बेबस शफीकुल की ज़िंदगी की जंग — एक माँ की पुकार, समाज से उम्मीद

 

अजित प्रसाद /जलपाईगुड़ी: माल ब्लॉक के तेशिमला ग्राम पंचायत अंतर्गत पश्चिम टेशिमला गांव का रहने वाला शफीकुल इस्लाम सिर्फ़ 22 साल का एक नौजवान, जो आज जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा है। जिस उम्र में युवा अपने करियर की शुरुआत করে, परिवार की रीढ़ बनते हैं, उस उम्र में शफीकुल पिछले डेढ़ साल से बिस्तर पर पड़ा हुआ है — गले की एक জटिल बीमारी ने उसे पूरी तरह कमजोर और असहाय बना दिया है।

शुरुआत में यह बीमारी मामूली लग रही थी। लेकिन धीरे-धीरे शफीकुल की हालत बिगड़ने लगी। अब डॉक्टरों का कहना है कि उसके इलाज के लिए तत्काल किसी उन्नत मेडिकल फैसिलिटी वाले राज्य में ले जाना ज़रूरी है। मगर एक गरीब परिवार के लिए यह खर्चा उठाना लगभग नामुमकिन हो गया है।

इसी बीच समाजसेवी फिरदौस अली, साहेबबुर रहमान, नाज़िम हुसैन और नूर इस्लाम सहित कई स्थानीय लोग शफीकुल के घर पहुंचे। उसकी माँ की चीख-पुकार सुनकर गांववालों से अपील की गई —
“जितना हो सके, मदद करें। छोटी-छोटी मददें मिलकर इस नौजवान की जान बचा सकती हैं।”

शफीकुल की माँ रोते हुए कहती हैं,
“मेरा बेटा अभी बहुत छोटा है, उसका पूरा जीवन बाकी है। लेकिन आज वह मौत से जूझ रहा है। शायद आप लोगों की मदद से वह फिर से जी पाए।”

बिस्तर पर पड़ा शफीकुल कुछ नहीं कहता — लेकिन उसकी आंखों में दर्द भी है, और उम्मीद भी। उम्मीद कि इंसानियत अभी ज़िंदा है, और लोगों का प्यार ही उसे एक नई ज़िंदगी दे सकता है।

यह सिर्फ़ एक युवक की कहानी नहीं — यह एक माँ की गुहार है, एक गरीब परिवार की बेबसी, और पूरे समाज के सामने मानवता की एक परीक्षा।

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