तमिलनाडु के हिंदी प्रचारक और लेखक एस.अनंतकृषणन से राजीव कुमार झा की बातचीत…

साहित्य:साक्षात्कार

 

प्रश्न: तमिलनाडु में हिंदी के प्रति लोगों के हृदय में अब किस प्रकार का भाव है?

उत्तर: आम जनता हिंदी की आवश्यकता जानती हैं।
पर शासक दल 1965 से हिंदी के विरुद्ध प्रचार कर रहे हैं।
उनका वादा है कि हिंदी सीखना एक बोझ है।
हिंदी सीखने पर तमिल मिट जाएगी।
वास्तविकता यही है कि जीविकोपार्जन की भाषा अंग्रेज़ी है। अतः जनता केवल दसवीं कक्षा तक हिंदी सीखती है। उच्च शिक्षा अंग्रेज़ी है। नौकरी अंग्रेज़ी में। आज़ादी के बाद 1979 साल में जनता अंग्रेज़ी के पक्ष में।
अतः भारतीय भाषाएँ बाज़ारू हैं। केवल आम जनता के व्यावहारिक भाषा।
केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों को प्रबोध,प्राज्ञा, प्रवीण।
फिर भी सरकारी कामकाज अंग्रेज़ी में ही।
तमिलनाडु सख्त हिंदी विरोध केंद्र है।
चेन्नई विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग है।
पर छात्र संख्या अधिकतम बीस।
जैन महाविद्यालय,
गुरुनानक महाविद्यालय
हिंदू कालेज
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई
मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज
एस.आर.एम कालेज
आदि में हिंदी है।
लेकिन पढ़नेवाले कम।
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रचारक स्वतंत्र रूप में हिंदी का प्रचार प्रसार में लगकर दो लाख से ज़्यादा छात्रों को हिंदी के प्रति रुचि जगा रहे हैं। नयी सरकार भी हिंदी के पक्ष में नहीं, मुख्यमंत्री हिंदी सिनेमा में अभिनय करके धन कमा सकते हैं पर आम जनता को हिंदी सीखनी नहीं चाहिए।
ऐसे वातावरण में भी हिंदी के द्वारा हजारों प्रचारक कुछ न कुछ कार्य कर ही रहे हैं।
केंद्रीय विश्वविद्यालय तिरुचिरापल्ली के पास है।

प्रश्न:तमिलनाडु के हिंदी लेखकों की जानकारी दीजिए!

उत्तर: तमिलभाषी हिंदी लेखकों में डा.सुमतींद्र, शौरीरिजन डा. सुंदरम पी.के.बालसुब्रह्मणियम,
वीऴिनाथन, वी.एस. राधाकृष्णन,
अनंत कृष्णन, राजलक्ष्मी कृष्णन, जमुना कृष्णन,
और अनेक लेखक घड़े के दिया जैसे हैं।

प्रश्न: देश के हिन्दीभाषी राज्यों की यात्रा पर क्या आप कभी गये?

उत्तर : हिंदीभाषी क्षेत्र की यात्रा मैंने नहीं की है। देवनागरी लिपि परिषद द्वारा भाग लेने अपने खर्च में विशाखापट्टनम की यात्रा किया था।
1977 में हैदराबाद में अखिल भारतीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लिया। वंहाँ मैं ने भाषण भी दिया। उसी हैदराबाद में 2025में राजभाषा स्वर्ण जयंती के अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूम में भाग लिया।
भाषण भी दिया।
तेलंगाना के सांसद सुरंग मंत्री कृष्णा रेड्डीजी, आंध्रप्रदेश के उप मुख्यमंत्री पवन कल्याण जी, सांसद का डिप्टी स्पीकर चारों के साथ मंच पर बैठकर आदर सम्मान मिला।
कबीर कोहिनूर साहित्य अनुवाद पुरस्कार मिला।

प्रश्न:आप अपनी एक तमिल हिंदी रचना को यहां प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: यहां मेरी एक रचना तमिल के साथ प्रस्तुत है।

तमिल – हिंदी

தமிழ் ஹிந்தி பணி

नमस्ते वணக்கம்!

