डॉ सुधा सिन्हा पटना विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रही हैं और इनका साहित्य लेखन से भी गहरा लगाव रहा है। यहां प्रस्तुत है राजीव कुमार झा के साथ इनकी संक्षिप्त बातचीत…
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न: अपने प्रारंभिक जीवन शिक्षा दीक्षा के बारे में बताइए?
उत्तर: मेरा जन्म आरा में हुआ। मैट्रिक मैंने मुजफ्फरपुर के महिला शिल्पकला विद्यालय से किया। बी. ए .तक की पढाई लंगट सिह कालेज से की। मैं स्कूल से कालेज तक प्रथम रही । मुझे राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी मिली। एम. ए. भागलपुर विश्वविद्यालय से किया।आज वह तिलका मांझी विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है। वहां मुझे स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। शादी पटना मे हुई । पटना विश्वविद्यालय के मगध महिला महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग मे लेक्चरर के रूप में नियुक्ति हुई । फिर पटना विश्वविद्यालय में पीजी विभाग मेें प्रोफेसर के रूप में प्रोन्नति हुई । वहां मै अध्यक्ष बनी। वहीं से सेवानिवृत हुई। मैंने पद्मश्री डाक्टर रामजी सिंह के निदेशन मे’ विनोबा के चिंतन में ब्रह्म विद्या एक समीक्षात्मक अध्ययन’ पर शोध किया। साहित्य मे अभिरूरुचि होने के कारण
बाद में साहित्य से जुड़ गयी।अनेकों छात्रों ने मेरे निदेशन में शोघ किया।यह मेरी खुशनसीबी है कि सभी लेक्चरर के रूप में नियुक्त हो गये हैं। गुरु अपने शिष्यों के द्वारा जाना जाता है।आज वे शिष्य मेरी पहचान बन गये हैं। मेरे बहुत से शोध-पत्र स्तरीय जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। साहित्यिक रचनाओं का भी प्रकाशन हुआ है।
संप्रति मैं विभिन्न आयोगों में सदस्य हूं । मेरा मनोनयन राष्ट्रपति द्वारा हुआ है।
प्रश्न – आपने बाल साहित्य लेखन भी किया है?
उत्तर: यहां जब भी गोष्ठियों में जाती तो लोग कहते “मैडम बच्चों पर कुछ लिखिए।”
मेरे मन में प्रेरणा जगी और मैंने दो पुस्तकें लिख डालीं – चुन्नू मुन्नू के कारनामें और गोलू की गोल गोल बातें।
“चुन्नू मुन्नू के कारनामें” अत्यन्त ही शिक्षाप्रद है। दैनिक जीवन के उदाहरणों के द्वारा पानी का बरसना तथा सूर्य एवं चंद्र ग्रहण का लगना जैसे तथ्यों की व्याख्या की गयी है। फिर लालच बुरी बलाय ,नकलची नही बनना_ आदि तथ्यों को बिल्ली एवं बंदर के उदाहरणों से समझाया गया है । इसमें चित्रों का भी सहारा लिया गया है। पुस्तक अत्यन्त ही रोचक है।
बच्चों की तोतली बातों के आधार पर गोलू की गोल – गोल बातों का सर्जन हुआ है।
प्रश्न: पश्चिमी संस्कृति वैश्विकरण
की चर्चा के बीच भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम हम सबके हृदय में स्थित शाश्वत आत्मीय भाव है। आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर:भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति अनूठी है।मैं नहीं कहती कि पाश्चात्य संस्कृति खराब है और भारतीय संस्कृति अच्छी है।मै तौ बस इतना ही कहना चाहूँगी कि प्रत्येक देश की अपनी संस्कृति होती है और उसी के अनुरुप रहने से सुख एवं शान्ति की प्राप्ति होती है।
प्रश्न: पटना के बारे में अपने मन के भावों को कैसे प्रकट करना चाहेंगी?
उत्तर: मैं पटना में 1971 से रह रही हूं।पटना ने झोली भर उपहार दिया। आईआईटीअन बेटा तथा प्रोफेसर बेटी दी। नौकरी दी । यश मान दोस्तों का प्यार सबकुछ दिया।
पटना की धरती को सौ बार नमन है!
इसके जैसा न कोई चमन है।
प्रश्न: अब यह कहा जाता है कि समाज काफी बदल गया है। समाज में नारियों का जीवन काफी सशक्त हो गया है। इस बारे में आपकी क्या राय है?
उत्तर: यह सुनना अजीब लगता है कि अब नारी सशक्तीकरण का जमाना है!
पर सारी बातें थोथी लगतीं हैं।अभी भी बहुत से घरों में इन्हें दूसरा दर्जा प्राप्त है। इनके पढने लिखने पर रोक है। छुप – छुपके लिखती – पढ़ती हैं। इन सभी दकियानूसी विचारों को तोड़ना होगा। हमेशा बने बनाए रास्ते नहीं मिलते।
कभी – कभी रास्ता बना कर उस पर चलना पड़ता है।
प्रश्न: अपने घर परिवार के बारे में बताएं?
उत्तर: पति जैन कालेज आरा मे विज्ञान के प्रोफेसर थे। अभी सेवानिवृत्त हो गये हैं। बेटा आईआईटी इन्जीनियर है तथा बेटी नोयडा अमेटी में प्रोफेसर है। पिताजी एवं श्वसुरजी का देहावसान हो गया है।
बहुतों ने बहुत कुछ कहा।
मैं बस इतना ही कहूँगी कि अगर आप किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट लाते हैैं तो यही आपके जीवन की उपलब्धि है।आपकी वजह से किसी का मुस्कुराना आपके लिए पूजा है।



