आज शिव रात्रि पर विशेष : शिव कृपा चाहिए तो नपुंसक बन जाइये
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अध्यात्म जगत जिस आशय की बात करता है उसके मुताबिक त्रिनेत्र भगवान शिव की कृपा वही पा सकता है, जो उन्हें पाने के लिए नपुंसक हो जाता है | मतलब नपुंसक हुए बगैर भगवान भोलेनाथ की कृपा प्राप्त नहीं की जा सकती | यहां नपुंसक हो जाने का आशय स्त्री और पुरुष के भाव को खो देना है | एकाकार हो जाना है। ईश्वर और उसका ईशरत्व भी यही है।
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संसार में हमारा जन्म। फिर सबसे पहले माता-पिता और फिर गुरु द्वारा कहने, बोलने, लिखने और पढ़ने आदि के रूप में सांसारिक शब्दों का ज्ञान| और उन्हीं शब्दों में शामिल ईश्वर ,अल्लाह और गॉड, पूजा-पाठ ,प्रार्थना, साधना, उपासना और वंदना जैसे अनगिनत शब्द।
इन्हीं शब्दों से पैदा प्रकृति यानी संसार के सृजक, पालक और विनाशक के पदवी धारक परमेश्वर, ईश्वर ,अल्लाह और गॉड के प्रति आस्था और विश्वास। ईश्वर परमेश्वर और भगवान जैसे शब्द और इन्हीं शब्दों में शामिल ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे अनगिनत नाम। ब्रह्मा मतलब सृजक यानी पैदा करने वाले, विष्णु मतलब पालक यानी पालन करने वाले और महेश मतलब विनाशक संघारक यानी अंत करने वाले|
अगर सरल भाषा में कहा जाए संसार में किसी का भी जन्म ब्रह्मा है और मृत्यु ,महेश यानी भगवान शिव शंकर है | अब रही भगवान विष्णु की बात। तो जिस तरह से संसार में किसी का भी जन्म ब्रह्मा है और मृत्यु महेश । ठीक उसी तरह से किसी के भी जन्म और मृत्यु के बीच का समय जिसे जीवन कहते हैं | वही विष्णु है।
और इसमें भी ब्रह्मा की जरूरत भी केवल एक बार पड़ती है, केवल जन्म में और इसी तरह से महेश की भी केवल एक बार यानी मृत्यु में | लेकिन भगवान विष्णु की जरूरत बार-बार पड़ती है यानी पूरे जीवन भर। जब तक भगवान शिव मृत्यु के रूप में हमें अपनी शरण में नहीं ले लेते ।
मतलब जन्म से लेकर मृत्यु तक | इसमें भी अगर संसार में किसी का सबसे ज्यादा भय होता है तो वह है ,एकमात्र मृत्यु ,जिसे काल भी कहते हैं। भगवान शंकर को इसीलिए महाकाल भी कहा गया है क्योंकि वह काल (मृत्यु ) के स्वामी और नियंत्रक हैं। इसीलिए उनके शिव शंकर भोले समेत 108 नामों में एक नाम मृत्युंजय मतलब मृत्यु पर विजय दिलाने वाला भी है। भगवान महेश के उपासक उन्हें हर तरह से प्रसन्न करने में कसर नहीं रखते| और इसके बदले प्रसन्न हुए भगवान शिव प्राणियों की हर मांग भी पूरी करते हैं | शायद इसीलिए उन्हें औढर दानी भी कहा जाता है। मांगने पर कुछ भी देने से शिव को इनकार नहीं है, क्योंकि संसार में किसी भी वस्तु का प्रयोग जीवित रहने तक ही किया जा सकता है और भगवान शिव हैं कि काल यानी मृत्यु के भी स्वामी हैं। मतलब दुरुपयोग पर कब किससे और किस बहाने से मृत्यु प्रदान करने के रूप में छीन लिया जाना है | यह सब कुछ भी भगवान शिव शंकर भोले की कृपा और मर्जी पर निर्भर करता है l
