अटल वाजपेयी जयंती पर राष्ट्रव्यापी कवि सम्मेलन का आयोजन
देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित उत्तरांचल प्रेस क्लब में स्नेह संबंध फाउंडेशन द्वारा भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की पावन जयंती तथा वरिष्ठ साहित्यकारा डॉ. सीमा बिरला के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर एक भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ शारदे जी के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री भूपेंद्र कंडारी जी, अध्यक्ष—उत्तरांचल प्रेस क्लब, देहरादून रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री गौरव विवेक एवं श्री एस. डी. शर्मा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप मायूस ने की, जबकि संचालन वरिष्ठ कवयित्री मीनाक्षी दिनेश ने अत्यंत कुशलता से किया।
शामली से पधारे वरिष्ठ शायर प्रदीप मायूस ने अपनी रचना से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते हुए पढ़ा—
“दुनिया वाले तो इसी बात से जल जाते हैं,
हम भरी भीड़ से आगे जो निकल जाते हैं।”
प्रसिद्ध शायर वसीम झिंझानवी ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से भावपूर्ण प्रस्तुति दी—
“तेरे नज़दीक आना चाहता है,
ये दिल फिर चोट खाना चाहता है।”
कवयित्री डॉ. रजनी चौहान ने सशक्त स्वर में सुनाया—
“मुझे तो चाह कर भी ज़ब्त कर सकता नहीं दरिया,
मेरी ख़ुद्दारियों की वुसअते दरिया से हैं ज़्यादा।”
वरिष्ठ साहित्यकारा डॉ. सीमा बिरला ने अटल जी को याद करते हुए उनकी कविता का एक अंश पढ़ा एवं उनके लेखन को प्रणाम करते हुए सामाजिक चेतना से ओतप्रोत पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं—
“लक्ष्य न ओझल होने पाए,कदम मिलाकर चल
मंजिल तेरे पग चूमेगी आज नहीं तो कल “
“बहन-बेटियों को नज़र से बचाना,
कि अब बाड़ ही खेत खाने लगे हैं।”
कवयित्री शोभा पराशर ने मानवीय एकता का संदेश देते हुए पढ़ा—
“बँटे हैं जाति-धर्मों में, ये अपनों की शरारत है,
लहू का रंग सबका एक, ये उस रब की इनायत है।”
कवि अनिल पोपट ने हास्य-व्यंग्य से सभागार को ठहाकों से गूँजा दिया—
“उसने अपने गुस्से पर क़ाबिज़ होना सीख लिया,
जब से हमने घर के बर्तन कपड़े धोना सीख लिया।”
कार्यक्रम में विपिन चंदेलिया, सुरजीत सिंह, राजेश राज पंजाबी, डॉ. निखिल चौहान, रमेश चंद्रा, सोनू कश्यप सहित अनेक गणमान्य साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
समारोह सौहार्दपूर्ण वातावरण एवं सराहनीय काव्य-प्रस्तुतियों के साथ सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ।




