दानापुर रेल मंडल: सोचकर बताइए कि अब देश कहां जाने में जुटा है?
दानापुर, रेलवे स्टेशन पर साधारण यात्रियों के लिए बनाए जाने वाले शौचालय इस्तेमाल के लायक नहीं रहते हैं। सालों भर इनमें सूखा गंदा मल स्वच्छता अभियान की गाथा बयान करता है। साधारण स्टेशन पर इन शौचालयों की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। यहां प्लेटफार्म पर झाड़ू लगाने वाले तो दिखाई देते हैं लेकिन शौचालय कर्मी नादारद रहते हैं। केन्द्र सरकार देश की सारी रेल व्यवस्था को बदलने में जुटी है लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि रेल व्यवस्था को हवाई यातायात की तरह से अमीरों के शानो-शौकत की जरूरत और उनकी तथाकथित गरिमा में इसे तब्दील कर दिया जाए। रेल देश के आम लोगों की जरूरत है और आज स्थिति यह है कि हाई स्पीड ट्रेनों के आगमन से साधारण एक्सप्रेस गाड़ियों की इज्जत प्रतिष्ठा भी धूल में मिल गयी है। इन ट्रेनों को जहां तहां रोककर अमृत भारत, राजरानी, तिनसुकिया और वंदे भारत को पहले पार कराया जाता है। भागलपुर दानापुर एक्सप्रेस जैसी पुरानी एक्सप्रेस गाड़ियों को रोककर इन गाड़ियों को पहले निकालने की घटनाएं दानापुर रेल मंडल के रोज के कारनामों में शामिल हैं। साधारण एक्सप्रेस गाड़ियों में सुबह के समय विद्यार्थी छात्र शिक्षा के अलावा नौकरी साक्षात्कार के लिए भी सफर करते हैं। आज महंगी रेलगाड़ियों में सफर करने वाले बेईमान बनिये बदमाश अफसर नेता और प्राइवेट नौकरी करने वाले एक्जीक्यूटिव क्लास के लोग महंगी ट्रेनों में बैठे समाज के सबसे बड़े लोगों में शुमार हो रहे
हैं। सचमुच इससे अच्छा बैलगाड़ी युग था। लेकिन जर्सी गायों से पैदा होने वाले सांड भी लकड़ी की भारी भरकम गाड़ियों को खींचने लायक नहीं रहे हैं। मशीनी सभ्यता के युग में रेल आम जनता से निरंतर दूर मंहगी
होती जा रही है।



