हजारीबाग की लेखिका अनीता मिश्रा ‘सिद्धि’ से राजीव कुमार झा की बातचीत

साहित्य: साक्षात्कार

 

प्रश्न 1: पटना आपका शहर है। यहां हिंदी साहित्य सम्मेलन की आप संरक्षिका हैं। बिहार में हिंदी साहित्य के प्रति इस संस्था की भूमिका के बारे में बताएं।
उत्तर: बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन बिहार की सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में से एक है। इसकी स्थापना हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण तथा संवर्धन के उद्देश्य से 19 अक्टूबर 1919 को मुज़फ्फरपुर में हुई थी। 1935 में इसका मुख्यालय पटना स्थानांतरित किया गया। यह संस्था साहित्यकारों, कवियों, शोधार्थियों और नवोदित रचनाकारों के लिए एक सशक्त मंच प्रदान करती रही है। सम्मेलन की ओर से समय-समय पर कवि-गोष्ठियाँ, पुस्तक-लोकार्पण, व्याख्यानमालाएँ, साहित्यिक संगोष्ठियाँ, महाधिवेशन, सम्मान समारोह तथा हिंदी पखवाड़ा जैसे विविध आयोजन किए जाते हैं। बिहार में हिंदी के प्रचार-प्रसार, साहित्यिक चेतना के विकास और नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने में सम्मेलन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इस संस्था के विकास में डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पंडित जगन्नाथ प्रसाद का विशेष योगदान रहा है। सम्मेलन के अध्यक्ष पद को डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, आचार्य शिवपूजन सहाय, डॉ. लक्ष्मी नारायण ‘सुधांशु’ जैसे विद्वानों ने सुशोभित किया है। वर्तमान में डॉ. अनिल सुलभ इस पद पर हैं।

प्रश्न 2: आप देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लेखन करती हैं। आपकी पुस्तकों का भी प्रकाशन हुआ है। इन सबके बारे में जानकर मुझे खुशी होगी।
उत्तर: मेरा प्रकाशित काव्य संग्रह ‘अनमनी सी शाम है’ बोधरस प्रकाशन से प्रकाशित है। इसके अतिरिक्त मेरा दोहा संग्रह, गीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह और लघुकथा संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। देशभर की अनेक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और ई-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। अब तक 60 से अधिक साझा काव्य संकलनों में मेरी रचनाएँ सम्मिलित हो चुकी हैं। इनमें अहसास एक पल, मन की बात, एक पृष्ठ मेरा भी, भाषा सहोदरी, निहारिका, साहित्य सरिता, पलाश, पंखुड़ी, हस्ताक्षर, लघुकथा, लघुकथा के प्रहरी, लघुकथा कलश आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 3: अपने घर-परिवार, माता-पिता, शिक्षा-दीक्षा के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर: मेरा नाम अनीता मिश्रा ‘सिद्धि’ है और मेरा जन्मस्थान आरा, भोजपुर है। मेरे पिता का नाम श्री श्याम देव उपाध्याय और माता का नाम श्रीमती तारा उपाध्याय है। मेरे पति श्री मोहन मिश्रा हजारीबाग, झारखंड में वन अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। मेरे दो पुत्र हैं – बड़े पुत्र आदित्य प्रकाश बी.टेक और एम.बी.ए. हैं तथा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं, जबकि छोटे पुत्र अनुज मिश्रा डिजिटल क्रिएटर हैं। मैंने वनस्पति विज्ञान से मगध विश्वविद्यालय, गया से स्नातक किया है। हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेजी भाषाओं पर मेरी अच्छी पकड़ है। लेखन में मैं ग़ज़ल, गीत, दोहा, अतुकांत कविता, छंद, लघुकथा, आलेख और कहानी जैसी विभिन्न विधाओं में लिखती हूँ। भोजपुरी में भी सृजन करती हूँ और कई लघुकथाओं का अनुवाद कर चुकी हूँ। वर्तमान में मैं एक लघुकथा पुस्तक का अनुवाद कर रही हूँ। इसके अतिरिक्त मैं मंच संचालन भी करती हूँ। साहित्य सेवा के लिए मुझे विक्रमशिला विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा के कार्य हेतु डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है और विभिन्न मंचों से मुझे कई सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।

