कवयित्री रिषिका वर्मा से राजीव कुमार झा की बातचीत…
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न : फेसबुक पर आपकी कविताएं निरंतर सबको पढ़ने के लिए मिलती रही हैं। साहित्य अब इससे सोशल मीडिया से सीधे आदमी के सामने सदैव मौजूद दिखाई दे रहा है। इस बारे में आपकी क्या राय है?
उत्तर: सोशल मीडिया ने सबको प्रसिद्ध कर दिया है। आम आदमी जहां पहले कविता अपनी डायरी में लिखता था, आज सोशल मीडिया के कारण फेसबुक इंस्टग्राम पर पोस्ट कर देता है, लोग पढ़ते है, लाइक कमेंट करते है जिससे व्यक्ति का उत्साहवर्धन भी होता है।
प्रश्न: आप कब से कविता लेखन कर रही हैं? इसकी प्रेरणा कहां से प्राप्त हुई?
उत्तर: मैं 2019 से कविता लिख रही हूं। अधिकतर जब मैं दुखी रहती हूं, या मन में कोई बात चलती रहती है तो उसे कविता के माध्यम से डायरी में लिख देती हूं।
प्रश्न: अपने घर परिवार माता – पिता और शिक्षा के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर: मैं मूल रूप से बनारस की रहने वाली हूं। मेरे माता – पिता बनारस के ही हैं। फिर मेरा 5 वर्ष दिल्ली रहना हुआ। उसके बाद मेरी नौकरी श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड में लग गई, तब से मैं वहीं हूं।
प्रश्न: संस्कृत से भी आपका गहरा लगाव है। विश्वविद्यालय में आप इस विषय की प्राध्यापिका हैं।
उत्तर : संस्कृत अब सिर्फ स्कूल कालेज में थोड़ी बहुत प्रचलित है। इस भाषा में साहित्य लेखन का पतन हो गया। इसकी शुरुआत कैसे हो सकती है? यह संविधान में आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा है?
मैं दर्शनशास्त्र की विद्यार्थी और शिक्षिका रही हूं। संस्कृत में ही अधिकतर मूल ग्रंथ होते हैं दर्शन के। इसलिए मुझे संस्कृत प्रिय है। संस्कृत को जानकार ही अपने संस्कृति को जान सकते हैं ।
प्रश्न: हिंदी में किन लेखकों और कवियों की रचनाओं को आपने पढ़ा। उनके बारे में बताइए?
उत्तर: प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, आदि की रचनाएं मुझे प्रभावित करती हैं।
प्रश्न: हमारा समाज पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध और इसके प्रभाव से भटकावग्रस्त दिखाई दे रहा है? इस संकट के चतुर्दिक पहलुओं के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर: हम धीरे – धीरे अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं जबकि बाहर के लोग हमारी संस्कृति से प्रभावित हो रहे हैं। यह सही नहीं है। हमारी संस्कृति सबसे पुरानी है, हमें अपनी संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।
डॉ. ऋषिका वर्मा
सहायक आचार्य
दर्शन विभाग
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड
जन्म: वाराणसी, उत्तर प्रदेश
पिता: श्री लक्षमण प्रसाद वर्मा
पुस्तकें: 1. सांख्यदर्शन एवं शांकरवेदान्त का तुलनात्मक अध्ययन, 2. भामती एवं विवरण प्रस्थान का
तुलनात्मक अध्ययन, 3. योग के विभिन्न आयाम, 4. अभिव्यक्ति, 5. शब्दांकुर
सम्मान/ पुरस्कार: सांख्यदर्शन एवं शांकरवेदान्त का तुलनात्मक अध्ययन नामक पुस्तक के लिए कृष्णकांत
चतुर्वेदी अलंकरण पुरस्कार एवं भामती एवं विवरण प्रस्थान का तुलनात्मक अध्ययन
नामक पुस्तक के लिए सीमा अपराजिता सम्मान, विश्व साहित्य सम्मान
संप्रति: सहायक आचार्य, दर्शन विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर, गढ़वाल उत्तराखंड-246174
संपर्क: दर्शन विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर , गढ़वाल उत्तराखंड-246174
मोबाइल नंबर: 9990469933
ईमेल आइडी: rishika.verma75@gmail.com


