सुंदरबन ( पश्चिम बंगाल ) चुनावी वादों से दूर, मौत के साये में ‘ज़िंदगी के चुनाव’ की असली जंग

सुंदरबन के इस दुर्गम इलाके में शहद (मधु) इकट्ठा करना ज़िंदगी और मौत का संघर्ष

 

अजित प्रसाद, सुंदरबन ( पश्चिम बंगाल ) :पश्चिम बंगाल के कोने-कोने में इस वक्त चुनावी गर्मी चरम पर है। नेता मंचों से वादों की झड़ी लगा रहे हैं, लेकिन सुंदरबन के सीमांत गांव गुड़गुड़िया में हवा कुछ और ही कह रही है। यहाँ की महिलाओं और पुरुषों के लिए ‘वोट’ से कहीं बड़ी चुनौती ‘पेट की आग’ है। यहाँ हर सुबह लोकतंत्र का उत्सव नहीं, बल्कि जान हथेली पर रखकर जंगल की ओर कूच करने का संघर्ष शुरू होता है।सुंदरबन के इस दुर्गम इलाके में शहद (मधु) इकट्ठा करना ज़िंदगी और मौत के बीच का एक जुआ है। यहाँ के ग्रामीण टोलियां बनाकर गहरे जंगलों में निकलते हैं। हैरानी की बात यह है कि इस खतरनाक काम में अब परिवार की नई नवेली बहुएं भी शामिल हो रही हैं।खतरा: पानी में मगरमच्छ का खौफ और ज़मीन पर ‘रॉयल बंगाल टाइगर’ की दहाड़।

रणनीति: पुरुष ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर छत्ते तोड़ते हैं, जबकि नीचे खड़ी महिलाएं बाघ के हमले को रोकने के लिए पहरा देती हैं।साधन: मधुमक्खियों को भगाने के लिए पुआल जलाकर धुआं किया जाता है, जहाँ एक छोटी सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है।स्थानीय मधु संग्राहकों का आरोप है कि उन्हें जंगल में जाने के लिए ज़रूरी वैध पास (Legal Pass) नहीं मिल रहे हैं। प्रशासन की इस बेरुखी के कारण ये लोग जान जोखिम में डालकर छिपकर जंगलों में घुसने को मजबूर हैं।एक स्थानीय महिला ने बताया: “हमें नई बहू को भी साथ ले जाना पड़ता है, वरना चूल्हा कैसे जलेगा? सरकार पास नहीं दे रही, इसलिए हमें मजबूरी में सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना पड़ रहा है।” सुंदरबन के इन गांवों में वैकल्पिक आजीविका का कोई साधन नहीं है। सुरक्षा व्यवस्था न के बराबर है। दिनभर मौत से लड़कर जो थोड़ा-बहुत शहद हाथ आता है, उसे बेचकर बमुश्किल गुजारा हो पाता है।नेताओं के भाषणों में ‘सुंदरबन का विकास’ एक बड़ा मुद्दा होता है, लेकिन यहाँ के लोगों का मानना है कि चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलेंगी, पर बाघ के जबड़ों और प्रशासन की अनदेखी के बीच फंसी उनकी ज़िंदगी शायद ही कभी बदलेगी। उनके लिए असली चुनाव वही है जो वे हर सुबह जंगल में दाखिल होते वक्त लड़ते हैं।

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