“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः”
शुरू हुआ मां दुर्गा पूजा,हाथी पर आई है मां भक्तों का करेंगी कल्याण ।
अजित प्रसाद/ सिलीगुड़ी: शक्ति की साधना का महापर्व आज से प्रारंभ हो रहा है। पंचांग के अनुसार इस साल नवरात्रि का महापर्व 9 की बजाय 10 दिनों तक मनाया जाएगा क्योंकि इस साल चतुर्थी तिथि की वृद्धि हो रही है। पर्व और त्यौहार हमेशा से ही भारतीय संस्कृति की पहचान रही है। इस कड़ी में शारदीय नवरात्र का त्यौहार सोमवार आज से प्रारंभ हो गया है। शक्ति उपासना के मार्ग में चार नवरात्र की चर्चाएं हैं।आज घटस्थापना के लिए सुबह 06:28 मिनट से सुबह 08:20 मिनट तक और दोपहर 12:08 से दोपहर 12:56 मिनट तक शुभ मुहूर्त है। चलिए अब जानते हैं 22 सितंबर 2025 को ग्रहों की स्थिति कैसी रहेगी।साथ ही आपको सोमवार के दिन के योग, करण, नक्षत्र और दिशा शूल आदि के बारे में पता चलेगा।आज के दिन घर-घर माता रानी के स्वागत के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
आज नवरात्रि के पहले मां दुर्गा के नौ रूपों में पहले रूप देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शारदीय नवरात्रि में आज पहले दिन भक्तजन घर में कलश स्थापना, घट स्थापना और मां दुर्गा के पहले रूप शैलपुत्री की पूजा करके नवरात्रि की शुरुआत करते हैं. आइये जानते हैं आज कैसे करें मां दुर्गा का स्वागत.
इस विधि से करें माता रान: सुबह उठकर स्नान करके घर की साफ-सफाई करें और पूजन स्थान को गंगाजल से शुद्ध करे।
कलश स्थापना के लिए मिट्टी या तांबे के पात्र में जल, सुपारी, अक्षत, सिक्का, आम्रपल्लव और नारियल रखकर उसे लाल चुनरी से ढकें।मिट्टी से भरे पात्र में आज के दिन जौ बोना बहुत शुभ माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करें. मां को सफेद फूल, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
“ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः” मंत्र का जाप करते हुए मां शैलपुत्री की पूजा करें और घी का भोग लगाएं।शैलपुत्री स्वरूप की बात करें, तो उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल है, और वे नंदी बैल पर सवार रहती हैं. माता दुर्गा का ये रूप शक्ति, सौम्यता और धैर्य का प्रतीक माना जाता है।।तो चलिए जाते हैं आज नवरात्रि के पहले दिन कैसे करें माता शैलपुत्री की पूजा? क्या है माता शैलपुत्री की कथा ?
