कानपुर में अतिक्रमण का खेल मतलब पहले कराते ,फिर हटवाते ,इसलिए परेशान गरीब

 

सुनील बाजपेई
कानपुर। कहीं भी हो और किसी भी रूप में हो अतिक्रमण साधन संपन्न अमीरों का नहीं बल्कि उन गरीबों की मजबूरी ज्यादा है ,जो आज भी रोटी कपड़ा और मकान जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं । कानपुर में भी इस तरह की अतिक्रमण की भरमार है। इस आक्रमण का खेल भी कम दिलचस्प नहीं। यह पहले रिश्वत लेकर लगवाया जाता है और फिरकुर्सी बचाने के लिए हटवाया भी जाता है ,जिसको लेकर सबसे ज्यादा हताशा, निराशा और परेशानी का शिकार अधिकांश मध्यम वर्गीय गरीब लोग ही होते हैं। ऐसा ही कुछ आज शुक्रवार को होता नजर आया । आज यहां कई क्षेत्रों में अतिक्रमण हटाया गया इसमें जो लोग प्रभावित हुए उनमें मध्य वर्गीय गरीब लोगों की भी संख्या ज्यादा है ,जो छोटी-मोटी दुकान आदि लगाकर अपने परिवार का गुजारा करते हैं।
अतिक्रमण के खिलाफ नगर निगम ने पुलिस के साथ मिलकर कई इलाकों में जो अभियान चलाया। उसमें कई सड़कों से अवैध कब्जे हटाए गए । इस दौरान, बुलडोजर और नगर निगम के अन्य वाहनों के पहुंचने से पहले ही दुकानदारों ने अपना सामान और काउंटर अंदर रखवा लिया था।
इस अभियान के तहत बड़ा चौराहा से कचहरी तक हरजेन्दर नगर से लाल बंगला तक, किदवई नगर चौराहा से शनि मंदिर तक, कंपनी बाग से कर्बला तक, वीरेंद्र स्वरूप स्कूल (गोविंद नगर), गोल चौराहा से गीता नगर क्रॉसिंग तक आदि इलाकों में कार्रवाई की गई। नगर निगम की इस कार्रवाई पर स्थानीय लोगों ने गुस्सा भी दिखाई पड़ा। उनके मुताबिक इस तरह की अभियानों से सबसे ज्यादा रोजी-रोटी गरीबों के ही प्रभावित होती है। नाम न छापने की शर्त पर कई दुकानदारों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक इस तरह का आक्रमण पुलिस वाले ही पैसे लेकर कराते हैं लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती जबकि उनकी दुकानों आदि को अतिक्रमण बताकर हटा दिया जाता है ,जिससे उनके सामने जो भी रोटी की समस्या पैदा होती रहती है।

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