भारत:राजनीतिक चिंतन राजनीतिक दलों में वंशवाद की निरंतर व्याप्त होती प्रवृत्ति और देश‌ में लोकतंत्र का पतन की ओर अग्रसर होना!

 

राजीव कुमार झा
एम.ए.जनसंचार

देश की राजनीति में वंशवाद की बेल अब सर्वत्र फैलती दिखाई दे रही है। खबर है कि जदयू नेता नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार अब भाजपानीत बिहार के आगामी उपमुख्यमंत्री होंगे। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश कुमार के राज्य सभा चुनाव में जाने के बाद भाजपा बिहार में सरकार संचालन का दायित्व संभालेगी। इसका आशय स्पष्ट है कि भाजपा नेता बिहार में मुख्यमंत्री बनेंगे।
देश की राजनीति में वंशवाद की भावना से यहां लोग अपरिचित नहीं हैं। इसका समावेश आजादी के आंदोलन के दौरान ही तब हुआ था जब लाहौर में कांग्रेस के अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू के बाद जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था और फिर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जवाहर लाल नेहरू की पुत्री के तौर पर इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं। तत्पश्चात धीरे – धीरे देश में सभी पार्टियों के नेताओं अपने बेटे बेटियों को अपने प्रभाव वाली राजनीतिक पार्टियों में अपनी जगह पर प्रतिष्ठित करना शुरू किया। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने से यह संकीर्ण भावना और भी व्यापक हो गई। बिहार में ललित नारायण मिश्र के भाई जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए। यहां आगे लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को सरकार बनाने में समर्थन देने के एवज में अपने दोनों बेटों को मंत्री उपमुख्यमंत्री पर पर आसीन कराया। अब खबर है कि नीतीश कुमार भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा को अपने बेटे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के बदले समर्थन देने जा रहे हैं।
वंशवाद की सोच संकीर्ण मानसिकता की परिचायक है औरकी ऐसे नेता तानाशाह माने जा सकते हैं। आगे चलकर वंशवाद का खेल देश की राजनीति के तमाम दिग्गजों के कारनामों में शामिल हो गया। पूर्वोत्तर के नेता पीए संगमा और कश्मीर के नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भी अपने बेटे बेटियों को राजनीति में उतारा और इसके पहले शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला इन लोगों को अपने वारिसों को राजनीति में अपने उत्तराधिकारियों को लाने की कवायद से हम सभी वाकिफ हैं। राजनीति में आखिर इस तरह की प्रवृत्ति के समावेश के क्या नुकसान और फायदे हैं, इस पर विचार विमर्श जरूरी है। प्रायः वंशवाद को लोकतंत्र के अनुकूल नहीं माना जाता है। ऐसे नेता वस्तुत: राजनीतिक पार्टियों पर कब्जा कर लेते हैं और अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की जगह अपने बेटे – बेटियों को उच्च पदों पर पहले आसीन करते हैं और फिर सरकार गठन की स्थिति में उसे मंत्रिमंडल में स्थान देते हैं। आजकल तमाम पार्टियों में ऐसा होता दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी ने कुछ साल पहले प्रियंका गांधी को कांग्रेस के महासचिव का पद प्रदान किया और फिर वायनाड से उनकी जगह पर वह सांसद चुनी गई। रामविलास पासवान ने अपने जीवन काल में अपने भाईयों के अलावा अपने बेटे चिराग पासवान को जमुई से चुनाव लड़वाया और जितवाया। हाल में उपेन्द्र कुशवाहा ने अपने बेटे को अपनी पार्टी के कोटे से नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में शामिल कराया। वंशवाद का सबसे बड़ा हास्यास्पद खेल बिहार में लालू प्रसाद ने खेला था जब उन्होंने अपने दोनों सालों को सांसद और भ्रष्टाचार के केस में गिरफ्तारी के बाद पत्नी राबड़ी देवी को यहां मुख्यमंत्री बनवाया। बिहार में अशोक चौधरी जैसे तथाकथित आदर्शवादी नेताओं ने भी वंशवाद की फलती फूलती बेल पर अपनी राजनीति की शतरंज खेली और अपनी बेटी को समस्तीपुर से दूसरी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी से सांसद बनवाया। सूत्रों के अनुसार हाल में अपने दामाद सायण कुणाल को भी वह बरबीघा सीट से जदयू उम्मीदवार बनवाने में संलग्न थे। वंशवाद से देश‌ तेजी से पतन की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। यहां देश की राजनीति कुछ मुट्ठी भर नेताओं के परिवार और उनके परिजनों के जीवन के आसपास सिमटती जा रही है। देश में आम जनता के बीच से नेताओं का उभरना सिमटता जा रहा है और इससे एक खास प्रकार के कुलीन तंत्र को यहां बढ़ावा मिल रहा है। इस बारे में राजनीतिक दलों में राजनीतिक सुधार के कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए और इसमें किसी एक व्यक्ति विशेष के आसपास किसी राजनीतिक दल में कंपनीवाद की प्रभावी होती मनोवृत्ति को हतोत्साहित करना सबसे पहली कार्रवाई में शामिल किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग को इस बारे में राजनीतिक दलों के साथ बैठक के अलावा आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करना चाहिएराजनीक

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