मां शैलपुत्री की पूजा विधि: आज नवरात्रि का पहला दिन है और नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है, ऐसे में आप सुबह जल्दी उठकर स्नान कर ले और साफ कपड़े पहन ले. इसके बाद मां शैलपुत्री की मुर्ती या चित्र के सामने दीपक जलाएं और पूजा के साथ ही जल, पुष्प, दूर्वा, अक्षत, फल, नैवेद्य आदि अर्पित करें और माता का ध्यान करें और नवरात्रि के पहले दिन व्रत का संकल्प लेने के लिए हथेली में जल, चावल और फूल रखकर, भगवान गणेश को साक्षी मानकर, अपनी मनोकामना बताते हुए, और किसी भी स्थिति में व्रत को पूर्ण करने का निश्चय करें।मां शैलपुत्री के पूजन का महत्व; माता दुर्गा के शैलपुत्री रूप की पूजा करने से जीवन में सुख, शांती और समृद्धि आती है और कठिन तप और भक्ति भाव मां शैलपुत्री की उपासना से मनचाहा वरदान प्राप्त होता हैं. विवाह और दांपत्य जीवन में सुख-शांति के लिए भी मां शैलपुत्री की पूजा फलदायक होती है. इसके अलावा माता दुर्गा के शैलपुत्री रूप की पूजा से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।2025 में पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर, सोमवार से आरंभ हो रही है। इसका अर्थ है कि मां दुर्गा इस बार हाथी पर सवार होकर आ रही हैं। यह संकेत है कि आने वाले वर्ष में भरपूर वर्षा, उर्वरता और समृद्धि का वातावरण रहेगा। यह मान्यता केवल लोक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के परिवर्तन का द्योतक है।
पौराणिक दृष्टि से देखा जाए तो मां दुर्गा का मुख्य वाहन शेर है, जो शक्ति, पराक्रम और साहस का प्रतीक है। लेकिन नवरात्रि के नौ दिनों में बदलती हुई सवारियां ब्रह्मांडीय चक्र और प्रकृति के विविध रूपों को दर्शाती हैं। यही कारण है कि भक्त माता की हर सवारी को शुभ संकेत और भविष्य का दर्पण मानते हैं।
महालया में रहा आनंद और उत्सव का संगम:
महालया यानी महान आगमन का आधार या शुरुआत. बंगाल में इसी दिन से दुर्गापूजा की शुरुआत मानी जाती है. महालया आश्विन मास की अमावस्या को मनाया जाता है. इस दिन पितृपक्ष का अंत होता है और देवी दुर्गा का आगमन पृथ्वी पर होता है. महालया के अगले दिन यानी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानी प्रतिपदा के साथ ही शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो जाती है. पूरे भारत में नवरात्रि की शुरुआत शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है, लेकिन बंगाल में दुर्गा पूजा की शुरुआत महालया से होती है. दुर्गापूजा यानी नवरात्रि के मौके पर ही देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर का वध किया था।क्या है महालया?
महालया यानी देवी दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन का संकेत और पितृपक्ष का समापन. इस दिन से देवी पक्ष की शुरुआत हो जाती है. हिंदू मान्यता के अनुसार महालया के दिन ही मां दुर्गा अपने दिव्य निवास स्थान से पृथ्वी पर आगमन प्रारंभ करती हैं. बंगाल के लोग यह मानते हैं कि महालया के दिन ही देवी दुर्गा अपनी चार संतान गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ पृथ्वी के लिए प्रस्थान करती हैं. एक ओर जहां मां दुर्गा बुराई का अंत कर अच्छाई की स्थापना के लिए पृथ्वी पर आती हैं, वहीं उनकी चार संतान गणेश (सिद्धि और समृद्धि के देवता),कार्तिकेय (शौर्य और युद्ध के देवता),लक्ष्मी (धन और समृद्धि की देवी) एवं सरस्वती (ज्ञान और कला की देवी) अपने साथ अपनी कृपा भी लेकर आते हैं. इसी वजह से बंगाल में महालया का महत्व बहुत अधिक है. यह माता के आगमन का प्रतीक दिवस है. महालया के दिन ही मां दुर्गा की प्रतिमा में चक्षुदान किया जाता है यानी आंखों को आकार दिया जाता है.बंगाल में देवी पूजन का विशेष महत्व है. दुर्गा पूजा बंगालियों के लिए केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं. यह उनके लिए आपसी भाईचारा बढ़ाने का और समाज को जोड़ने वाला एक महोत्सव है. दुर्गा पूजा के मौके पर बंगाल में अहले सुबह यानी सुबह चार बजे घर का शुद्धिकरण किया जाता है, उसके बाद स्नान करके पितरों को जल अर्पित करके यानी उनकी विदाई करके मां दुर्गा का स्वागत किया जाता है. महालया के दिन बंगाली समाज ना सिर्फ घरों को शुद्ध करता है, बल्कि माता के स्वागत में सजावट भी करता है. ‘ऐशो मां आमार घोरे’ कहकर उनका स्वागत किया जाता है. चूंकि मां दुर्गा को बेटी स्वरूप मान कर उनकी पूजा की जाती है, इसी वजह से दुर्गा पूजा के मौके पर बंगाली विभिन्न पकवान बनाते हैं और माता को अर्पित करते हैं. इस मौके पर चंडी पाठ महिषासुर मर्दिनी को सुनने की परंपरा है. यह माना जाता है कि जब महिषासुर मर्दिनी बजता है तो मां दुर्गा अपने भक्तों पर दृष्टि डालती हैं, इसी वजह से बंगाली समाज महालया के दिन सुबह उठकर मां दुर्गा की स्तुति करता है. श्री ब्रह्मानंद बताते हैं कि महालया के मौके पर जो महिषासुर मर्दिनी का पाठ होता है उसमें दुर्गा सप्तशती के कुछ अंश और कुछ गाने हैं, जिनका सुरबद्ध पाठ होता है. इसे बांग्ला में ‘गीति आलेख्य’ कहा जाता है.
