*राष्ट्रवादी पत्रकारिता का महत्व*
समाज सेवी व पत्रकार बलवान सिंह*
देवर्षि नारद को आद्य पत्रकार माना जाता है। वह मानव कल्याण के लिए ही संवाद संप्रेषण करते थे। आज पत्रकार मित्रों को नारद जी के चौरासी सूत्रों को समझने की आवश्यकता है। यह भी समझना होगा कि राष्ट्र सर्वोच्च है। सनातन संस्कृति में भी विश्व कल्याण और सर्वे भवन्तु सुखिन की कामना है। राष्ट्र और सनातन की सर्वोच्च मान कर चलना होगा। राष्ट्र और सनातन है,तभी हम है। तभी मानव कल्याण होगा। युद्ध की परिस्थितियों में पत्रकारों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में हमको राष्ट्र की सुरक्षा और सेना के मनोबल का पूरा ध्यान रखना चाहिए। सरकार से किसी की नाराजगी हो सकती है। प्रजातंत्र है। लेकिन युद्ध काल में सभी मतभेद भुलाकर राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन होना चाहिए। आज
मीडिया का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के साथ अब सोशल मीडिया की भी बाढ़ है। लेकिन यह सब तभी तक सार्थक है, जब तक इनके सामाजिक सरोकार भी है। इसके निर्वाह के लिए भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रह आवश्यक है। भारत में देवर्षि नारद ने ही पत्रकारिता का प्रादुर्भाव किया था। उनके चौरासी सूत्र आधुनिक पत्रकारिता के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं। उनकी सभी बात आज की मीडिया पर न केवल लागू होती है, बल्कि उनपर अमल से मीडिया को आदर्श रूप दिया जा सकता है। लेकिन आधुनिक वामपंथी खेमे पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति की घोर अवहेलना की। उदारीकरण और वैश्वीकरण ने नया संकट पैदा किया है। ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता के महत्व को बनाये रखने की चुनौती है। इसमें धीरे धीरे सफलता भी मिल रही है।
पत्रकारिता को धर्म मानकर काम करने वाले ही सफल होते है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आदर्श अपेक्षित हैं। उनके पालन से ही समाज व राष्ट्र का हित सुनिश्चित होता है। इन आदर्शों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। समाचार सम्प्रेषण में स्पष्टता व गुणवत्ता रहनी चाहिए। इससे प्रामाणिकता कायम होती है। साथ ही समाज का भी कल्याण होता है। उसी के आधार पर देश का लोकतंत्र स्वस्थ बना रहेगा। देश के लोकतंत्र का स्वस्थ बने रहना समग्र विकास के लिए आवश्यक शर्त है। समाज जागरूक होकर सही दिशा में चलता है तभी लोकतंत्र सफल होता है। आज ऐसी ही ध्येयवादी पत्रकारिता की आवश्यकता है।
भारतीय पत्रकारिता का वामपंथी विचारों ने नुकसान किया है। इसके लिए वामपंथियों ने अपना स्वरूप भी बदला है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार समाज की व्याख्या की थी। उसने समाज को दो वर्गों में बांटा था। पहला पूंजीपति और दूसरा सर्वहारा। पूंजीपति सदैव सर्वहारा का शोषण करता है। दोनों में संघर्ष चलता रहता है। यह वामपंथियों, मार्क्सवादियों, माओवादियों, नक्सलियों का मूल चिंतन रहा है। इसमें अनेक बदलाव भी होते रहे। भारत के वामपंथियों ने मीडिया में अपना सांस्कृतिक विचार चलाया है। इसमें मार्क्स का आर्थिक चिंतन बहुत पीछे छूट गया। पूंजीपति और सर्वहारा की बात बन्द हो गई। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों की बात करना शुरू कर दिया। लेकिन वर्ग संघर्ष के चिंतन को बनाये रखा। ये कथित प्रगतिशील पत्रकार हिन्दू और मुसलमानों के संघर्ष की रचना करने लगे। इन्होंने यह मान लिया इनका वर्ग संघर्ष चलता रहेगा।
वामपंथी रुझान वाले यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सवर्ण और दलित के बीच भी वर्ग को हवा देना शुरू किया। वामपंथी रूझान की पत्रकारिता ने हिंदुओं के विरोध को अपना पैशन बना लिया। वर्ग संघर्ष के सिद्धांत पर उन्होंने यह विचार फैलाया की हिन्दू शोषक और मुसलमान शोषित है। इसीलिए पश्चिम बंगाल और केरल की राजनीतिक हिंसा उन्हें दिखाई नहीं देती। किंतु कुछ लोग मजहब के आधार पर समाज विरोधी कार्य करें, यह कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करें, तो इसे भगवा आतंकवाद के रूप में प्रसारित किया जाता है। स्वतंत्रता के बाद से ही वामपंथी विचारकों को लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके द्वारा बनाये गए पाठ्यक्रम को शिक्षा में चलाया गया। इसमें भारत के प्रति हीन भावना का विचार था। प्राचीन भारतीय विरासत को खारिज किया गया। यह पढ़ाया गया कि विदेशी शासन ने भारत को सभ्य बनाया। जबकि वह स्वयं सभ्यताओं के संघर्ष करने वाले लोग थे। भारत तो सबके कल्याण की कामना करने वाला देश रहा है। वर्तमान परिस्थितियों पर भी हमारे समाज को विचार करना चाहिए। क्या कारण है कि पाकिस्तान की मीडिया में भारत के सेक्युलर नेताओं के बयान खूब चलाए जा रहे है। ऐसे में भारत के राष्ट्रवादी पत्रकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उन्हें भारतीय सेना का मनोबल गिराने वाले बयानों का प्रतिकार करना है। एक भारत श्रेष्ठ भारत, शक्तिशाली भारत और राष्ट्रीय स्वाभिमान को बढ़ाने वाले बयानों व कार्यों से जन मानस को अवगत कराना चाहिए।
स्पष्ट है कि आज राष्ट्रवादी पत्रकारिता की आवश्यकता है



