नेपाल में हिंसक विद्रोह
रिपोर्ट : विनय चतुर्वेदी (स्पेशल कोरेस्पोंडेंट )/ अजित चौबे
नेपाल बीते तीन दिनों से जल रहा है. हर तरफ हंगामा मचा हुआ है. हर कोई जानना चाहता है कि इस हिंसा की वजह क्या है.
नेपाल हमेशा एक संप्रभु स्वतंत्र राष्ट्र रहा है, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भी बचा रहा। 1814-1816 के दौरान एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद हुई सुगौली की संधि ने नेपाल के बड़े भूभाग को ब्रिटिश भारत को सौंप दिया था, लेकिन नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र बना रहा।
नेपाल 1951 से संसदीय लोकतंत्र है, लेकिन 1960 और 2005 में दो बार नेपाली सम्राटों ने इसे निलंबित कर दिया था. 1990 के दशक में और 2000 के दशक की शुरुआत में नेपाली गृहयुद्ध के परिणामस्वरूप 2008 में एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की स्थापना हुई, जिसने दुनिया की आखिरी हिंदू राजशाही को समाप्त कर दिया
2015 में अपनाया गया नेपाल का संविधान, देश को सात प्रांतों में विभाजित एक धर्मनिरपेक्ष संघीय संसदीय गणराज्य के रूप में स्थापित करता है. नेपाल 1955 में संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना, और 1950 में भारत और 1960 में चीन के साथ मैत्री संधियों पर हस्ताक्षर किए. नेपाल सार्क के स्थायी सचिवालय की मेजबानी करता है, जिसका यह एक संस्थापक सदस्य है (SAARC Headquarter). नेपाली सशस्त्र बल दक्षिण एशिया में पांचवां सबसे बड़ा हैं (Nepal Military Power).
17 साल पहले 28 मई 2008 को नेपाल एक गणतांत्रिक देश बना था.
हिमालय से सटे इस राष्ट्र में अचानक भड़के इस विरोध प्रदर्शन की पाँच मुख्य वजहें बताई जा रही हैं.
नेपाल के मौजूदा संकट के लिए कुछ विश्लेषक ओली प्रशासन के चार सितंबर को दिए गए आदेश को ज़िम्मेदार मान रहे हैं. इस आदेश में उन्होंने फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, ट्विटर, यूट्यूब और एक्स सहित 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया था.
नेपाल में सोशल मीडिया बैन के विरोध में उतरे Gen-Z प्रदर्शनकारियों ने जमकर हंगामा किया. नेपाल में युवाओं के इस प्रलयकारी आंदोलन में कई सरकारी इमारतों में आग लगा दी गई थी. इसमें सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद भवन तक शामिल हैं. कई मंत्रियों व पूर्व प्रधानमंत्रियों के घरों पर हमला बोला गया. इन घटनाओं ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा हालांकि राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल, काठमांडू के मेयर बालेन शाह और आर्मी चीफ की अपील के बाद प्रदर्शनकारी शांत हुए. इसके बाद सुशीला कार्की को नेपाल का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया.
इस विरोध प्रदर्शन में न केवल राजधानी काठमांडू की ज़्यादातर ऐतिहासिक और आधुनिक इमारतों को आग लगा दी गई बल्कि इसके कारण प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपना पद भी छोड़ना पड़ा.
सरकार का कहना था कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद इन टेक कंपनियों ने नेपाल के क़ानूनों और नियमों का पालन नहीं किया.
सोशल मीडिया पर इन प्रतिबंधों के कारण उन लाखों नेपाली यूज़र्स को असुविधा हुई, जो इनका प्रयोग ज़रूरी जानकारी हासिल करने और कम्युनिकेशन के लिए करते थे.
डेटा रिपोर्ट-ग्लोबल डिजिटल इनसाइट्स के अनुसार नेपाल के करीब 55 प्रतिशत (1.6 करोड़ से ज़्यादा) लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा मौजूद है और इसमें से 50 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं.
चार सितंबर को प्रतिबंध के बाद नेपाल के लोगों की पहुंच केवल वाइबर और टिकटॉक जैसे ऐप्स तक सीमित हो गई. इसके कारण कई लोगों को चैट करने के लिए फेसबुक मैसेंजर या व्हाट्सएप से अचानक वाइबर और अन्य माध्यमों को डाउनलोड करना पड़ा.
नेपाल सरकार ने पहले टिकटॉक पर भी प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन नियमों का पालन करने पर सहमति जताने के बाद फिर से इसे अनुमति दी गई थी.
इससे पहले, नेपाल में सोशल मीडिया यूज़र्स के बीच ‘नेपो किड्स’ नामक एक सोशल मीडिया कैंपेन ट्रेंड कर रहा था. इसमें उन बच्चों को निशाना बनाया गया था जो भाई-भतीजावाद और राजनीतिक संबंधों का लाभ उठा रहे थे.
आठ सितंबर को जब करीब 14 से 28 साल की आयु वर्ग के ‘जेन ज़ी’ पहले दिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरे, तो उनकी मांगों में अन्य चिंताएं भी शामिल थीं
इस विरोध प्रदर्शन में जेन ज़ी प्रदर्शनकारियों ने ‘भ्रष्टाचार ख़त्म करो’ और ‘सोशल मीडिया नहीं, भ्रष्टाचार पर प्रतिबंध लगाओ’ लिखे हुए प्लेकार्ड भी दिखाए.
इसके बाद जैसे-जैसे प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती गई, उनमें से कुछ नेपाल के मंत्रालयों के मुख्यालय, सिंह दरबार और संसद परिसर की दीवारों पर चढ़ने लगे, जिसके बाद पुलिस कार्रवाई शुरू हो गई.
पुलिस के दागे गए आंसू गैस के गोलों, रबड़ की गोलियों और फ़ायरिंग में देश भर में कई प्रदर्शनकारी मारे गए.
नेपाल पिछली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तब सुर्खियों में आया था जब राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और दुर्गा प्रसैन (विवादास्पद व्यवसायी) के नेतृत्व वाले समूह ने इस साल मार्च के अंत में काठमांडू में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए थे. लोग लोकतंत्र और राजशाही में से क्या चुने इस दुविधा की वजह से ये बार बार पुनरावृति हुआ।



