छत्तीसगढ़ की कवयित्री संतोषी डनसेना का गहरा लगाव कविता लेखन के अलावा अपने अंचल से है। नारी जीवन चेतना का भी व्यापक समावेश इनकी कविताओं में है। यहां प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की आत्मीय बातचीत…
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न: आप छत्तीसगढ़ में किस जिले की निवासी हैं? यहाँ के वन प्रांतर, लोक जनजीवन और संस्कृति के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर: मैं संतोषी डनसेना (रूही) छत्तीसगढ़ के सुंदर पठारी और वनांचल क्षेत्र जशपुर जिले की निवासी हूँ। यहाँ के घने जंगल, झरने और साल-महुआ के वृक्ष प्रकृति के अनूठे उपहार हैं। यहाँ का जनजीवन बेहद सरल और प्रकृति से जुड़ा है। हमारी संस्कृति बेहद समृद्ध है, जहाँ विवाह के अवसरों पर लोकगीत , लोक नृत्य, लोक उत्सवों में करमा की थाप और महिलाओं द्वारा सुआ नृत्य की गूंज सुनाई देती है। नई फसल के स्वागत का पर्व नवाखाई हो या दानशीलता और सामाजिक समरसता का प्रतीक छेरछेरा त्योहार, यहाँ का हर रंग माटी की सोंधी खुशबू और आपसी भाईचारे को समेटे हुए है।
प्रश्न : आप एक समर्पित शिक्षिका हैं। आपको राज्यपाल का शिक्षक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। शिक्षक समाज की अमूल्य सेवा करते हैं, इस बारे में आपके विचारों को जानकर खुशी होगी।
उत्तर: राज्यपाल शिक्षक पुरस्कार मिलना मेरे लिए गौरव के साथ-साथ जिम्मेदारी का अहसास है। शिक्षक का कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं, बल्कि एक कोमल मन को गढ़ना है। विशेषकर प्राथमिक शिक्षा में, जहाँ हम ‘फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमरेसी’ (FLN) और ‘नवाजतन’ के माध्यम से बच्चों की नींव मजबूत कर रहे हैं। शिक्षक राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करते हैं; साथ ही साथ समुदाय को भी जागरूक कर रहे हैं। जब एक बच्चा शिक्षा के प्रकाश से जुड़ता है, तो पूरी पीढ़ी बदल जाती है। शिक्षा से बड़ा सामाजिक बदलाव का कोई दूसरा माध्यम नहीं है।
प्रश्न : आपका काव्य संग्रह “अनुभव का अंकुर” काफी प्रशंसित हुआ है। इसमें संकलित कविताओं के बारे में बताइए।
उत्तर: “अनुभव का अंकुर” मेरे अंतर्मन की सहज अभिव्यक्ति है। जीवन के सफर में जो कुछ मैंने देखा और महसूस किया, वही शब्द बनकर इसमें अंकुरित हुआ है। इन कविताओं में प्रकृति प्रेम, पर्यावरण चेतना, मानवीय रिश्तों की बुनावट और विद्यालयी जीवन के अनुभव शामिल हैं। बच्चों की मासूमियत और ग्रामीण परिवेश की जिजीविषा को मैंने इसमें पिरोने का प्रयास किया है। स्थानीय बोलियों के प्रभाव ने इन रचनाओं को जीवंत बनाया है।
प्रश्न : आजकल सोशल मीडिया और डिजिटल वेबसाइट पर साहित्य प्रकाशन सुगम हो गया है, लेकिन निजी व्यावसायिक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया है। इसके बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर: डिजिटल माध्यमों ने निश्चित रूप से साहित्य का लोकतांत्रीकरण किया है, जिससे नए लेखकों को तुरंत मंच मिल जाता है। लेकिन इसके साथ ही पारंपरिक पत्र-पत्रिकाओं का बंद होना चिंताजनक है। पत्र-पत्रिकाओं का एक संपादकीय अनुशासन होता था, जो रचनाओं की गुणवत्ता बनाए रखता था। डिजिटल माध्यमों में इस नियंत्रण की कमी से कभी-कभी स्तरहीन सामग्री भी आ जाती है। प्रिंट पत्रिकाओं का अपना एक ऐतिहासिक और दस्तावेज मूल्य होता है, जिसे सहेजना जरूरी है।
प्रश्न : अपने परिवार, गाँव, शहर, शिक्षा और स्थानीय परिवेश के बारे में बताइए।
उत्तर: मेरा व्यक्तित्व ग्रामीण और कस्बाई संवेदनाओं के बीच निर्मित हुआ है। मेरे परिवार ने हमेशा मेरी शिक्षा और रचनात्मकता को संबल दिया। मेरी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा स्थानीय परिवेश में ही हुई, जिसने मुझे जमीनी हकीकत और शिक्षा की चुनौतियों को करीब से समझने का मौका दिया। यहाँ का स्थानीय परिवेश आपसी भाईचारे और सहज संवाद से भरा हुआ है, यही कारण है कि मेरी रचनाओं के पात्र इसी माटी और आम जीवन से आते हैं।
प्रश्न : ग्रामीण और कस्बाई पृष्ठभूमि के लेखक साहित्य की दुनिया में उपेक्षित महसूस करते हैं। इस बारे में आपके विचारों को जानकर खुशी होगी।
उत्तर: यह सच है कि लंबे समय तक साहित्य के केंद्र महानगर ही रहे हैं, जिससे ग्रामीण लेखकों को वह मंच नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। लेकिन मेरा मानना है कि असली भारत और उसकी मूल संवेदनाएँ गाँवों-कस्बों में ही बसती हैं। ग्रामीण लेखक सीधे जीवन के संघर्षों और लोक संस्कृति को लिखता है। अब डिजिटल क्रांति के कारण स्थितियां बदल रही हैं और उपेक्षा की यह भावना लेखन की ताकत और ईमानदारी से दूर हो रही है।
प्रश्न : साहित्य में महिला लेखन को प्रोत्साहन मिलना जरूरी है। इस बारे में आप अपने विचारों को प्रकट कीजिए।
उत्तर: साहित्य में महिला लेखन को प्रोत्साहन मिलना अनिवार्य है। जब एक महिला कलम उठाती है, तो वह सदियों की चुप्पी को तोड़कर अपने अनुभवों को प्रामाणिकता से सामने लाती है। आज की स्त्रियाँ केवल घरेलू विषयों पर नहीं, बल्कि समाज, दर्शन और राजनीति पर भी बेबाकी से लिख रही हैं। महिला रचनाकारों को जितने अधिक मंच और सुरक्षित माहौल मिलेगा, हमारा साहित्य उतना ही समृद्ध और संपूर्ण कहलाएगा।