राक्षसों समेत अपने बड़े बड़े भक्तों को उनकी इच्छा अनुसार वरदान देना और फिर उसके दुरुपयोग पर उन्हें मृत्यु प्रदान कर देने को इसके उदाहरण के रूप में शामिल किया जा सकता है | मतलब भगवान शिव का स्वभाव प्राकृतिक नियमों के अनुरूप उन पर नियंत्रण वाला स्वभाव है।
जहां तक भगवान शिव शंकर की पूजा, आराधना ,वंदना , साधना और प्रार्थना का सवाल है | विश्व के सर्वाधिक आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व वाले भारत में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाई जाने वाली उनकी महाशिवरात्रि उनका सबसे बड़ा महापर्व माना जाता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक शिवरात्रि के दिन ही शिव के अग्नि लिंग से ही सृष्टि का सृजन देवी पार्वती से विवाह के रूप में हुआ था|
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए महाशिवरात्रि पर्व के अलावा संसार में और कुछ है ही नहीं | यही कारण है कि न केवल भारत बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी महाशिवरात्रि पर्व पर
पूर्ण व्रत ,रुद्राभिषेक के साथ भगवान शिव शंकर भोले की पूजा, आराधना, उपासना, वंदना और साधना करना नहीं भूलते लेकिन अध्यात्म जगत जिस आशय की बात करता है उसके मुताबिक त्रिनेत्र भगवान शिव की कृपा वही पा सकता है, जो उन्हें पाने के लिए नपुंसक हो जाता है | मतलब नपुंसक हुए बगैर भगवान भोलेनाथ की कृपा प्राप्त नहीं की जा सकती | यहां नपुंसक हो जाने का आशय स्त्री और पुरुष के भाव को खो देना है | एकाकार हो जाना है। ईश्वर और उसका ईशरत्व भी यही है।
मतलब जब तक स्त्री और पुरुष के रूप में द्वेत यानी स्त्री अलग और पुरुष अलग का भाव है तब तक ईश्वर और ईश्वरत्व नहीं हो सकता, क्योंकि अगर ईश्वर – परमेश्वर को इस संसार के सृजन का कारण मानते हो तो यह ना तो अकेले पुरुष के बस की बात है और ना ही अकेले स्त्री के।
भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप भी इसी आध्यात्मिक सत्य को उद्घाटित करता है |
आध्यात्मिक अवधारणा इस संदर्भ में जिस आशय की बात करता है, उसके मुताबिक
नपुंसक भाव ही संसार के सृजन, संचालन और उसकी पूर्णता का कारण है |
यही नहीं भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप यह भी बताता है कि ईश्वर परमेश्वर ना स्त्री है और ना ही पुरुष , क्योंकि अगर ईश्वर स्त्री है तो फिर पुरुष का सृजन कैसे और अगर पुरुष है तो स्त्री कैसे बनी ? इसका उत्तर यही है कि ईश्वर स्त्री भी और पुरुष भी है | इसीलिए संसार में इन दोनों के सृजन का कारण भी वही है | मतलब संसार में स्त्री है तो पुरुष भी है । ….और अगर ईश्वर अकेले पुरुष ही होता तो फिर स्त्री नहीं होती और अगर ईश्वर स्त्री होता तो फिर पुरुष नहीं होता | सांसारिक दृष्टिकोण से भी इन दोनों यानी स्त्री और पुरुष के एकाकार हो जाने से ही संसार में दोनों ही पैदा होते हैं स्त्री भी और पुरुष भी|
