बंगाल में सिंगूर मुद्दे को जीवंत करने की कोशिश में भाजपा,

18 साल पहले टाटा समूह का नैनो प्रोजेक्ट को सिंगूर से गुजरात शिफ्ट

 

18 जनवरी को पीएम मोदी करेंगे वहां के लोगों को संबोधित,

अजित प्रसाद/सिंगूर (पश्चिम बंगाल): आज 18 साल बाद भी सिंगूर की वह जमीन ज्यादातर बंजर पड़ी है। खेती वापस शुरू नहीं हुई है और सिंगूर एक प्रतीक बना हुआ है। खोए हुए मौके, राजनीतिक टकराव और अधूरे वादों का। दरअसल, सिंगूर विवाद के दौरान रतन टाटा ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण पश्चिम बंगाल से टाटा मोटर्स का नैनो प्लांट हटाने का फैसला किया था। यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण और ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए किसान आंदोलन से जुड़ा था। इसी के बाद टाटा समूह को प्लांट गुजरात ले जाना पड़ा।सिंगूर को अब मोदी से उम्मीद: खैर, नैनो प्रोजेक्ट के सिंगूर से गुजरात शिफ्ट होने के अठारह साल बाद भी जमीन शांत है, लेकिन उम्मीदें एक बार फिर बढ़ रही हैं. क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी दौरा करने वाले हैं, ऐसे में मुख्य सवाल बना हुआ है। क्या सिंगूर को आखिरकार एक नई पहचान मिलेगी, या यह खोए हुए अवसर का प्रतीक बना रहेगा? अब सबकी नजरें सिंगूर और पीएम मोदी के दौरे पर हैं।
क्या है सिंगूर विवाद? कोलकाता से करीब 40 किलोमीटर दूर सिंगूर में नैनो परियोजना के लिए सरकार ने कुल 997.11 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था. मगर तृणमूल कांग्रेस और किसानों के संगठन कृषि जमीं जिविका रक्षा कमेटी (केजेजेआरसी) का कहना था कि इसमें से 400 एकड़ जमीन किसानों से उनकी मर्जी के खिलाफ ली गई है, लिहाजा यह जमीन उन्हें लौटा दी जानी चाहिए। तब तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी इस मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गई थीं। इस दौरान हिंसा भी हुई थी। प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित रूप से संयंत्र के कर्मचारियों को डराए-धमकाए जाने की वजह से टाटा मोटर्स ने संयंत्र में कामकाज बंद कर दिया। बाद में टाटा ने नैनो प्रोजेक्ट को गुजरात शिफ्ट कर दिया। तब ममता बनर्जी विपक्ष में थीं।बात अक्टूबर 2008 की है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर में करीब 1000 एकड़ उपजाऊ जमीन पर एक अजीब सी खामोशी छा गई। यह खामोशी टाटा ग्रुप के तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा की एक नाटकीय घोषणा के बाद आई थी। वह घोषणा थी टाटा के नैनो कार प्रोजेक्ट से जुड़ी। जी हां, खराब कारोबारी माहौल का हवाला देते हुए टाटा ने नैनो कार प्रोजेक्ट को सिंगूर से गुजरात के सानंद में शिफ्ट करने की घोषणा की. तब टाटा ने एक अच्छा एम (गुड एम) और एक बुरा एम (बैड एम) का जिक्र किया था। टाटा की नजर में शायद इसका अर्थ था बुरा एम मतलब ममता बनर्जी और अच्छा एम मतलब गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी. उन्होंने कहा था कि उनके सिर पर बंदूक तान दी गई थी और ट्रिगर दबा दिया गया था।
सिंगूर के किसानों का दुख: आज इस जमीन के ज़्यादातर हिस्से पर खेती के कोई निशान नहीं दिखते। मैने उन किसानों से बात की, जिन्होंने अपनी मर्जी से और बिना मर्ज़ी के ज़मीन दी थी, जिनकी जिंदगी सिंगूर आंदोलन से बदल गई थी। सिंगूर के रहने वाले कौशिक बाग अब 60 के दशक में हैं। उन्होंने बताया कि वह अपनी मर्ज़ी से जमीन देने वाले किसान थे। उन्होंने टाटा फैक्ट्री के लिए सरकार को छह बीघा जमीन दी थी। उन्होंने उस समय तीन महीने की ट्रेनिंग भी ली थी, इस उम्मीद में कि उन्हें रोजगार मिलेगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ।आज इस जमीन के ज़्यादातर हिस्से पर खेती के कोई निशान नहीं दिखते।
जमीन मिली मगर अब खेती लायक नहीं: हालांकि जमीन आखिरकार वापस मिल गई। कौशिक कहते हैं कि अब वह खेती के लायक नहीं रही। 18 साल की रुकावट के बाद अब उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा से बदलाव आ सकता है।

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