महालया के मौके पर मां दुर्गा की तैयारी में सज जाती है प्रकृति
देवी दुर्गा जब हिमालय से अपने चारों संतान के साथ प्रकृति के लिए प्रस्थान करती हैं तो पूरी प्रकृति उनकी स्वागत में सज जाती है. काश, पारिजात(हरसिंगार) और अपराजिता के फूल खिल जाते हैं. वर्षा ऋतु का अंत हो जात है और शरद की शुरुआत हो जाती. ठंडी हवाएं बहना शुरू हो जाती हैं, जो बहुत ही सुखद होती है. खेतों की हरियाली, नदियां और फूल सभी मां का स्वागत करते हैं.
दुर्गा पूजा के मौके पर बंगाल में मांसाहार की परंपरा
बंगाल में शाक्त परंपरा के तहत पूजा होती है, जिसमें देवी को सृष्टि का प्रधान माना गया है. श्री ब्रह्मानंद बताते हैं कि इस परंपरा के तहत पशुबलि दी जाती है. पहले बंगाल में महिषी (भैंस) की बलि होती थी लेकिन अब छागोल(बकरी का बच्चा, पाठा) की बलि होती है. बंगाल में नवरात्रि के मौके पर मछली को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है, इसी वजह से बंगाल में नवरात्रि के मौके पर भी मांसाहार का चलन है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि पहले पूजा के वक्त सिर्फ वही मांसाहार बनता था, जो भोग स्वरूप अर्पित होता था. उसको बनाने की विधि भी अलग होती थी, उसमें प्याज, लहसुन आदि का प्रयोग नहीं होता था. भोग का मांसाहार सिर्फ अदरक, जीरा और मिर्च में बनाया जाता था, अब इसमें बदलाव हो गया है और लोग अपनी सुविधा अनुसार मांसाहार खाते हैं. दुर्गा पूजा के अवसर पर बंगाल में उत्सव होता है, लेकिन वह मां दुर्गा के लिए उत्सव है, ना कि उत्सव के लिए मां दुर्गा हैं.
कैसे हुआ देवी का जन्म
असुरों के आतंक से जब देवता बुरी तरह त्रस्त हो गए तब उन्होंने त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) से रक्षा की गुहार लगाई. तीनों देवों ने अपनी शक्तियों को एकत्रित किया, तो उससे एक अद्भुत देवी दुर्गा का जन्म हुआ. देवी दुर्गा को सभी देवताओं ने अपने अस्त्रों से सुसज्जित किया. देवी दुर्गा को शक्ति का स्वरूप और सृष्टि की आधारशिला माना जाता है. दुर्गा पूजा के मौके पर उनसे सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संरक्षण की अर्चना की जाती है. देवी दुर्गा ने नवरात्रि के मौके पर ही महिषासुर का वध किया था. यह युद्ध बिना रूके नौ रात और नौ दिन तक चला था. दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था, जिसे विजयादशमी कहा जाता है।



