*”स्मृति और संस्कृति का पर्व: परशुराम जयंती पर पिता को समर्पित लेखनी”*

`रवींद्र सिंह 'मंजू सर', मैहर की विशेष कलम से`

 

रमेश ठाकुर – पश्चिम चंपारण,बिहार_अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर जहां एक ओर भगवान परशुराम का धरती पर अवतरण हुआ, वहीं यह तिथि सनातन संस्कृति, पौराणिक महापुरुषों और ऐतिहासिक घटनाओं से भी जुड़ी हुई है। इसी अवसर पर राष्ट्रीय अधिमान्य पत्रकार संगठन के जिलाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन (ए) के मध्यप्रदेश उपाध्यक्ष रवींद्र सिंह ‘मंजू सर’ ने अपने स्वर्गीय पिता श्री शरद कुमार सिंह को श्रद्धांजलि स्वरूप एक भावपूर्ण लेख प्रस्तुत किया।

श्री शरद कुमार सिंह न केवल एक उत्कृष्ट शिक्षक थे, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त कलाकार भी थे। उन्होंने भगवान परशुराम की एक दुर्लभ कलाकृति का निर्माण किया था, जो आज भी वरिष्ठ समाजसेवी श्री सतीश मिश्रा के निवास पर सुरक्षित है। यही प्रतिमा एक समय समाचार पत्रों की शोभा बनी थी।

भगवान परशुराम को भारतीय वाङ्मय में सबसे दीर्घजीवी पात्र माना जाता है। सतयुग के अंत से लेकर कलियुग तक उनका उल्लेख मिलता है। उनका जीवन सामाजिक समरसता, संगठन, शक्ति और संस्कारों की मिसाल रहा है। उन्होंने समाज में फैली असमानता, अहंकार और अत्याचार का डटकर विरोध किया। उनका उद्देश्य क्षत्रियों का विनाश नहीं, अपितु अन्याय और अहंकार का शमन था।

परशुराम ने मानव जीवन को एक व्यवस्थित ढांचे में ढालने का कार्य किया। दक्षिण भारत में उन्होंने कमजोर वर्गों को संगठित कर समुद्री तटों को बसने योग्य बनाया। उनकी योजनात्मक सोच का उदाहरण ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम भी है, जिसे उन्होंने कैलाश मानसरोवर से ब्रह्म कुंड के माध्यम से प्रवाहित किया।

भगवान परशुराम भृगु वंश से थे। यह वही वंश है जिसमें महर्षि भृगु, मार्कण्डेय, दधीचि, च्यवन जैसे ऋषि उत्पन्न हुए। श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— “मैं ऋषियों में भृगु हूं।” परशुराम जी ने अपने वंश की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नीतियों, ज्ञान और विज्ञान को समाज तक पहुंचाया।

इस दिन कई अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं— जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव का पारणा, गंगा अवतरण, अन्नपूर्णा माता का जन्म, पांडवों को अक्षयपात्र की प्राप्ति, कृष्ण-सुदामा मिलन, कुबेर को खजाने की प्राप्ति और वेदव्यास द्वारा महाभारत लेखन की शुरुआत। इसलिए यह तिथि हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखती है।

भगवान परशुराम केवल एक जाति के आदर्श नहीं, अपितु समस्त हिन्दू समाज के प्रेरणा स्रोत हैं। उनका जीवन चरित्र सभी वर्गों के लिए एकता, शक्ति और संस्कार का संदेश देता है।

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