रिटायर्ड कैप्टन ज्ञानेंद्र सिंह तंवर ने युद्ध की स्थिति में मांगी फिर से देश सेवा की इजाजत !
14 बड़े सैन्य अभियानों में की भागीदारी, सरहद के हीरो अब गांव में गढ़ रहे देश के सिपाही !
“भारत मां के लिए जान भी हाज़िर”— कैप्टन ज्ञानेंद्र सिंह तंवर
कोटपूतली-बहरोड़-
‘देश के लिए जीने और मरने का जज़्बा हो तो वर्दी जरूरी नहीं होती’ इसी सोच के साथ भारतीय सेना से रिटायर्ड कैप्टन ज्ञानेंद्र सिंह तंवर ने फिर से देश सेवा के लिए तैयार रहने की पेशकश की है। पाकिस्तान से बनते युद्ध जैसे हालात के बीच उन्होंने भारत सरकार से निवेदन किया है कि यदि जरूरत पड़ी तो उन्हें फिर से सेवा का अवसर दिया जाए।
30 वर्षों की सेवा, 19 साल सरहद पर, 14 से ज्यादा खतरनाक ऑपरेशन—–
राजपूत रेजीमेंट के इस बहादुर योद्धा ने अपने सैन्य जीवन में 14 से ज्यादा खतरनाक अभियानों में हिस्सा लिया। इनमें कारगिल युद्ध, अक्षरधाम एनएसजी ऑपरेशन, कंधार अपहरण संकट, नॉर्थ ग्लेशियर, ऑपरेशन मेघदूत, रिहानो (असम), ऑरचिड (नागालैंड) और दक्षिण अफ्रीका में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन शामिल हैं। वे 5 वर्षों तक एनएसजी कमांडो के रूप में देश की आंतरिक सुरक्षा का अहम हिस्सा रहे।
गांव में जलाई देशभक्ति की लौ—–
रिटायरमेंट के बाद तंवर ने अपने पैतृक गांव सरूण्ड में मुफ्त आर्मी ट्रेनिंग सेंटर और जिम की शुरुआत की। यहां वे युवाओं को सेना भर्ती की ट्रेनिंग देकर उन्हें अनुशासन, परिश्रम और देशप्रेम का पाठ पढ़ा रहे हैं। उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से अब तक दर्जनों युवा भारतीय सेना, पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों में भर्ती हो चुके हैं।
“हम सिर्फ रिटायर हुए हैं, निष्क्रिय नहीं”—-
कैप्टन तंवर का कहना है कि देश को जब जरूरत हो तो पूर्व सैनिकों को भी तैयार रहना चाहिए। हम घायल सैनिकों की मदद, रसद पहुंचाने, नागरिकों को सुरक्षित निकालने जैसे कार्यों में सरकार के सहयोगी बन सकते हैं। जरूरत पड़ी तो हथियार उठाकर दुश्मन से भी लोहा लेंगे।
युवाओं में जगा रहे देशसेवा का भाव—
कैप्टन तंवर गांव के मैदान में युवाओं को दौड़ाते हुए दिख जाते हैं। उनका मानना है कि देशभक्ति वर्दी से नहीं, सोच और कर्म से होती है। वे युवाओं को दिशा देने और उन्हें भारत मां का सच्चा सिपाही बनाने में प्रयासरत हैं।




