बिहार विधानसभा चुनाव 2025
चुनाव टिकट के बंटवारे में दूरदराज के साधारण नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी सारे राजनीतिक दलों के द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए।
राजीव कुमार झा
राजीव गांधी सरकार के पतन के बाद भारत लंबे अर्से तक राजनीतिक अस्थिरता का देश बना रहा। अपराधियों और बदमाशों ने भी इस दौर में देश की राजनीति को अपनी गिरफ्त में लेने की कोशिश की लेकिन अपने चुनाव सुधार के कार्यक्रमों को लागू करके हम राजनीति से ऐसे तत्वों को दूर रखने में संलग्न हैं। इसी प्रकार अवसरवादी और स्वार्थी नेताओं का तबका भी देश की राजनीति में संकीर्ण सोच की प्रवृत्ति को क़ायम कर रहा है । आज परिवारवाद की प्रवृत्ति से देश के तमाम राजनीतिक दल जुड़े हैं। रामविलास पासवान की पार्टी हो या लालू प्रसाद की पार्टी या उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हो परिवारवाद ने यहां लोकतंत्र की सारी मर्यादा को खत्म कर दिया। कांग्रेस में शुरू से ही इसका प्रचलन रहा है। अपने दल के प्रति निष्ठा का भाव सारे छोटे – बड़े नेताओं में होना चाहिए। सारी दुनिया इस बात को जानती है कि व्यक्तिगत फायदे के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस को छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया । राजनीति में कोई आदमी अगर मुख्यमंत्री बनने के लिए शामिल होता है तो यह उसके स्वार्थ का परिचायक है। सामान्य व्यक्ति के लिए चुनावी राजनीति के घमासान में कूदना आसान नहीं है।
राजनीतिक दलों में दूरदराज के नेताओं की कोई इज्जत प्रतिष्ठा नहीं रही और चुनाव में उनको टिकट देना बेकार की बात मानी जाती है। आज देश के तमाम राजनीतिक दलों में उनके आका अपनी जान पहचान और रिश्ते नातों में आने वाले लोगों को टिकट देते हैं। कुछ दलों में टिकट के लिए रुपए पैसे का कारोबार भी चल रहा है। ऐसे में विधानसभा अथवा लोकसभा में अनुचित लोगों का जमावड़ा होता दिखाई दे रहा है।
राजनीति में तात्कालिक फायदे के लिए दल बदल की प्रवृत्ति को उचित नहीं कहा जा सकता है लेकिन काफी नेता विधायक बनने या अन्य प्रकार के पदों पर काबिज होने की लालसा में विभिन्न दलों के भीतर आते जाते दिखाई देते हैं लेकिन इससे उनका क्या फायदा होता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया लेकिन राजनीति में कांग्रेस से ही उनको पहचान और पद प्रतिष्ठा हासिल हुई थी। बिहार में दल बदल की घटनाओं में जगन्नाथ मिश्र के द्वारा लोक जनशक्ति पार्टी की सदस्यता को स्वीकार करना अभूतपूर्व घटना थी और कांग्रेस ने जगन्नाथ मिश्र को कभी नजर अंदाज नहीं किया था। इस पार्टी की राजनीति में वह सदैव पद प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त व्यक्ति रहे थे और लोक जनशक्ति पार्टी में शामिल होने से उनकी जीवनभर की सार्वजनिक छवि धूमिल हो गई थी। कांग्रेस पार्टी ने अपमान का अनुभव किया था। ऐसा ही ज्योतिरादित्य सिंधिया के बारे कहा जा सकता है और आज भी कांग्रेस के दरवाजे उनके लिए खुले प्रतीत होते हैं। आरसीपी सिंह भी दल बदल की राजनीति में भटकते चले गये और अब उनके साथ कोई नहीं है। भाजपा में शामिल होना उनके लिए अत्यंत विषम प्रसंग साबित हुआ और अब जनसुराज में शामिल होकर वह अपने जीवन की नयी राजनीतिक दिशा को पाने में संलग्न दिखाई दे रहे हैं।



