कवयित्री कंचन वार्ष्णेय ‘कशिश’ से राजीव कुमार झा की बातचीत…

साहित्य:साक्षात्कार

प्रश्न: आप कहां की निवासी हैं? हिंदी साहित्य से आपका लगाव कैसे क़ायम हुआ?
अपने घर परिवार माता- पिता इन सबके बारे में बताइए?

उत्तर: मैं दिल्ली के यमुना विहार की निवासी हूं । यहां का साहित्यिक परिवेश जीवंत और आत्मीयता से परिपूर्ण है। इस शहर में मै 30 वर्षों से रह रही हूं। मेरी मां का बचपन में ही देहांत हो गया था तभी से ही लिखने का शौक लग गया । हिंदी साहित्य से प्रेम था और इसी विषय में महारत हासिल करते हुए एम. ए . हिंदी किया। शुरू से हिंदी और संस्कृत भाषा की अध्यापिका रही।
इसी साहित्यिक परिवेश में मैं लिखने लग गई। पिता ने छोटी उम्र में ब्याह दिया वो भी 11साल बड़े आदमी से… जिसकारण पति से कभी बनी ही नहीं । कुछ ये दर्द भी कविता लिखने को प्रेरित करता रहा था। एम. ए. करने के बाद ही ससुराल आ गई जहां बी. एड. की शिक्षा लेकर अध्यापन कार्य में जुट गई।।

प्रश्न: कशिश काव्य मंच की शुरुआत आपने कब और कैसे की ?

उत्तर: करोना काल में हमारे लेखन को बहुत बड़ी हवा मिली और हमने समय पास करने के लिए एक ग्रुप “कशिश” के नाम से बनाया और नाम के आगे तखल्लुस “कशिश” लगाया…!
जिससे हमें पहचान मिलनी शुरू हुई। हमारे काव्य प्रेम से फेसबुक पर कविता से लगाव रखने वाले कमोबेश सारे लोग परिचित हैं। धीरे- धीरे कविता के प्रति अधिक अनुराग हमारे हृदय में जागृत हुआ…
और कई साझा संकलन में रचनाएं छपीं, कई रचनाएं बहुत प्रसिद्ध हुईं जिसमें… ये प्रमुख रही।
“तोड़ते तो सब हैं तुम जोड़ना सीखो….!!”

प्रश्न: फेसबुक पर कशिश काव्य मंच की गतिविधियों के बारे में जानकारी दीजिए।

उत्तर: फेसबुक पर कशिश काव्य मंच की ओर से आनलाइन गोष्ठियां बहुत कम हुई… !
सिर्फ हमारा लेखन जारी रहा। हमने एक सहयोगी काव्य संकलन का संपादन किया है जिसका नाम अनकहे अल्फ़ाज है।‌ सहयोगी काव्य संकलनों का प्रकाशन नवोदित लेखकों के अलावा सभी लेखकों के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है। इस बात से मैं पूर्णतया सहमत हूं?

प्रश्न: आपको किन लेखकों के साहित्य को पढ़कर प्रेरणा प्राप्त हुई?

उत्तर: मैं महादेवी वर्मा जी की रचनाओं को बहुत पसंद करती थी । जयशंकर प्रसाद की कामायनी मेरे अंदर तक मुझे छूती है । मेरा सपना पी. एच- डी. करके प्रोफेसर बनने का था …. पर वो अधूरा ही रहा ।

प्रश्न: कविता के अलावा साहित्य की अन्य किन विधाओं में लेखन कार्य करना आपको प्रिय है?

उत्तर: मेरी अभिरुचि कविता के अलावा अन्य विधाओं के लेखन में भी है।‌ मैंने कुछ ही लघुकथाओं को लिखा है, कुछ संस्मरण भी लिखे हैं। स्त्री के दर्द को कविता में पिरोना मुझे बखूबी आता है।
श्रद्धा कांड पर लिखी रचना मुझे हर सम्मेलन में सुनाने को जब बोलते तो अच्छा लगता था,,
मंच संचालन मेरे खून में शुरू से रहा है,, दिल्ली से बाहर के कार्यक्रमों में लोग मंच संचालन के लिए अभी भी बुलाते हैं,, दिल्ली के अनेक छोटे बड़े कवि सम्मेलनों में मंच संचालन बखूबी करती आई हूं और आज की तारीख में अपना मंच “कशिश काव्य मंच” अब सरकारी मान्यता प्राप्त मंच है जो 2024 में रजिस्टर्ड करा लिया था।। हमारा मंच साल में पांच कार्यक्रम आयोजित करता है और नवांकुरों के साथ- साथ सभी वरिष्ठ कवियों को एक सशक्त मंच प्रदान करता है।। जीवन में कड़ा संघर्ष करते हुए आज इस मुकाम पर पहुंचने के लिए मैं अपने मित्रों, और सहयोगी लोगों को धन्यवाद देती हूं जिन्होंने मुझे प्रेरित किया। मेरे दो एकल काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
तीसरा काव्य संग्रह इस वर्ष प्रकाशित होने के लिए गया हुआ है।

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