विषहरी पूजा : भागलपुर-अंग क्षेत्र की लोकआस्था में आज भी जीवित है बिहुला-लखेंद्र की गाथा
* चंपानगर से जुड़ी है मां मनसा विषहरी की पूजा की परंपरा, लोकगीत और मंजूषा कला के जरिए पीढ़ियों से आगे बढ़ रही लोककथा
अजित प्रसाद /भागलपुर: भागलपुर और अंग क्षेत्र में विषहरी पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यहां की लोकसंस्कृति और आस्था की गहरी पहचान है। मां मनसा विषहरी की पूजा से जुड़ी परंपरा चंपानगर और बिहुला-लखेंद्र की लोकगाथा से जुड़ी मानी जाती है। सदियों से चली आ रही यह कथा आज भी लोकगीतों, मंजूषा कला और धार्मिक परंपराओं के माध्यम से लोगों के बीच जीवित है।
नाग और विष से जुड़ी देवी हैं मां विषहरी
लोकमान्यता के अनुसार मां विषहरी यानी मां मनसा को नागों और विष से संबंधित देवी माना जाता है। मान्यता है कि उनकी आराधना करने से सर्पदंश और विष से रक्षा होती है। इसी विश्वास के कारण अंग क्षेत्र में विषहरी पूजा को विशेष धार्मिक महत्व मिला और समय के साथ यह यहां की प्रमुख लोकपरंपराओं में शामिल हो गयी।
चांदो सौदागर से शुरू होती है लोकगाथा
विषहरी पूजा की प्रसिद्ध लोकगाथा में चांदो सौदागर का महत्वपूर्ण स्थान है। कथा के अनुसार चंपानगर में चांदो सौदागर नाम के एक बड़े व्यापारी रहते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और केवल शिव की पूजा करते थे। मां विषहरी चाहती थीं कि चांदो सौदागर उनकी भी आराधना करें, लेकिन उन्होंने इसके लिए सहमति नहीं दी।
मां विषहरी के क्रोध से परिवार पर आयीं विपत्तियां
लोककथा के अनुसार चांदो सौदागर के इनकार से मां विषहरी नाराज हो गयीं। इसके बाद उनके परिवार पर कई विपत्तियां आने लगीं। चांदो सौदागर के छोटे बेटे बाला लखेंद्र का विवाह बिहुला से हुआ। बेटे और बहू की सुरक्षा के लिए चांदो सौदागर ने ऐसा विशेष घर बनवाया था, जिसमें सांप प्रवेश नहीं कर सके।
नाग ने डसा बाला लखेंद्र को
लोकमान्यता के अनुसार तमाम सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद नाग उस घर में पहुंच गया और उसने बाला लखेंद्र को डस लिया। इसके बाद बिहुला के जीवन में संघर्ष का दौर शुरू हुआ। पति की मृत्यु के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उन्हें पुनर्जीवित कराने का संकल्प लिया।
पति को जीवित कराने निकलीं बिहुला
लोकगाथा के अनुसार बिहुला अपने पति के शव को मंजूषा में रखकर गंगा के रास्ते स्वर्गलोक की ओर निकल पड़ीं। उनका उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न कर बाला लखेंद्र के प्राण वापस लाना था। उनकी यह यात्रा बिहुला-विषहरी की गाथा का सबसे भावुक और चर्चित प्रसंग मानी जाती है।
प्रेम और तपस्या से मिली सफलता
कथा के अनुसार बिहुला की दृढ़ता, प्रेम और तपस्या से देवता प्रसन्न हुए और बाला लखेंद्र को पुनर्जीवन मिला। इसी वजह से बिहुला को लोकपरंपरा में अटूट प्रेम, साहस और संघर्ष की प्रतीक माना जाता है।
बाएं हाथ से पूजा करने की मान्यता
बिहुला के प्रयासों के बाद चांदो सौदागर मां विषहरी की पूजा करने के लिए तैयार हुए। हालांकि लोकमान्यता के अनुसार उन्होंने मां विषहरी की पूजा दाहिने हाथ से नहीं, बल्कि बाएं हाथ से की। विषहरी पूजा से जुड़ी यह मान्यता आज भी लोकगाथा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मंजूषा कला में दिखती है पूरी कथा
भागलपुर की प्रसिद्ध मंजूषा कला में बिहुला, लखेंद्र, चांदो सौदागर और मां विषहरी से जुड़ी कथा के प्रसंगों को चित्रित किया जाता है। पूजा के अवसर पर लोकगीतों और पारंपरिक प्रस्तुतियों के जरिए भी इस गाथा को लोगों तक पहुंचाया जाता है। इस तरह विषहरी पूजा धार्मिक आस्था के साथ अंग क्षेत्र की लोककला और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम भी बनी हुई है।