दरअसल इस संसार में पुरुषत्व और स्त्रित्व अनुपात का भी परिणाम है | मतलब जो भी आत्मा संसार में शरीर धारण करती है ,उनमें आनुपातिक अंतर ही स्त्री और पुरुष होने का कारण है |
यह आनुपातिक अंतर 60 – 40 का भी हो सकता है। मतलब अगर कोई स्त्री है तो उसमें 60% स्त्री और 40% पुरुष हो सकता है और अगर पुरुष है तो उसमें 60% पुरुष और 40 प्रतिशत स्त्री हो सकती है। यानी दोनों में ही कुछ न कुछ आनुपातिक अंतर अवश्य ही होता है । और कोई जरूरी नहीं कि यह अंतर केवल 40 और 60 का ही हो। यह 70 – 30 का भी हो सकता है । 80 – 20 का भी हो सकता है। 90 और 10 का भी हो सकता है। 51 और 49 का भी हो सकता है और 50 – 50 का भी हो सकता है | …और जब यह अंतर 50 – 50 का होता है, तभी नपुंसकता पैदा हो जाती है।
और सबसे खास बात यह भी कि हमारे देश में ब्रह्म शब्द को भी नपुंसक लिंग ही माना है। मतलब ब्रह्म ना तो पुरुष है और ना ही स्त्री। लिंग के संदर्भ में वह नपुंसक ही है, क्योंकि यदि हम परमात्मा को स्त्री मानते हैं तो वह एक पक्ष हो जाता है और अगर पुरुष मानते हैं तो वह भी एक पक्ष हो जाता है ,जबकि परमात्मा तो निष्पक्ष है। मतलब 50 – 50 दोनों पूरा है। और जो पूरा है , वही निष्पक्ष भी है | इस हिसाब से भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की कल्पना ब्रह्म की कल्पना है। उसमें भी ना तो पूरा पुरुष है और ना ही पूरी स्त्री। मतलब आधा स्त्री और आधा पुरुष| वह भी दोनों एक साथ |
और दोनों एक साथ इसलिए क्योंकि वह दोनों नहीं है। ना पुरुष और ना ही स्त्री। अगर मान लो परमेश्वर पुरुष है तो फिर यह भी सवाल उठता है कि संसार में स्त्री तत्व कहां से आया और अगर स्त्री है तो पुरुष कैसे पैदा हुआ या फिर होता है ?
इस तरह से तो भगवान शिव का अर्धनारीश्वर
रुप यही बताता है कि परम बह्य परमेश्वर एक साथ दोनों है। स्त्री भी और पुरुष भी। इसीलिए संसार दोनों को ही पैदा कर पाता है, पुरुष को भी और स्त्री को भी।
इसी के साथ हम जब तक स्त्री – पुरुष हैं ,तब तक हम उसके टूटे हुए दो टुकड़े हैं, जिसे परमात्मा कहते हैं | इसीलिए संसार में स्त्री और पुरुष का आपसी आकर्षण एक होने का आकर्षण है | उसके पूरा होने का आकर्षण है। वह आधे – आधे हैं। तभी पूरे भी हैं |
कुल मिलाकर भगवान शिव का अर्धनारीश्वर वाला रुप इसी आध्यात्मिक सत्य को प्रमाणित करता है कि परमेश्वर परमात्मा दोनों ही है। वह भी अधूरा नहीं। एक साथ । वह भी पूरा। इसमें उसका एक पहलू स्त्रैण यानी स्त्री तत्व है और एक पहलू पुरुष। या फिर कहा जा सकता है कि इन दोनों का सम्मिलन ही परमात्मा है। ब्रह्म है। शिव है। इसीलिए जिसे परमात्मा को पाना है ,उसको नपुंसक यानी प्रभु परमेश्वर जैसा ही हो जाना पड़ेगा और केवल शिव जी ही नहीं, भगवान बुद्ध या भगवान कृष्ण भी अपनी पूरी गरिमा में ना तो स्त्री हैं और ना ही पुरुष | अपनी पूरी गरिमा में वह मिश्रित यानी दोनों ही है, स्त्री भी और पुरुष भी।
