अपराध और समाज:बड़हिया बाजार में व्यापारी व्यवसायी रंगदारों से सांठगांठ करके अपना कारोबार करते हैं और प्रशासन को बेवकूफ बनाते हैं!

सामयिकी

 

राजीव कुमार झा

बड़हिया में लोहार भी काफी हैं और मुसलमान सब भी यहां कपड़ा सिलाई अंडा मांस के कारोबार में संलग्न हैं। लखीसराय का पूरा बड़हिया बाजार अतिक्रमण की चपेट में है और यह स्टेशन से लेकर थाना तक फैले बाजार में साफ़ – साफ़ देखा जा सकता है। यहां सड़क के किनारे व्यापारी अपनी दुकान सड़क से बिल्कुल सटाकर बनाते हैं और इनसे सड़क को मुक्त करवाना प्रशासन के बूते की बात नहीं है। नगरपरिषद यहां सीमेंट के डेकोरेटेड ब्रीक बाजार के फुटपाथों पर लगवाना चाहती है लेकिन हलवाइयों और और अन्य व्यापारियों से निबटना उसके लिए आसान नहीं है। सड़क सुरक्षा और सौंदर्यीकरण की योजनाएं यहां धरी की धरी रह जाती हैं। बड़हिया में भूमिहार जाति के दुकानदारों को रंगदारों और बदमाशों से कोई परेशानी नहीं है और बनियों के अलावा मारवाड़ी दुकानदार यहां अपराध से मुख्य रूप से प्रभावित हैं। यह यहां का पुराना व्यवसायी वर्ग है। बड़हिया से पहले काफी संख्या में फेरीवाले भी साइकिलों पर कपड़े का गट्ठर लेकर आसपास के गांवों में निकलते थे लेकिन अब उनको उधार कपड़ा देने वाले बड़े वस्त्र व्यापारी मौजूद नहीं हैं उनमें ज्यादातर रंगदारों के हाथों मार डाले गये । बड़हिया बाजार में व्यवसायियों ने रंगदारों को बराबर रुपया पैसा देकर अपना उल्लू सीधा किया और उधार कारोबार के लेन देन में बराबर रंगदारों के संरक्षण में ग्राहकों से उट-पटांग वार्तालाप वे करते रहे। इन लोगों के गंदे आक्षेप और हंसी मजाक के बारे में पुलिस को बाजार जाकर पता लगाना चाहिए। बड़हिया में वस्त्र और कपड़ा कारोबारियों के अलावा दवा और सोने चांदी के फुटकर व्यापार में शामिल लोगों का नाम ऐसी हरकतों में विशेष रूप से शामिल है लेकिन रंगदारी के लेन देन में बदमाशों से जब खुद इनका विवाद होता है तो फिर यह बाजार में काफी बड़ा मुद्दा बन जाता है और यहां बाजार बंद हो जाता है और व्यवसायी अपराध के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाते हैं। बड़हिया बाजार में व्यवसायी न तो कोई जी एस टी नंबर निर्गत करवाते हैं और न वे ग्राहकों को क्रय विक्रय की कोई रसीद देते हैं । अगर कोई ग्राहक उनसे ऐसी बातचीत करता है तो वह इसके बारे में सीधे सादे ग्राहक को अपराधी बताकर थाना पुलिस को भी खबर करते हैं। बड़हिया में सीएससी बैंकिंग के काम का लाइसेंस जिन लोगों को मिला है वह बाहर दूसरे शहरों में के खातों में रुपए भेजने का अपना अलग शुल्क लेते हैं और पोस्ट आफिस के रेट पर मनी सेंडिंग चार्ज की मांग करते हैं। यहां लोगों का सारा कारोबार गड़बड़ है और यहां व्यापारियों ने अपनी इज्जत प्रतिष्ठा का ख्याल तो नहीं ही रखा उन्होंने ग्राहकों का भी जीना हराम कर दिया। बड़हिया में ब्लाक और अन्य कार्यालयों में काम करने वाले ज्यादातर लोग अपने परिवार के लोगों को यहां लाना पसंद नहीं करते हैं और डाक्टर सब भी बाहर से ही आकर काम करते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के परिवार जनों की पहचान करके बाजार में लोग उनसे अपमानजनक वार्तालाप आक्षेप करते हैं। बड़हिया बाजार के लोग बेहद गंदी गाली गलौज की भाषा में बातचीत करते हैं और बरगाही बुटनाही पदनीभाय गंडमस्ता छिनरोभाय इन सब शब्दों के प्रयोग से बाजार के लोगों की भाषा सबको अत्यंत घृणित प्रतीत होती है।
व्यापारीगण यह उधार का कारोबार मुख्यतः साधारण और अभावग्रस्त स्थानीय लोगों के साथ करते हैं। यहां ज्यादातर व्यापारी मूर्ख चपाट हैं और इक्के दुक्के आदमी आपको बीए पास मिलेंगे। इनकी मूर्खतापूर्ण हरकतों का कोई जवाब नहीं है। अब अपना पूजा पाठ भी ये लोग खुद करते हैं और ब्राह्मणों से इनका कोई मतलब नहीं है। सबसे बड़ी त्रासदी तो यह है कि रात में खासकर सुबह तीन बजे के बाद नौकरी काम-धाम के सिलसिले में बाजार पारकर पैदल रेलवे स्टेशन जाने वाले लोगों पर यहां के व्यवसायी कड़ी नजर रखते हैं और बाजार में उनको देखकर उन्हें वे चोरी डकैती करने वाला आदमी बताते हैं। अक्सर ये लोग अपने बाजार की सुरक्षा के लिए अपने गार्ड को नियुक्त करते हैं और रात में बाजार और स्टेशन आने वाले जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। बड़हिया में रंगदारों और बाजार के बनिए व्यापारियों की इज्जत प्रतिष्ठा के सामने तमाम शिक्षित पढ़े – लिखे लोगों का आदर सम्मान निरर्थक है। रसगुल्ला के कारोबार में शामिल लोग भी किसी को कुछ नहीं समझते हैं और उनको ऐसा लगता है कि हर आदमी उनकी दुकान पर मुफ्त में रसगुल्ला खाने आता है और वे दूध की जगह मिल्क पाउडर से ज्यादा तर रसगुल्ला बनाते हैं। बड़हिया बाजार में व्यवसायी ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के प्रति भी अवज्ञा और अपमान का भाव रखते हैं। यहां स्थानीय लोगों की आपसी बातचीत में डक्टरवा इंस्पेकटरवा कलक्टरवा दरोगवा और एसपीआ डीएसपीआ पुलिसवा इन सब शब्दों का प्रयोग सहजता से सुना जा सकता है। रंगदारों और बदमाशों को यहां लोग नाम के बाद दा शब्द से आत्मीयता का भाव प्रकट करके संबोधित करते हैं। उनसे कोई आदमी अगर थोड़ी सी राशि का भी उधार सामान अगर खरीद ले तो अगले दिन से उसका रास्ता चलना ये लोग मुश्किल कर देते हैं।

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