त्योहार बंगाली संस्कृति की पारिवारिक गर्मजोशी, आतिथ्य और भोजन-प्रेम का सुंदर उदाहरण माना जाता है- जमाई षष्ठी
अजित प्रसाद,सिलीगुड़ी : जमाई षष्ठी का संबंध देवी षष्ठी से माना जाता है, जिन्हें बच्चों और परिवार की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। इस दिन सास देवी षष्ठी की पूजा करके अपनी बेटी और दामाद के सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती है।
एक लोककथा के अनुसार, एक महिला ने देवी षष्ठी के वाहन (बिल्ली) पर झूठा आरोप लगाया था। बाद में देवी के क्रोध और फिर क्षमा की कथा से षष्ठी पूजा की परंपरा जुड़ी। समय के साथ यह पूजा दामाद के सम्मान के उत्सव के रूप में विकसित हो गई।
बेटी और दामाद को मायके बुलाया जाता है। यह परिवार के पुनर्मिलन का अवसर भी होता है।
सास दामाद का पारंपरिक तरीके से स्वागत करती है:
• माथे पर दही या चंदन का तिलक (फोटा)
• धान और दूर्वा से आशीर्वाद
• पीला पवित्र धागा (रक्षा सूत्र) बांधना
• फल और मिठाइयाँ देना
सास देवी षष्ठी की पूजा करके बेटी-दामाद के सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना करती है।
यह त्योहार अपने शानदार खाने के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध है। दामाद को परिवार का विशेष अतिथि माना जाता है।
बंगाली परिवारों में दामाद के लिए कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं, जैसे:
• शुक्तो * लूची * पुलाव * माछेर झोल (मछली करी) * चिंगड़ी मलाईकारी (प्रॉन करी)
• मटन * आम (हिमसागर आम विशेष रूप से) * लीची * रसगुल्ला * संदेश * मिष्टी दोई (मीठा दही)
कई घरों में 10–15 या उससे भी अधिक व्यंजन परोसने की परंपरा रही है।
सामाजिक महत्व
जमाई षष्ठी केवल दामाद को खिलाने-पिलाने का त्योहार नहीं है। इसका उद्देश्य:
• बेटी और उसके परिवार से संबंध मजबूत करना
• दो परिवारों के बीच प्रेम बढ़ाना
• पारिवारिक एकता और सम्मान बनाए रखना
• रिश्तों को उत्सव के रूप में मनाना है।
आजकल बड़े शहरों में भी जमाई षष्ठी मनाई जाती है। कई बंगाली रेस्तरां और होटल विशेष “जमाई षष्ठी मेन्यू” या “जमाई भोज” आयोजित करते हैं। हालांकि पारिवारिक मिलन और दामाद के सम्मान की मूल भावना आज भी वही है।
बंगाल में मज़ाक में कहा जाता है कि “साल भर में एक दिन दामाद राजा बन जाता है, और वह दिन है जमाई षष्ठी!” यह त्योहार बंगाली संस्कृति की पारिवारिक गर्मजोशी, आतिथ्य और भोजन-प्रेम का सुंदर उदाहरण माना जाता है।




