जब न्यायपालिका ही कटघरे में हो, तो न्याय की उम्मीद किससे?

`रवींद्र सिंह (मंजू सर) मैहर की कलम से`

 

रमेश ठाकुर – पश्चिम चंपारण,बिहार भारत की न्यायपालिका, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्या वह भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंस चुकी है? यह सवाल उठ खड़ा हुआ है जब जस्टिस यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार का मामला उजागर हुआ।

कोलेजियम सिस्टम के चलते एक वकील न्यायाधीश बना और फिर न्याय की कुर्सी पर बैठकर उगाही का ऐसा खेल खेला कि 10-15 करोड़ रुपए घर में रखे मिले। सवाल यह है कि बाकी रकम कहां गई? इस खुलासे के बाद भी न किसी न्यायाधीश ने इस्तीफा दिया, न ही किसी बड़े वकील ने आवाज उठाई।

देश की आम जनता में एक आशा की लहर जरूर दौड़ गई कि अब शायद न्यायपालिका की काली चादर हटेगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। लेकिन, क्या सच में ऐसा होगा? या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह दबा दिया जाएगा?

भारत में पहले भी न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस घटना ने व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जब न्याय देने वाले ही आरोपों के घेरे में होंगे, तो जनता को कैसे न्याय मिलेगा?

रवींद्र सिंह मंजू सर की कलम कहती है कि अब समय आ गया है कि इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया जाए। अगर भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना है तो न्यायपालिका की जवाबदेही तय करनी होगी।

इस पूरे प्रकरण पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। क्या उन्हें इस मामले पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? क्या केवल ट्रांसफर कर देना ही समाधान है? महाभियोग चलाकर दोषी न्यायाधीशों को दंडित क्यों नहीं किया जा सकता?

यह मामला सिर्फ एक भ्रष्ट जज का नहीं, बल्कि पूरी न्याय प्रणाली के लिए एक परीक्षा है। अगर दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में हर फैसला शक के दायरे में होगा।

अब सवाल यह है—क्या भारत की जनता इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएगी? क्या सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे को जीवित रखा जाएगा ताकि इसकी तपिश हर भ्रष्ट व्यक्ति तक पहुंचे? जवाब जनता को ही देना होगा!

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