मध्य प्रदेश के सिहोरा के युवा कवि अखलेश कुमार मांझी से राजीव कुमार झा की बातचीत

साहित्य: साक्षात्कार

 

साहित्यिक परिचय
नाम: अखलेश कुमार मांझी
साहित्यिक नाम: ‘अखिल’
जन्मस्थान: ग्राम खभरा, तहसील सिहोरा, जिला जबलपुर, म.प्र.
वर्तमान पता: ग्राम खभरा, तहसील सिहोरा, जिला जबलपुर, म.प्र.

शिक्षा: एम.ए. हिन्दी साहित्य, एस.एस. कॉलेज सिहोरा, विश्वविद्यालय जबलपुर
साहित्यिक उपलब्धियां: विभिन्न साझा संग्रहों में ग़ज़लें प्रकाशित, प्रतिभा मंच द्वारा काव्य रत्न सम्मान

संपर्क: 9754272241 | akhleshkumarmanjhi@gmail.com

प्रश्नोत्तर

प्रश्न: आपने हिंदी का अध्ययन किया है। हिंदी का ज्ञान प्राप्त करके आपको जीवन की क्या सीख मिली है?
उत्तर: हिन्दी को भारत की सर्वश्रेष्ठ भाषा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी और मुझे गर्व है कि मैंने हिन्दी से अपनी शिक्षा पूर्ण की। हिन्दी भाषा का बोलचाल में उपयोग करने में गर्व महसूस करता हूँ। हिन्दी का अध्ययन कर मैंने उसकी विरासत और महत्व को समझा है। हिन्दी भारतीय संस्कृति का स्तंभ है जो हमें एक-दूसरे के भावों को स्पष्ट रूप से समझने में मदद करती है। इसी ज्ञान से मैंने अपने जीवन को सरल और आसान बनाया है।

प्रश्न: आप कहां के निवासी हैं? अपने घर-परिवार और शिक्षा-दीक्षा के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर: मैं अखलेश कुमार मांझी ‘अखिल’ ग्राम खभरा, तहसील सिहोरा, जिला जबलपुर, मध्य प्रदेश का रहने वाला हूं। मेरे पिताजी का नाम श्री रामस्वरूप मांझी एवं माताजी का नाम श्रीमती ज्ञान भाई मांझी है। मेरी प्राथमिक से हायर सेकेंडरी तक की शिक्षा मेरे ही गांव खभरा में हुई। माता-पिता ने विषम परिस्थितियों में मुझे पढ़ाया। आगे की शिक्षा मैंने एम.ए. हिन्दी साहित्य से एस.एस. कॉलेज सिहोरा, विश्वविद्यालय जबलपुर से प्राइवेट रूप से प्राप्त की है।

प्रश्न: साहित्य समाज में मनुष्य को संघर्ष और सामंजस्य का संदेश देता है। इस बारे में आपके विचार?
उत्तर: समाज में मनुष्य को हर समय संघर्ष से गुजरना पड़ रहा है और इस संघर्ष भरे जीवन में सामंजस्य बनाना आसान नहीं होता। साहित्य अपने शब्दों के माध्यम से गद्य व पद्य रूप में इसे वर्णित करता है। लेखक के समसामयिक विचार पाठक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और उन्हें जीवन में संघर्ष के साथ सामंजस्य बनाने में मदद करते हैं। जैसे दुष्यंत कुमार जी का शेर:

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

और मेरा एक मतला और शेर:

जो तुझे कम करे उससे घनघोर कर,
पर सदा के लिए दिल न कमज़ोर कर,
जो तुझे प्यार दे प्यार करना उन्हें,
जो करे तुझ को इग्नोर – इग्नोर कर

प्रश्न: आजकल समाज में जो बदलाव आ रहा है उनमें किन बातों को आप लोगों के जीवन के लिए ठीक नहीं समझते हैं?
उत्तर: आजकल समाज में पाश्चात्य सभ्यता की ओर आकर्षण बढ़ा है। विचारों में भिन्नता, संस्कृति और नैतिकता का पतन ये सभी मानव समाज के लिए ठीक नहीं हैं। और इसमें विराम लगाना असंभव-सा लग रहा है।

प्रश्न: साहित्य लेखन की प्रेरणा कहां से मिली? आप किन-किन विधाओं में लिखते हैं?
उत्तर: साहित्य लेखन की प्रेरणा मुझे 11वीं कक्षा में मिली। जहां बड़ी-बड़ी बातों को कवि एक-दो लाइन में कह देते थे। उनकी कविताओं को पढ़कर मन में आया कि मुझे भी कविता लिखनी है और मैं तुकबंदी करने लगा। मैं बाल कविता और ग़ज़ल लिखता हूं। मेरी मुख्य विधा ग़ज़ल है। लेखक के रूप में मेरे मन को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बात है – आज के समय में आदमी के चेहरे के अंदर छिपा दूसरा चेहरा। साथ ही साहित्य में व्याकरण का महत्व, जिसके बिना साहित्य पूर्ण नहीं होता। और प्रेम, विरह, नफ़रत आदि विषय मुझे छूते हैं।

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