आज इस्कॉन में धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है राधाष्टमी
बड़ी संख्या में पहुंचे भक्त, गुंजा राधे - राधे, प्रसाद पाकर खुश हुए श्रद्धालु
अजित प्रसाद/ सिलीगुड़ी: सनातन धर्म में जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा चुका है। वहीं, अब राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस्कॉन सिलीगुड़ी में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि यानि आज राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। कृष्ण जन्माष्टमी को महामहोत्सव के रूप में मनाया था जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए थे। राधा अष्टमी को भी इस्कॉन रायगढ़ बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है।
यहां जन्माष्टमी के बाद राधा अष्टमी उनका सबसे बड़ा आयोजन है। मान्यता है कि राधा रानी की पूजा के बिना भगवान कृष्ण की भक्ति अधूरी मानी जाती है। ऐसे में राधा अष्टमी के दिन राधा रानी की आराधना की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस खास तिथि को श्री राधा रानी का अवतरण हुआ था। राधा अष्टमी के मौके पर राधा जी के साथ कृष्ण जी की पूजा भी की जाती है। इस्कॉन के नामकृष्ण दास ने बताया कि राधा अष्टमी श्री राधा जी का प्राकट्य दिवस है। आज के दिन श्री राधा जी के पूजन एवं आरती से भगवान कृष्ण का विशेष अनुग्रह प्राप्त होता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्री राधा रानी का जन्म मथुरा के बरसाना में हुआ था। इसलिए इस दिन को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है. जन्माष्टमी के बाद भाद्रपद माह में ही राधा अष्टमी के त्योहार को मनाया जाता है। इस्कॉन में आज श्री राधा अष्टमी मनायी जा रही है। राधा रानी की कथा, भोग अर्पण एवं महाआरती दोपहर 12:30 बजे से की गई। इसके बाद आयोजन में आए हुए सभी श्रद्धालुओं के बीच दोपहर 1:00 बजे से महाप्रसाद का वितरण किया गया। बताया कि राधा रानी भगवान की तीन शक्तियों में अंतरंगा, बहिरंगा व तटस्थ अंतरंग शक्ति है। राधा रानी और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है। बिना राधा रानी की कृपा से कृष्ण भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती. गोलोक धाम वृंदावन की मालकिन हैं। राधा रानी स्वयं भगवान की आह्लादिनी शक्ति हैं, जो नित्य प्रेम स्वरूप भगवान की सेवा में रत रहती हैं। इन्हें श्री जी के नाम से भी जाना जाता है। ब्रज की मालिकन होने के कारण इन्हें ब्रजेश्वरी भी कहते हैं, बिना राधा रानी की अनुमति के ब्रज क्षेत्र में प्रवेश करना असंभव सा होता है।
क्या है इस्कॉन: इस्कॉन (इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस) प्रचार केंद्र हरे कृष्ण आंदोलन के तहत एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जो भक्ति योग और कृष्ण भावनामृत को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। यहां हर दिन भक्तिमय माहौल में भजन कीर्तन और नाम संकीर्तन के आयोजन होते हैं, जो भक्तों को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं। यहां नियमित रूप से प्रवचन और व्याख्यान आयोजित किए जाते हैं, जिनमें भगवद गीता और अन्य वैदिक ग्रंथों की शिक्षाओं पर चर्चा की जाती है। इस्कॉन मंदिर में प्रसाद और साहित्य का वितरण किया जाता है, जिससे लोगों को कृष्ण भावनामृत के बारे में जानने का अवसर मिलता है। इस पर्व को राधाष्टमी और राधा जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को करने से श्री कृष्ण और राधा रानी की कृपा प्राप्त होती है। यहां पढ़ें व्रत की संपूर्ण कथा। राधा अष्टमी व्रत कथा: ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा के अनुसार श्रीकृष्ण भक्ति के अवतार देवर्षि नारद ने एक बार भगवान सदाशिव के श्री चरणों में प्रणाम करके पूछा हे महाभाग ! मैं आपका दास हूं. बताइए, श्री राधा देवी लक्ष्मी हैं या देवपत्नी. महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं? क्या वे अंतरंग विद्या हैं या वैष्णवी प्रकृति हैं? कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं? नारद जी की बात सुनकर सदाशिव बोले हे मुनिवर ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्री राधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं. उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी लज्जित हो रहा हूं. तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पार पा सके. उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने वाले श्रीकृष्ण को भी मोहित करने वाली है. यदि अनंत मुख से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है| नारदजी बोले हे प्रभो श्री राधिकाजी के जन्म का माहात्म्य सब प्रकार से श्रेष्ठ है. हे भक्तवत्सल ! उसको मैं सुनना चाहता हूं. हे महाभाग ! सब व्रतों में श्रेष्ठ व्रत श्री राधाष्टमी के विषय में मुझको सुनाइए. श्री राधाजी का ध्यान कैसे किया जाता है? उनकी पूजा अथवा स्तुति किस प्रकार होती है? यह सब मुझसे कहिए। हे सदाशिव! उनकी चर्या, पूजा विधान तथा अर्चन विशेष सब कुछ मैं सुनना चाहता हूं. आप बतलाने की कृपा करें. शिवजी बोले वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु महान उदार थे. वे महान कुल में उत्पन्न हुए तथा सब शास्त्रों के ज्ञाता थे| अणिमा-महिमा आदि आठों प्रकार की सिद्धियों से युक्त, श्रीमान्, धनी और उदारचेत्ता थे. वे संयमी, कुलीन, सद्विचार से युक्त तथा श्री कृष्ण के आराधक थे. उनकी भार्या श्रीमती श्रीकीर्तिदा थीं. वे रूप-यौवन से संपन्न थीं और महान राजकुल में उत्पन्न हुई थीं. महालक्ष्मी के समान भव्य रूप वाली और परम सुंदरी थीं. वे सर्वविद्याओं और गुणों से युक्त, कृष्णस्वरूपा तथा महापतिव्रता थीं. उनके ही गर्भ में शुभदा भाद्रपद की शुक्लाष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीवृन्दावनेश्वरी श्री राधिकाजी प्रकट हुईं|
‘हे महाभाग ! अब मुझसे श्री राधाजन्म- महोत्सव में जो भजन-पूजन, अनुष्ठान आदि कर्तव्य हैं, उन्हें सुनिए. सदा श्रीराधाजन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करनी चाहिए. श्री राधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाल्य, वस्त्र, पताका, तोरणादि नाना प्रकार के मंगल द्रव्यों से यथाविधि पूजा करनी चाहिए. स्तुतिपूर्वक सुवासित गंध, पुष्प, धूपादि से सुगंधित करके उस मंदिर के बीच में पांच रंग के चूर्ण से मंडप बनाकर उसके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं। उस कमल के मध्य में दिव्यासन पर श्री राधाकृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख स्थापित करके ध्यान, पाद्य-अघ्र्यादि से क्रमपूर्वक भलीभांति उपासना करके भक्तों के साथ अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिपूर्वक सदा संयतचित्त होकर उनकी पूजा करें।




