सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया दिशा-निर्देश
आवारा कुत्तों पर गिरेगी गाज
-कोर्ट के फैसला से कई पशुप्रेमी संगठनों में मायूसी
-नगर निकायकर्मी सुस्त व संसाधनहीन
अखिलेश कुमार अखिल नई दिल्ली। मानव सभ्यता के आदिकाल से ही कुछ जानवर मनुष्य के करीब रहे हैं। सबसे करीबी में कुत्ता, बिल्ली, बकड़ी, गाय, भैंस, घोड़ा, गदहा आदि। पंछियों में मुर्गा, कबूतर, तोता, बत्तक मनुष्य के करीबी माने जाते हैं। दुनिया के कई देशों में इनके लिए सख्त कानून हैं। उनकी देखरेख का खासा ध्यान रखा जाता है। सरकार द्वारा अच्छी-खासी धन का आबंटन किया जाता है। पालतु जानवरों में कुत्ता को मनुष्य का सबसे करीबी वफादार दोस्त माना गया है। सच भी है कि कुत्ता अपने मालिक का सबसे वफादार दोस्त साबित होता है। मुख्यतः कुत्ता की दो श्रेणियां हैं-एक पालतु और दूसरा आवारा। हालांकि कुत्ता के दुनिया में कई नस्ल पाये जाते हैं। लोगबाग शौकिया तौर पर ऐसे कुत्ते अपने निवास पर पालते हैं। उसका रख-रखाव, खानपान, दवा-दारु की व्यव्स्था मालिक करते हैं। लेकिन आवारा कुत्तों का कोई माई-बाप नहीं होता है।
आवारा कुत्ते गलियों, सड़कों, पार्कों, चौराहों, मंदिरों, अस्पतालों, बस अड्डों, स्टेशनों, स्कूलों जैसे सार्वजनिक जगहों पर पाये जाते हैं। ऐसे कुत्ते का कोई मालिक नहीं होता है और न कोई देखरेख करने वाला होता है। इन कुत्तों से लोगों को खतरा रहता है। अक्सर ऐसे कुत्ते लोगों को काट खाते हैं। कुत्ता के काटने से रेबिज नामक बीमारी हो जाती है जो जानलेवा साबित होती है। यहां सवाल यह भी है कि शहरों में कुत्ता का क्या उपयोग है। ग्रामीण क्षेत्रों में चोर-डाकुओं, हिंसक जानवरों से बचाव के लिए कुत्ता पालना युक्तिसंगत लगता है, लेकिन शहरों में बेतुकी बात है। यह दीगर बात है कि जानवर प्रेमी कुत्ता पालते हैं और उसका देखरेख करते हैं। लेकिन आवारा कुत्तों से आम लोगों को हो रही परेशानी को देखते हुए पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने रेबीज से पीड़ित, लाइलाज बीमारियों से ग्रस्त, खतरनाक व हिंसक कुत्तों को मारने की अनुमति दे दी है। इसमें नियम-कानूनों का कड़ाई से पालन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार में यह अधिकार शामिल है कि कोई व्यक्ति कुत्तों के काटने व उनके हमलों के खतरों के बिना स्वतंत्र रुप से घूम सके और सार्वजनिक जगहों पर जा सके। इस मामले को लेकर सरकार निष्क्रिय दर्शक बनकर नहीं रह सकती। आवारा कुत्तों को दूसरी जगह भेजने और उनके बंध्याकरण का आदेश वापस लेेने की मांग वाली अर्जियां खारिज करते हुए कोर्ट ने आवारा कुत्तों से लागों की सुरक्षा के निर्देशों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और अन्य याचिकाओं के जबाव में कहा कि कोर्ट जमीनी हकीकत से आंखें नहीं बंद कर सकता, जहां बच्चे, बुजुर्ग और विदेशी पर्यटक कुत्तों के काटने की घटनाओं का शिकार हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं के आंकड़े भी दिए और कहा कि जब इंसानों की सुरक्षा को संवेदनशील जीवों के हितों और भलाई के मुकाबले तोला जाता है, तो संवैधानिक संतुलन को बिना शक के इंसानी जान की रक्षा व सुरक्षा के पक्ष में झुकना चाहिए। हालांकि पशु प्रेमियों और खासकर डॉग लवर्स को सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती रास नही आएगी, पर आखिर इसकी अनदेखी कैसे कर सकते हैं। हर दिन ऐसी खबरें आती हैं कि आवारा कुत्तों ने किसी बच्चे, महिला या बुजुर्ग को दौड़ाकर काट खाया। कुछ दिल दहलाने वाली खबरें आती हैं कि आवारा कुत्तो ने नवजात शिशु को नौंचकर खा गया या फिर किसी दोपहिया वाहन सवार कुत्तों के हमला से गंभीर रुप से घायल हो गए और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
आवारा कुत्तों से संबंधित समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं है। कुत्तों की तेजी से बढ़ती आबादी कस्बों और गांवों के लोगों को भी आतंकित कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहरा तो दिया कि उसके आदेश का पालन न करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, लेकिन यह गौरतलब है कि हमारे नगर निकाय आवारा कूत्तों को नियंत्रित करने के मामले में अत्यन्त सुस्त और संसाधनहीन हैं। यही कारण है कि सार्वजनिक जगहों पर उनकी संख्या बढ़ती जा रही है और उनकंे काटने की भी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन के साथ जन सामान्य को भी इस दिशा में जागरुक होने की जरुरत है।



