स्वराज्य की घोषणा: छत्रपति शिवाजी महाराज*
बलवान सिंह ब्यूरो चीफ बाराबंकी* बाराबंकी ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी (सन् 1674), छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की स्थापना कर इतिहास के पन्नों पर एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ा। यह केवल एक राज्याभिषेक नहीं था, बल्कि हिन्दू स्वाभिमान, संस्कृति और आत्मनिर्भर शासन की पुनर्स्थापना का उद्घोष था।
उस कालखंड में, जब समूचे भारत पर मुगलिया सत्ता का आतंक था—मंदिरों का विध्वंस, धर्मांतरण, ज्ञान केंद्रों की समाप्ति और जजिया कर जैसे अत्याचारों से हिन्दू समाज कराह रहा था—ऐसे समय में शिवाजी महाराज ने धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा हेतु एक सशक्त स्वरूप प्रस्तुत किया।
राष्ट्रमाता की शिक्षा, राष्ट्रनायक का निर्माण
शिवाजी की माता जीजाबाई ने रामायण, महाभारत और सनातन इतिहास की गाथाएं सुना कर अपने पुत्र को धर्मरक्षक योद्धा के रूप में गढ़ा। बाल्यावस्था में ही शिवाजी ने वीरता का परिचय देते हुए तोरण किले पर विजय प्राप्त की।
अदम्य साहस और सैन्य कौशल
शिवाजी महाराज ने अपने जीवनकाल में एक भी युद्ध नहीं हारा। अफजल खान जैसे दुर्दांत सेनापति को परास्त कर उसकी गिनती समाप्त कर दी। औरंगज़ेब की कैद से उनका साहसिक और चतुराईपूर्ण पलायन आज भी प्रेरणा देता है।
मर्यादा और नीति के प्रतीक
युद्धों के दौरान भी शिवाजी ने मानवीय मर्यादाओं का पालन किया। धर्म का पुनर्जागरण
शिवाजी ने तलवार के बल पर धर्मांतरित हिन्दुओं को वापस सनातन धर्म में लाने का साहसिक कार्य शुरू किया। कुली खान जैसे सैनिक को पुनः हिन्दू धर्म में स्थान देकर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया—यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, एक सामाजिक उद्घोष था।संस्कृति और शासन का उत्थान
उन्होंने फारसी को हटाकर मराठी को राजभाषा बनाया, संस्कृत के विद्वानों को संरक्षण दिया, मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया और एक संगठित नौसेना की स्थापना कर समुद्री सीमाओं को भी सशक्त किया।
एक राष्ट्र, एक संकल्प
‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’—शेर स्वयं ही अपना राज्य स्थापित करता है। गुरुओं, माता और प्रजा के सहयोग से शिवाजी ने एक ऐसे हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की जो केवल युद्ध जीतने की नहीं, बल्कि चरित्र, नीति, धर्म और संस्कृति के संरक्षण की आधारशिला बना।
आज जब राष्ट्र की आत्मा पर बाहरी विचारधाराएं प्रहार कर रही हैं, तब छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र तभी सुरक्षित रह सकता है, जब समाज संगठित, सशक्त और सांस्कृतिक रूप से सजग रहेगा