प्रश्न 4: पटना के अलावा हजारीबाग में भी आप रहती हैं। इसके बारे में बताएं।
उत्तर: हजारीबाग मेरी कर्मस्थली रही है। यहीं मेरे पति देव वन विभाग में पदस्थापित थे। मैंने लेखन की शुरुआत यहीं से की। यहाँ के राष्ट्रीय उद्यान से भी मैं जुड़ी रही और प्रकृति के निकट रहकर लेखन को नई ऊर्जा मिली। हजारीबाग झारखंड का एक प्रमुख एवं ऐतिहासिक नगर है जिसे ‘हजार बागों का नगर’ कहा जाता है। यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली और सुहावने मौसम के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का हजारीबाग वन्यजीव अभ्यारण्य और विनोबा भावे विश्वविद्यालय इसे शैक्षणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।

प्रश्न 5: आपका भोजपुरी भाषा और साहित्य से भी प्रेम है। इसमें आपने अनुवाद कार्य किया है। भोजपुरी से अपने आत्मिक रिश्तों के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर: मैं आरा, भोजपुर से हूँ और भोजपुरी मेरी मातृभाषा है। इसलिए इस भाषा से मेरा आत्मिक जुड़ाव स्वाभाविक है। मेरे दादाजी डॉ. बलदेव उपाध्याय को साहित्य के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। वे ही मेरी प्रेरणा बने और साहित्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। भोजपुरी की मिट्टी, लोकजीवन और संस्कारों ने मेरे लेखन को गहराई दी है। मैंने कई रचनाओं का भोजपुरी में अनुवाद भी किया है।

प्रश्न 6: अपने प्रिय लेखकों और कवियों के बारे में बताइए।
उत्तर: मेरे प्रिय साहित्यकारों में मुंशी प्रेमचंद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और सतीशराज पुष्करणा प्रमुख हैं। मुंशी प्रेमचंद सामाजिक विषमता और ग्रामीण जीवन के सशक्त चित्रकार थे। गोदान, गबन, निर्मला, कफ़न जैसी रचनाएँ मुझे बहुत प्रभावित करती हैं। सुमित्रानंदन पंत छायावादी कवि थे जिनकी कविताओं में प्रकृति और मानवता का अद्भुत समन्वय मिलता है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हिंदी कविता के युग प्रवर्तक थे। राम की शक्ति पूजा, सरोज स्मृति जैसी रचनाएँ कालजयी हैं। सतीशराज पुष्करणा हिंदी लघुकथा के विकास में एक स्तंभ रहे। उनके लेखन में समकालीन समाज का यथार्थ प्रभावशाली ढंग से उभरता है।

प्रश्न 7: पुरानी पीढ़ी के लेखक अब ज्यादातर गुजर गए हैं। इनमें से कुछ लेखकों से जुड़ी अपनी यादों को साझा करें।
उत्तर: अपने प्रिय लेखकों से व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर नहीं मिला। केवल आदरणीय सतीशराज पुष्करणा जी से पटना की एक साहित्यिक गोष्ठी में भेंट हुई। उस समय मैं केवल कविता और ग़ज़ल लिखती थी। उन्होंने लघुकथा विधा के बारे में बताया तो मैंने जिज्ञासावश एक लघुकथा सुनाई। उन्होंने प्रोत्साहित करते हुए कहा, “आप लघुकथा लिखना जानती हैं।” उनके प्रोत्साहन से ही मैंने लघुकथा लिखना शुरू किया। दुर्भाग्य से उनका सान्निध्य बहुत कम समय मिला और काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। उनकी कमी आज भी खलती है।

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