सिंदूर खेला के साथ मां दुर्गा की नम बिदाई, भक्तों में उत्साह के साथ दिखने लगा है मायूसी

परम्पराओं के साथ 10 दिनों से मां दुर्गा की हो रही है पूजा

 

अजित प्रसाद/ सिलीगुड़ी: दुर्गा पूजा के आखिरी दिन माता दुर्गा के मुर्ति विर्सजन से पहले सिंदर खेला की रस्‍म निभाई जाती है। वैसे तो यह रस्‍म बंगालियों में काफी प्रचलित है, मगर अब इसे हर उम्र और वर्ग की महिलाओं के मध्‍य लोकप्रिय होते देखा जा रहा है। ऐसी मान्‍यता है कि सिंदूर खेला के दौरान विवाहित महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर का टीका लगाती हैं और उससे होली खेलती हैं। कहा जाता है ऐसा करने से अखंड सौभाग्‍य की प्राप्‍त‍ि होती हैं। ” शारदिय नवरात्रि में मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और विजयदश्‍मी के दिन वे अपने ससुराल वापिस जाती हैं। ऐसे में उनकी विदाई के वक्‍त सभी औरतें उन्‍हें सिंदूर चढ़ाती हैं और फिर एक दूसरे को भी लगाती हैं। यह परंपरा वर्षों से निभाई जा रही हैं। ” कहते है कि इस तरह ब्रह्‌वृचोपनिषद हमारा परिचय नवरात्रि में देवी की महत्वपूर्ण छवि से कराने के साथ-साथ उनके सही स्वरूप को हमारे मन में प्रतिष्ठित करता है. हम ब्रह्म रूप देवी से परिचित होते हैं, ‘प्रज्ञान ब्रह्मं’ ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की गूंज को अपने अंदर महसूस करते हैं और सही ढंग से की जानेवाली देवी की आराधना को हमारा मन एक तरह से जान लेता है। सिंदूर खेला 2025 कब है? सिंदूर खेला की रस्म दशहरा के दिन निभाई जाती है. वैदिक पंचांग के अनुसार इस साल दशहरा 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस तरह सिंदूर खेला का पर्व भी 2 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा।यहां धुनुची डांस और सिंदूर खेला काफी लोकप्रिय है। सिंदूर खेला की परंपरा दशकों से बंगाल की संस्कृति का अहम हिस्सा रही है। विजयादशमी के दिन शादीशुदा महिलाएं मां दुर्गा की प्रतिमा के पास जाकर सबसे पहले उनकी मांग में सिंदूर भरती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इस दौरान महिलाएं लाल और सफेद रंग की पारंपरिक साड़ी पहनती हैं। सिंदूर खेला का ये दृश्य हर साल लोगों का मन मोह लेता है और सोशल मीडिया से लेकर अखबारों तक इसकी झलकियां खूब वायरल होती हैं।
क्या है मान्यता: सिंदूर को सुहाग और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. मां दुर्गा को भी सुहागिन का रूप मानकर उनकी विदाई के समय महिलाओं द्वारा उन्हें सिंदूर लगाया जाता है.इस रस्म को निभाने के दौरान ऐसा विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने से उनके सुहाग की उम्र लंबी होती है और उनके परिवार में सुख और समृद्धि बनी रहती है. यही कारण है कि शादीशुदा महिलाएं इस मौके पर पूरे मन से सिंदूर खेला की परंपरा निभाती हैं।
मान्यता: कई जगहों पर ऐसी मान्यता है कि जब मां दुर्गा अपने मायके यानी धरती पर आती हैं, तो नौ दिनों तक उनके आगमन का उत्सव मनाया जाता है. दशमी के दिन वो अपने ससुराल यानी कैलाश पर्वत लौट जाती हैं। विदाई के समय महिलाएं उन्हें सिंदूर चढ़ाकर सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद लेती हैं और फिर आपस में भी सिंदूर लगाकर एक-दूसरे के वैवाहिक जीवन की लंबी उम्र की कामना करती हैं. बंगाल में इस रस्म को केवल धार्मिक मान्यता बल्कि महिलाओं के बीच आपसी प्रेम और एकजुटता का प्रतीक भी माना जाता है।एकजुटता का संदेश: अब बंगाल के अलावा देश के कई हिस्सों में लोग सिंदूर खेला के बारे में जानने लगे हैं. कई जगहों पर दशमी के दिन सिंदूर खेला की रस्म होती है. सिंदूर खेला सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. ये रस्म यह बताता है कि कैसे एक त्योहार के जरिए महिलाएं अपनी भावनाओं को साझा करती हैं और समाज में प्रेम और एकजुटता का संदेश देती हैं। कहते है कि बंगाल में इस दौरान दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है। बंगाली समुदाय के लोग मां दुर्गा की पूजा के दौरान कई तरह की रस्में और परपंराएं निभाते हैं। इन्हीं रस्मों में से एक है- सिंदूर खेला। इस दौरान विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अपने अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं. आइए जानते हैं सिंदूर खेला के बारे में डीटेल से।।सिंदूर खेला का इतिहास: ऐसी मान्यताएं हैं है कि सिंदूर खेला की परंपरा 400 साल पुरानी है, जब पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में स्थानीय महिलाओं ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। यह परंपरा जल्द ही भारत के अन्य हिस्सों में भी पहुंच गई और आज विजयादशमी उत्सव का एक जरूरी हिस्सा बन गई है।
