आधुनिकता के दौड़ में मातृभाषा पीछे क्यों? हिंदी को गर्व से बोलें, यह हमारी शान है!

रवींद्र सिंह (मंजू सर) मैहर की कलम से`

 

_रमेश ठाकुर- पश्चिम चंपारण,बिहार_आज का युग आधुनिकता और प्रौद्योगिकी का युग है। विज्ञान, व्यापार, शिक्षा और संचार में अंग्रेजी भाषा का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अपनी मातृभाषा को पीछे छोड़कर हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? हिंदी, जो हमारी संस्कृति, परंपरा और पहचान का अभिन्न हिस्सा है, उसे अपनाने में हमें झिझक क्यों होती है? क्या हमें अपने ही शब्दों का उपयोग करने में शर्म महसूस होती है? क्या हमें हिंदी को हिंदी कहने में कोई दिक्कत है?

अक्सर देखा जाता है कि लोग हिंदी शब्दों की बजाय अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसा मान लिया गया है कि अंग्रेजी बोलना ही आधुनिकता की पहचान है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या हम अपनी जड़ों से कटकर विकास कर सकते हैं? आइए, कुछ उदाहरणों पर गौर करें—

लेडी को औरत, वेल्थ को दौलत, हैबिट को आदत, इंडिया को भारत कहने में क्या दिक्कत है?

वॉटर को जल, टुमारो को कल, क्रेजी को पागल, सॉल्यूशन को हल कहने में क्या समस्या है?

वरशिप को पूजा, सेकंड को दूजा, इनिंग को पारी, हैवी को भारी कहने में क्या परेशानी है?

टेन्स को काल, रेड को लाल, नेट को जाल, चीक्स को गाल कहने में क्या आपत्ति हो सकती है?

किंग को राजा, बैंड को बाजा, फ्रेश को ताजा, कम इन को आ जा कहने में हमें कठिनाई क्यों होती है?

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह हमारी सोच, संस्कृति और पहचान को भी दर्शाती है। हिंदी भाषा की मिठास, सहजता और व्यापकता इसे विशेष बनाती है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी अंग्रेजी को अपनाने की होड़ में हिंदी से धीरे-धीरे दूरी बना रही है।

आजकल स्कूलों में बच्चे अंग्रेजी में बात करना पसंद करते हैं, ऑफिसों में अंग्रेजी बोलना जरूरी समझा जाता है, यहां तक कि घरों में भी हिंदी की बजाय अंग्रेजी शब्दों का अधिक प्रयोग होने लगा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि हिंदी बोलने में हीन भावना आने लगी है, जबकि अंग्रेजी को सभ्यता और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाने लगा है।

क्या सच में अपनी भाषा को अपनाने से हम पिछड़ जाएंगे? बिल्कुल नहीं! बल्कि, इससे हमारी संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव मजबूत होगा।

हमारे देश में कई भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन हिंदी एक ऐसी भाषा है जो सबसे व्यापक रूप से समझी और बोली जाती है। इसे बोलने में संकोच करने की जरूरत नहीं है, बल्कि गर्व महसूस करना चाहिए।

यदि हम हिंदी शब्दों को अपनाते हैं, तो इससे न केवल हमारी भाषा समृद्ध होगी बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान भी बनी रहेगी। हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारे इतिहास, परंपरा और संस्कृति का आईना है।

तो सवाल यह नहीं है कि हिंदी शब्दों का प्रयोग करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि हमें हिंदी को अपनाने में आखिर दिक्कत क्या है?

(यह लेख रवींद्र सिंह (मंजू सर) मैहर की कलम से प्रस्तुत किया गया है।)

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