इस रचना में बचपन की सरलता, पारिवारिक आत्मीयता और आज के बदलते समय का मार्मिक चित्रण है।

नीचे परिष्कृत हिंदी रूप तथा तमिल अनुवाद प्रस्तुत है।

परिष्कृत हिंदी रूप

कागज़ी हवाई जहाज़

भारत की आज़ादी के

तीन वर्ष बाद जन्मा

हमारा बचपन

आज की पीढ़ी से

कितना भिन्न था।

न दूरदर्शन था,

न मोबाइल फोन,

न महंगे प्लास्टिक खिलौने।

घर की आर्थिक स्थिति भी

ऐसी न थी कि

खिलौनों पर धन खर्च हो।

फिर भी बचपन

आनंद से भरा था।

पीपल के पत्तों की सीटी,

बरसात में कागज़ की नावें,

गोली, लट्टू, गिल्ली-डंडा,

कागज़ की गेंद

और कागज़ी हवाई जहाज़—

यही हमारे खिलौने थे।

कागज़ को मोड़-मोड़कर

हवाई जहाज़ बनाना,

उसकी पूँछ सजाना,

फिर उसे उड़ाकर देखना—

कितना सुख देता था!

घर में

काका, चाचा, ताऊ, बुआ, चाची,

सब साथ रहते थे।

आज की तरह

पति-पत्नी का खुला प्रदर्शन

देखने को नहीं मिलता था,

पर परिवार बड़ा था,

घर बच्चों की किलकारियों से भरा रहता था।

कागज़ के खिलौने बनाने के लिए

कागज़ों की कमी पड़ती।

डाकघर से मिलने वाले

मनीऑर्डर फ़ॉर्म

अक्सर घर लाए जाते।

उन्हीं से

नाव, पंखा और हवाई जहाज़ बनते।

दादा, मामा और बड़े भाई

हमारे गुरु बन जाते।

हम सब उन्हें घेरकर बैठते

और उत्साह से सीखते।

फिर शुरू होती

हवाई जहाज़ उड़ाने की प्रतियोगिता।

कभी ईर्ष्या में

एक-दूसरे के जहाज़ फाड़ देना,

कभी झगड़ना,

कभी रूठना—

सब उसी बचपन का हिस्सा था।

पर आज का समय बदल गया है।

हर बच्चे के हाथ में

मोबाइल है।

घर छोटे हो गए,

संयुक्त परिवार टूट गए।

भाईचारे की बातें कम हो गईं।

अब बच्चे

मोबाइल खेलों में खोए रहते हैं।

न गली के खेल,

न कागज़ की नावें,

न कागज़ी हवाई जहाज़।

आज तो

रिमोट और डिजिटल विमान हैं,

पर अपने हाथों से

कागज़ मोड़कर

सपनों को उड़ाने का आनंद

कहीं खो गया है।

अब बच्चों के लिए

कागज़ी हवाई जहाज़

मानो केवल कल्पना की बात बनकर रह गया है।

தமிழ் மொழிபெயர்ப்பு

காகித விமானம்

எஸ். அனந்தகிருஷ்ணன், சென்னை

தமிழ்நாடு இந்தி அன்பர் பிரச்சாரகர் அவர்களின் சொந்த உணர்வுப்படைப்பு

27-5-2026

இந்தியா சுதந்திரம் பெற்ற

மூன்று ஆண்டுகளுக்குப் பிறகு

பிறந்த எங்கள் சிறுபருவம்

இன்றைய தலைமுறையிலிருந்து

மிக வேறுபட்டது।

அப்போது தொலைக்காட்சி இல்லை,

கைப்பேசி இல்லை,

விலையுயர்ந்த பிளாஸ்டிக் பொம்மைகள் இல்லை।

விளையாட்டு பொருட்கள் வாங்க

பணம் கூட அதிகம் இல்லை।

ஆனால் அந்தக் கால சிறுபருவம்

மகிழ்ச்சியால் நிரம்பியிருந்தது।

அரசமர இலை விசில்,

மழைக்கால காகிதப் படகு,

கோலி, பம்பரம், கில்லி-டண்டா,

காகிதப் பந்து,

காகித விமானம்—

இவையே எங்கள் விளையாட்டுப் பொருட்கள்।

காகிதத்தை மடித்து

விமானம் செய்வது,

அதற்கு வால் அமைப்பது,

பின்னர் அதை பறக்கவிடுவது—

எவ்வளவு மகிழ்ச்சி!