कैसे मनाया जाता है सिंदूर खेला: सिंदूर खेला के दौरान बंगाली महिलाएं सुंदर पारंपरिक साड़ियों और आभूषणों से सजी देवी के माथे और चरणों में सिंदूर लगाती हैं। उसके बाद वो एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद भक्त अपनी हथेलियों में पान का पत्ता लेकर उसे देवी के चेहरे से लगाते हैं. इसके बाद देवी को विदाई दी जाती है। यह रिवाज मां के चेहरे से आंसू पोंछने को दर्शाता है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र में मां अपने घर आती हैं और दशमी तिथि पर मायका छोड़कर ससुराल वापस जाती हैं। सबसे पहले उनके माथे पर सिंदूर लगाया जाता है और फिर उनको चूड़ियां (शाखा और पोला) पहनाई जाती हैं और मिठाई चढ़ाई जाती है। इसके बाद विवाहित महिलाएं एक-दूसरे के माथे और चेहरे पर यह सिंदूर लगाती हैं. वे एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर अपने सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
विधि विधान से होगा मां दुर्गा का विसर्जन: मां के नौ रूपों की पूजा के विशेष विधान के साथ-साथ उन्हें विदाई देने के भी खास नियम और महत्व हैं। इस वर्ष विजयादशमी गुरुवार को है, इसलिए मां का प्रस्थान डोली या पालकी पर होगा, जो सुख और शांति का प्रतीक माना जाता है। आइए जानते हैं इस दिन के महत्व और मूर्ति विसर्जन की विधि के बारे में।
दुर्गा विसर्जन का शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, विसर्जन के लिए सबसे उपयुक्त समय 2 अक्टूबर 2025 को सुबह 6:32 बजे से 8:54 बजे तक और फिर अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1:21 बजे से 3:44 बजे तक रहेगा। मां दुर्गा की डोली पर विदाई का महत्व : विजयादशमी के दिन माता के आगमन और प्रस्थान का वाहन निर्धारित होता है। इस साल, चूंकि विजयादशमी गुरुवार को है, मां दुर्गा डोली (नर वाहन) पर विदा होंगी। धार्मिक मान्यता: हर वाहन का अपना विशेष फल होता है। मां दुर्गा का डोली पर प्रस्थान सुख-शांति और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। यह विदाई दर्शाती है कि मां अपने भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर अगले वर्ष पुनः लौटने का वादा करती हैं। सिंदूर खेला: विसर्जन से पहले बंगाल और पूर्वी भारत में सिंदूर खेला की रस्म निभाई जाती है। इसमें विवाहित महिलाएं मां दुर्गा के चरणों में सिंदूर चढ़ाती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यह परंपरा वैवाहिक सुख, सौभाग्य और नारी शक्ति का प्रतीक है। मूर्ति और कलश विसर्जन की विधि
अंतिम पूजन और विसर्जन से पहले मां दुर्गा की प्रतिमा का षोडशोपचार पूजन करें। मां को रोली, अक्षत, फूल, मिठाई, वस्त्र आदि अर्पित करें और श्रद्धापूर्वक आरती करें। मां को सिंदूर अर्पित करें और परिवार के सदस्यों को भी सिंदूर लगाएं। मां से प्रार्थना करें: नमस्तेऽस्तु महादेवि महा मायि सुरेश्वरि. पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च. अर्थात: हे महादेवी, हे महामाया, हे सुरेश्वरी! आपको नमस्कार है. हम पूजा और आराधना के लिए आपके दोबारा आने की प्रार्थना करते हैं।
विसर्जन यात्रा : ढोल-नगाड़ों और जयकारों के साथ माता रानी का जयघोष करते हुए मूर्ति को उठाएं। प्रतिमा को सम्मानपूर्वक किसी पवित्र नदी, तालाब या कृत्रिम विसर्जन कुंड तक ले जाएं। प्रतिमा को जल में धीरे-धीरे प्रवाहित करें। पूजा के दौरान देवी को अर्पित की गई सभी सामग्री को भी प्रतिमा के साथ ही विसर्जित करें। कलश पर रखे नारियल को निकालकर परिवार की विवाहित महिला को दें या प्रसाद के रूप में बांट दें। कलश के जल को आम के पत्तों से पूरे घर में छिड़कें। यह जल नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर शुभता लाता है। बचा हुआ जल पीपल या किसी पवित्र पौधे की जड़ में डाल दें। कलश में रखा सिक्का निकालकर लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी या धन के स्थान पर रखें। यदि नदी या तालाब पास में न हो तो घर में एक बड़े पात्र में प्रतिमा को विसर्जित करके, उस मिट्टी और जल को बाद में पीपल या किसी पवित्र वृक्ष की जड़ में डाल देना चाहिए।

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