आखिर क्यों खाई जाती है- विजयादशमी पर जलेबी

 

बलवान सिंह ब्यूरो चीफ बाराबंकी* बाराबंकी दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं है, यह भारत की उस सांस्कृतिक धारा का प्रतीक है जहाँ विजय और उल्लास साथ-साथ चलते हैं। हर साल जब विजयादशमी का दिन आता है, तो घर-घर और बाज़ारों में एक और परंपरा जीवंत हो उठती है—जलेबी खाने की। सुनने में साधारण लगने वाली यह मिठाई वास्तव में एक गहरी धार्मिक आस्था और सामाजिक विश्वास से जुड़ी हुई है।

लोकमान्यता है कि भगवान श्रीराम को शशकुली नामक मिठाई बेहद प्रिय थी, जिसे आज की भाषा में जलेबी कहा जाता है। कहा जाता है कि रावण पर विजय पाने के बाद श्रीराम ने इसी मिठाई को खाकर अपनी जीत का जश्न मनाया था। तभी से यह परंपरा बन गई कि दशहरे पर जलेबी खाई जाए, ताकि विजय की मिठास हर जीवन में बनी रहे। यह कथा केवल स्वाद की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर की है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।

दूसरी ओर, नवरात्रि के नौ दिनों के उपवास और साधना के बाद विजयादशमी का दिन आनंद और उत्सव का दिन माना गया। व्रत-उपवास के समापन पर मिठाई का सेवन शुभ समझा गया और जलेबी की सरलता व लोकप्रियता ने इसे हर वर्ग के बीच स्वीकार्य बना दिया। उसकी गोलाई जीवन की पूर्णता और अनंतता का प्रतीक मानी गई। यही कारण है कि दशहरे पर जलेबी खाना केवल मिठास का स्वाद लेना नहीं है, बल्कि विजय, विश्वास और परंपरा को आत्मसात करना है।

आज जब रावण दहन के मैदान में भीड़ उमड़ती है, तो उसी के समानांतर मिठाई की दुकानों पर जलेबी की खुशबू और चाशनी की मिठास लोगों को अपनी ओर खींचती है। यह दृश्य हमें यह एहसास कराता है कि हमारी परंपराएँ केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के आनंद और सामूहिक उत्सव से भी जुड़ी हुई हैं।

जलेबी दशहरे की मिठास मात्र नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यह हमें याद दिलाती है कि जीत केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि जीवन की हर चुनौती में मिलती है। और उस विजय को मीठा बनाने के लिए परंपरा हमें जलेबी खाने का सरल, सहज और आनंदमय तरीका देती है।

विजयादशमी का संदेश साफ़ है—सत्य की जीत में मिठास घुली रहे और संस्कृति का स्वाद कभी फीका न पड़े।

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