ः30 बजे से 08ः47 बजे तक रहेगा. साथ ही इस दिन प्रीति योग, लक्ष्मी योग भी है. यह पूजा पाठ और मांगलिक कार्यों के लिए शुभ फलदायी है। इस दिन विधि विधान से सच्चे दिल से गोवर्धन भगवान की पूजा करने से सालभर भगवान श्री कृष्ण की कृपा बनी रहती है। गोवर्धन पूजा की विधि: लक्ष्मी का एक रूप अन्नपूर्णा का है. जिस घर में माँ अन्नपूर्णा स्थिर रूप से विराजमान होगी, वहां सदैव स्थाई रूप से सुख-समृद्धि एवं शांति का वास होगा. इसलिए इस दिन सूर्योद्य से पहलें उठकर सर्वप्रथम अपने घर में झाड़ू लगाएं। वह भी घर के अन्दर से लेकर बाहर की ओर जिससे घर के सभी दरिद्रता व अशुभता बाहर निकल जाए. झाड़ू निकल जाने के पश्चात् घर के बाहर से आपको थाली बजाते-बजाते घर में प्रवेश करना है. कुछ इस तरह भाव करें जिस तरह माँ लक्ष्मी आपके घर पधार रही है.
फिर स्नानादि से निवृत होकर गोबर या मिट्टी लेकर घर के मुख्य द्वार के चौखट पर छोटा पर्वत और पाल बनाकर उन्हें गोवर्धन स्वरूप मानकर उनकी पूजा-अर्चना करें.
फिर केसर-कुंकुम का तिलक करें, अक्षत चढ़ाएं, पुष्प चढ़ाए व नैवेद्य स्वरूप कोई भी प्रसाद का भोग लगाएं. फिर हाथ जोड़कर प्रार्थना करें की हमारे घर में सदैव माँ लक्ष्मी का वास बना रहे व उनकी कृपा दृष्टि और आशीर्वाद हमेशा स्थापित रहे.
साथ ही इस दिन 56 भोग या अन्नकूट तैयार करें और भगवान श्रीकृष्ण तथा गोवर्धन महाराज को अर्पित करें और उनसे यह प्रार्थना करें कि इन 56 भोग की तरह ही हमारी जीवनरूपी थाली भी सुख के प्रत्येक स्वाद के साथ सजी रहे और आपकी कृपा बनी रहे।धन संचय में वृद्धि के लिए-गोवर्धन पूजा के समय एक थाली में 5 गोमती चक्र और 5 कौड़ियां रखें और उनकी भी रोली-चावल से पूजा करें. पूजा के बाद उन्हें उठाकर एक लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रख लें.
सौभाग्य वृद्धि के लिए-गोवर्धन पूजा के समय एक हल्दी की गांठ, एक गोमती चक्र, कौड़ी, गुंजाफल और 5 मुखी रुद्राक्ष लेकर एक पोटली बनाएं और पूजा के बाद उस पोटली को अपने घर के मंदिर में, तिजोरी में, ऑफिस के कैश बॉक्स में या अपने पर्स में रखे।गोवर्धन पूजा की कथा: – श्रीमद्भागवत के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण बालक अवस्था में थे, तब गोकुल के लोग अच्छी बारिश की कामना से इंद्रदेव की पूजा करते थे। ये बात जानकर श्रीकृष्ण ने सभी से कहा कि ‘बारिश करना तो इंद्र का काम है। हमारा गायों का भरण-पोषण तो गोवर्धन पर्वत करता है, इसलिए हमें इसी की पूजा करनी चाहिए। तब सभी लोगों ने श्रीकृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा की। ये देख देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने गोकुल पर मूसलाधार बारिश करनी शुरू कर दी। श्रीकृष्ण ने सभी को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया, जिससे सभी ग्रामवासी सुरक्षित हो गए। जब 7 दिन तक श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर रखा तो ये देखकर इंद्र समझ गए कि श्रीकृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। तब देवराज इंद्र ने आकर श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। तभी ये गोवर्धन पूजा की परंपरा चली आ रही है जो आज भी जारी है। संतान सुख और संतान से सुख की प्राप्ति के लिए- इस दिन दूध, दही, शहद, शक्कर और घी से पंचामृत बनाएं और फिर उसमे गंगाजल और तुलसी मिलाकर शंख में भरकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें और फिर क्लीं कृष्ण क्लीं मंत्र का 5 माला जाप करें. जाप के बाद पंचामृत घर के सभी सदस्य ग्रहण करें. साथ इस दिन मंदिर में हरी सब्जियों का दान करें। यह पर्व दीपावली के अगले दिन, बलिप्रतिपदा के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की उस दिव्य लीला की स्मृति में मनाया जाता है जब उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाए जाने वाले इस पर्व पर श्रद्धालु गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाते हैं और उसकी पूजा करते हैं। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग (छप्पन भोग) अर्पित किए जाते हैं और गोवर्धन पर्वत की पूजा विधि-विधान से की जाती है। हालांकि, पूजा समाप्त होने के बाद बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि अब इस गोबर का क्या किया जाए? क्या इसे फेंकना उचित है? आइए जानते हैं, इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं। गोबर को कभी न फेंकें इधर-उधर ज्योतिष शास्त्र में गोवर्धन पूजा में उपयोग किए गए गोबर का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। यह पवित्र तत्व माना जाता है, इसलिए पूजा के बाद इसे कूड़े या अपवित्र स्थान पर फेंकना अशुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से धन और सुख-समृद्धि में कमी आ सकती है। पूजा समाप्त होने के बाद गोवर्धन पर्वत को उसी स्थान पर पूरे दिन रहने दें। शाम के समय इसे सावधानी से एकत्र करें। फिर इसमें वे सफेद सींकें लगाएं जो करवा चौथ की पूजा में इस्तेमाल हुई थीं। इसके बाद उस गोबर के पर्वत के ऊपर सरसों के तेल का दीपक जलाएं और इसे अपने आंगन में सुरक्षित स्थान पर रख दें। यह शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। गोवर्धन पूजा के बाद गोबर से करें ये शुभ कार्य: आंगन या छत की लिपाई करें: गोवर्धन पूजा के गोबर से आंगन या छत की लिपाई करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से माता लक्ष्मी का वास घर में बना रहता है और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। उपले बनाएं: पूजा के बाद बचे हुए गोबर से कंडे (उपले) बनाए जा सकते हैं। इन्हें सर्दियों में खाना पकाने या धूप के रूप में जलाने से वातावरण शुद्ध होता है। खेतों में खाद के रूप में उपयोग करें: गोबर को खेतों में डालना शुभ और उपयोगी होता है। यह प्राकृतिक खाद मिट्टी की उर्वरक शक्ति बढ़ाती है और फसल की पैदावार में वृद्धि करती है। गोबर को सूखाकर या सीधे ही गमलों में खाद के रूप में डाल सकते हैं। इससे पौधे हरी-भरी और स्वस्थ रहते हैं। चाहें तो इसे स्थानीय गोशाला में दान भी किया जा सकता है, जो पुण्य का कार्य माना गया है।




