प्रधानमंत्री की अपील से लॉकडाउन की आशंका

कृषाणु दास नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से मितव्ययिता अपनाने की अपील में जिन बिन्दुओं का जिक्र किया गया है उससे आम लोगों में लॉकडाउन की छाया नजर आने लगी है। पश्चिम एशिया युद्ध से उत्पन्न हालात को देखते हुए राजकोषीय दबाव को संतुलित करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री की अपील को अहम माना जा रहा है। विगत दिनों हैदराबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने पेटोल-डीजल की खपत कम करने, शहरों में मेटो का इस्तेमाल बढ़ाने, कारपूलिंग अपनाने, इलेक्टिक वाहनों का ज्यादा इस्तेमाल करने, पार्सल परिवहन के लिए रेलवे सेवाओं का उपयोग करने और वर्क फ्रॉम होम अपनाने की सलाह दी थी ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। संकट के बीच विदेशी मुद्रा संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने एक वर्ष के लिए सोने की खरीद और विदेशी यात्राओं को स्थगित करने का भी आह्वान किया।
प्रधानमंत्री की यह दूसरी अपील है। हालांकि विपक्ष द्वारा जमकर आलोचना हो रही है। आरोप है कि सरकार को प्रशासनिक फिजूलखर्ची पर रोक लगानी चाहिए। जनप्रतिनिधियों को अपना पेंशन, भत्ता आदि में कटौती करनी चाहिए। प्रधानमंत्री के विदेश दौरे की भी जमकर आलोचना हो रही है। प्रध्धनमंत्री किसी भी प्रकार की आपदा को अवसर में बदलना जानते हैं। पहले कृत्रिम वैश्विक महामारी कोरोना, फिर रुस-यूक्रेन युद्ध और अब अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया है। फिलवक्त मौजूदा वैश्विक संकट से भारत को निजात दिलाने और उससे प्रभावित हो रहे आम भारतीयों के हितों की रक्षा करने के लिए ही उन्होंने विदेशी मुद्रा बचाने, आयातित वस्तुओं का उपयोग मितव्ययितापूर्वक करने और उनके मौजूद देशी विकल्प को आजमाते हुए स्थायी हल निकालने और उन पर निर्भर होने की दिशा में जन सहयोग का आह्वान सबको चौंका दिया है। सरकार विरोधी ताकतों द्वारा फिर से लॉकडाउन की अफवाह फैलाने की मुहिम चलाई जा रही है जिससे देश की जनता में एक भय का माहौल व्याप्त हो गया है।
ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि अमेरिका, चीन, यूरोप और अरब के कुछ देशों द्वारा लगातार भारत विरोधी षड्यंत्र किए जा रहे हैं। कोई अपना इस्लामिक एजेंडा भारत पर थोपना चाहता है तो कोई भारत-रुस के भरोसेमंद संबंधों में चलीता लगाना चाहता है और कोई भारत को पाकिस्तान, बंग्लादेश और चीन के त्रिपक्षीय कुचक्र में उलझा कर अपना आर्थिक हित साधना चाहता है। उल्लेखनीय है कि ऐसे आह्वानों के मुख्य आमतौर पर आयात कम करना, आत्मनिर्भरता बढ़ना खासकर तेल, इलेक्टानिक्स, रक्षा, खाद्य तेल जैसी चीजों में विदेशी निर्भरता घटाना, लोकल खरीदें और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की बात इसी से जुड़ती है। स्पष्ट है कि यदि बयान ऐसे समय आए जब तेल महंगा हो, डॉलर मजबूत हो या वैश्विक संकट हो, तो यह आर्थिक सावधानी का संकेत भी माना जा सकता है। हालांकि जरुरी नहीं कि संकट ही हो।