अब अगर यह सवाल कि थर्ड सेक्स यानी नपुंसक क्यों पैदा होता है, तो सांसारिक हिसाब से यह शारीरिक तल पर स्त्री और पुरुष तत्व के समान अनुपात का परिणाम होता है | और अब तो विज्ञान ने भी ऐसी व्यवस्था कर दी है ,जिससे कोई पुरुष, स्त्री और कोई स्त्री पुरुष बनने में सक्षम हो सकती है l इस तरह स्त्री और पुरुष एक ही तरह के व्यक्ति हैं। स्त्री शब्द और पुरुष शब्द के संदर्भ में उनमें केवल मात्राओं का ही अंतर है।
अगर यहां हम भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की चर्चा करें तो इसका मतलब यही है कि इस सारे संसार का मूल स्रोत ना कोई स्त्री है और ना ही पुरुष | वह दोनों एक साथ हैं | यहां पर ऐसा भी नहीं सोचा जाना चाहिए कि जो नपुंसक है। वह परमात्मा को अवश्य प्राप्त कर लेगा। नहीं ऐसा भी कदापि नहीं है, क्योंकि परमात्मा तो दोनों हैं । वह भी एक साथ और जिसे हम नपुंसक कहें। वह दोनों नहीं है। वह एक ही हैं।
दरअसल नपुंसक हमारा सिर्फ अभाव है,जबकि परमात्मा भाव है और इसी परमात्मा में स्त्री और पुरुष दोनों हैं। भगवान शिव का अर्धनारीश्वर वाला रुप इसी आध्यात्मिक सत्य को प्रमाणित करता है | उनकी इस प्रतिमा में
आधी स्त्री है और आधा पुरुष है। जबकि परमात्मा को नपुंसक जैसा भी बनाया जा सकता था ,जिसमें ना स्त्री होती और ना पुरुष होता और अगर कुछ होता तो केवल ना पुरुष होने का और ना स्त्री होने का अभाव यानी नपुंसक होता ,जबकि परमात्मा स्त्री और पुरुष यानी दोनों का ही भाव है और इसी क्रम में जिसे हम नपुंसक कहते हैं । वह पूर्ण स्त्री का भी अभाव है और पूर्ण पुरुष का भी।
यहां नपुंसक के भाव को संसार के सृजन के संदर्भ में भी समझा जा सकता है l स्त्री और पुरुष के जिस सम्मिलन से उत्सर्जित तत्व ( वीर्य ) किसी आत्मा के संसार में शरीर धारण करने का कारण बनता है । स्त्री और पुरुष का वही तत्व ना तो पुर्लिंग में है और ना ही स्त्रीलिंग में । वह नपुंसक लिंग में ही होता है, क्योंकि स्त्री और पुरुष के सम्मिलन से जो तत्व किसी आत्मा को संसार में शरीर धारण कराता है। वह ना तो केवल पुरुष का होता है और ना ही केवल स्त्री का। वह दोनों का होता है और जब वह एक साथ दोनों का होता है तो वह किसी आत्मा के शरीर धारण करने तक नपुंसक भाव वाला ही होता है । अगर वह स्त्री तत्व ही होता अथवा पुरुष तत्व ही होता तो कोई भी आत्मा संसार में शरीर धारण कर ही नहीं पाती। शायद इसीलिए आत्मा को परमात्मा का अंश कहा जाता है और आत्मा शब्द भी ना स्त्रीलिंग है और ना ही पुर्लिंग वह भी नपुंसक लिंग ही कही जाती है।
इसीलिए अगर हमें परम ब्रह्म परमेश्वर परमात्मा यानि भगवान शिव शंकर भोले को पाना है तो हमें इसके लिए नपुंसक मतलब आत्म भाव में ही खोना पड़ेगा।
मतलब हम ना स्त्री भाव वाले रह जाएं और न पुरुष भाव वाले। इस तरह से जब हममें स्त्री और पुरुष होने का भाव खो जाएगा| तब हमारा वही आत्मभाव शिव ही सत्य है और सत्य ही शिव है के आनंद भाव से भर जायेगा| और शिवोहम वाला यही आनंद शिव कृपा से
मोक्ष भी बन जायेगा।
सुनील बाजपेई
कवि, गीतकार,
लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार
कानपुरI 7985473020