அப்போது வீட்டில்

மாமா, சித்தப்பா, பெரியப்பா, அத்தை, சித்தி

எல்லோரும் ஒன்றாக வாழ்ந்தனர்।

இன்றுபோல் வெளிப்படையான காதல் காட்சிகள் இல்லை।

ஆனால் வீடு முழுவதும்

குழந்தைகளின் சிரிப்பும் சலசலப்பும் நிரம்பியிருந்தது।

காகிதப் பொம்மைகள் செய்ய

காகிதம் கூட போதாது।

அஞ்சலகத்தில் கிடைக்கும்

மணிஆர்டர் படிவங்களையே

வீட்டிற்கு கொண்டு வந்து

அவற்றால் படகு, விசிறி, விமானம் செய்தோம்।

தாத்தா, மாமா, அண்ணன்

எங்கள் ஆசான்களாக இருந்தனர்।

அவர்களைச் சுற்றி அமர்ந்து

ஆர்வமாக கற்றுக்கொண்டோம்।

பின்னர் தொடங்கும்

விமானப் போட்டி।

சில நேரங்களில் பொறாமையால்

ஒருவரின் விமானத்தை மற்றொருவர் கிழித்துவிடுவோம்।

சண்டை, கோபம், அழுகை—

அவை எல்லாம் அந்த இனிய சிறுபருவத்தின் பகுதியே।

ஆனால் இன்று காலம் மாறிவிட்டது।

ஒவ்வொரு குழந்தையின் கையிலும்

கைப்பேசி உள்ளது।

கூட்டு குடும்பங்கள் குறைந்துவிட்டன।

அண்ணன்-தம்பி பாசமும்

நேரடி உரையாடல்களும் குறைந்துவிட்டன।

இப்போது குழந்தைகள்

மொபைல் விளையாட்டுகளில் மூழ்கியுள்ளனர்।

காகிதப் படகும் இல்லை,

காகித விமானமும் இல்லை।

இன்று ரிமோட் விமானங்கள் உள்ளன।

ஆனால் காகிதத்தை மடித்து

தன் கைகளால்

கனவுகளை பறக்கவிடும் மகிழ்ச்சி

மறைந்து போய்விட்டது।

இன்றைய குழந்தைகளுக்கு

காகித விமானம்

ஒரு கற்பனைக்கதை போலவே தோன்றுகிறது।

प्रश्न: हिंदी और भारतीय भाषाओं का समुचित विकास आज भी हमारी चुनौती है?

उत्तर:हिंदी और भारतीय भाषाओं को विकास करना है तो
सचमुच प्रांतीय और राष्ट्रीय दल चाहते हैं तो
धन लूटनेवाले अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों को खोलने की अनुमति क्यों देते हैं।
पैसों की भ्रष्टाचारी ही स्वार्थ शिक्षितों का षडयंत्र है।
अंग्रेज़ी स्कूल न तो हम कमा नहीं सकते।
हिंदी या तमिल दरिद्रता है, भाषा माधुर्य ही प्रधानता हो तो संस्कृत क्यों मृत भाषा।
अंग्रेज़ी क्यों जनप्रिय भाषा।
धन धन धन
बाद में ही धर्म।
‌धन न तो मंदिर नहीं,
ईश्वर के सिर पर हीरे का मुकुट नहीं।
ऊँचे – ऊँचे गोपुरम नहीं,
धन के सामने धर्म नहीं।
सत्य नहीं, अहिंसा नहीं
शिक्षितों में ईमानदारी नहीं।
न्यायाधीश में न्याय नहीं,
ऐसी हालत में भाषा किस खेत की मूली और
हजारों भाषाओं का लापता होना!
अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल ! और यहां की भाषाओं में जीविकोपार्जन तो भारतीय भाषाओं का अंत ज़रूर!

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