कांग्रेस में घर वापसी करेंगे शरद पवार !

-आखिरकार निर्णय की धुरी एक ही परिवार के इर्दगिर्द

भारत पोस्ट संवाददाता
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पुराने रिश्तों, टूटी महत्वाकांक्षाओं और सत्ता की नई हकीकतों ने विपक्ष की राजनीति को गहरे सवालों के सामने ला खड़ा किया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की करारी हार, महाराष्ट्र में शरद पवार की कमजोर होती पकड़ और उद्धव ठाकरे के सामने खड़ा राजनीतिक संकट अब केवल क्षेत्रीय दलों की परेशानी नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे विपक्ष की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस में ष्घर वापसी की बहस ने अचानक जोर पकड़ लिया है।
तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के विलय की अटकलों ने तब तेजी पकड़ी जब ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मुलाकात की और उसके बाद अभिषेक बनर्जी की राहुल गांधी के साथ लंबी बैठक हुई। हालांकि दोनों दलों ने इन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन इस बहस ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भाजपा के खिलाफ मजबूत मोर्चा बनाने के लिए कांग्रेस से अलग हुए नेताओं को अब फिर उसी छतरी के नीचे लौट आना चाहिए।
दरअसल ममता बनर्जी की स्थिति पहली बार इतनी कमजोर नजर आ रही है। पंद्रह साल तक बंगाल की राजनीति पर एकछत्र राज करने वाली ममता की पार्टी विधानसभा चुनाव में महज अस्सी सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने राज्य में पहली बार सरकार बना ली। चुनावी हार के बाद संकट और गहरा गया। कई विधायक और करीबी सहयोगी भाजपा के संपर्क में चले गए। पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया। पुराने नेताओं ने आरोप लगाया कि जिन्होंने वर्षों तक पार्टी को खड़ा किया, उन्हें किनारे कर दिया गया। कभी कांग्रेस को तुच्छ समझने वाली ममता बनर्जी को आखिरकार उसी कांग्रेस के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी।
कुछ ऐसी ही कहानी शरद पवार की भी है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाकर कांग्रेस से अलग रास्ता चुनने वाले पवार आज अपनी ही पार्टी और चुनाव चिन्ह पर नियंत्रण खो चुके हैं। अजित पवार के विद्रोह ने उनकी राजनीतिक ताकत को बुरी तरह झटका दिया था। उद्धव ठाकरे की हालत भी अलग नहीं है। शिवसेना पर नियंत्रण गंवाने के बाद अब उनके सांसदों में भी टूट हो गयी है। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि जिन क्षेत्रीय दलों को कभी अपने राज्यों में अजेय माना जाता था, वह अब भाजपा के आक्रामक विस्तार और अंदरूनी बिखराव के सामने कमजोर पड़ रहे हैं।
इसी माहौल में शिवसेना नेता संजय राउत ने यह विचार उछाला कि कांग्रेस से निकले दलों को फिर से मूल पार्टी में लौट आना चाहिए। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता नाना पटोले ने भी इस सोच का समर्थन किया। पहली नजर में यह तर्क मजबूत लगता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा आज देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बन चुकी है। कभी केवल सात राज्यों तक सीमित रहने वाली पार्टी अब 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता का हिस्सा है। विपक्ष बिखरा हुआ है और कई क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ चुके हैं।
बहरहाल, फिलहाल इतना तय नजर आता है कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में विपक्षी दलों को साथ चलना ही होगा, लेकिन अपनी अलग पहचान खत्म कर कांग्रेस में समा जाना कई क्षेत्रीय नेताओं के लिए राजनीतिक आत्मघाती साबित हो सकता है। वजह साफ है, कांग्रेस में आखिरकार निर्णय की धुरी एक ही परिवार के इर्दगिर्द घूमती दिखाई देती है। ऐसे में वर्षों की मेहनत से अपनी जमीन तैयार करने वाले क्षेत्रीय क्षत्रप बाद में खुद को हाशिये पर पाकर पछता सकते हैं। जिस पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तक को हर बड़े फैसले पर ष्हाईकमान से पूछना पड़ेगा? कहना पड़ता हो, वहां आंतरिक लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button