बंगाल में सत्ता परिवर्तन के लिए भाजपा लगा रही एड़ी चोटी का जोड़

 

अजित प्रसाद/सिलीगुड़ी: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज होने लगी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के शुरुआती दौरे हो चुके।अब जेपी नड्डा का 8 जनवरी को बंगाल आगमन हो रहा है। पीए मोदी 18 जनवरी को बंगाल पहुंचेंगे. टीएमसी नेताओं में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी ने भी बंगाल में अलग-अलग नामों से यात्राएं शुरू कर दी हैं। चुनाव जीतने के तमाम तिकड़म शुरू हो गए हैं।
इस बार बंगाल चुनाव में धर्म युद्ध होगा, इसके भी संकेत मिलने लगे हैं। पहले गीता पाठ हुआ. यह भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का बड़ा अभियान माना जा रहा है. टीएमसी से निकाले गए विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मसजिद की नींव रख कर मुसलमानों को एकजुट करने का संकेत दिया है. AIMIM के ओवैसी भी सक्रिय हो गए हैं. पहले से ही ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण से नाराज बंगाल का हिन्दू समाज बांग्लादेश की घटनाओं से और खफा दिखता है.
बंगाल में चुनावी जंग नहीं, ‘धर्म युद्ध’
बंगाल अभी तक धर्म और जाति की राजनीति से बचा रहा है. पर, इस बार धर्म युद्ध का शंखनाद साफ सुनाई पड़ रहा है. हुमायूं कबीर के बागी तेवर से ममता बनर्जी असहज हो गई हैं. हुमायूं अपने गृह क्षेत्र मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के तर्ज पर उसी नाम से नई मस्जिद बनवा रहे हैं. उन्हें मिल रहे चंदे और सहयोग से साफ लगता है कि मुसलमान उनके पक्ष में गोलबंद हो रहे हैं. ऐसा होना ममता बनर्जी के लिए घातक होगा. मुस्लिम वोटर ममता की पूंजी रहे हैं. उनके एकमुश्त वोट टीएमसी को ही मिलते रहे हैं. खासकर 2011 में पहली बार सत्ता में आने के बाद. ओवैसी की पार्टी AIMIM भी इस बार सक्रिय हो गई है. ओवैसी हुमायूं कबीर से हाथ मिला सकते हैं, इसकी भी भनक मिलती रही है. अगर इन्होंने मुसलमानों के वोट बंटे तो ममता को लेने के देने पड़ जाएंगे.
गीता के बाद अब कुरान पाठ का ऐलान
पार्टी से निकाले जाने के बाद हुमायूं कबीर अब टीएमसी के घोर विरोधी बन गए हैं. वह भाजपा को भी निशाना बना रहे हैं. उनके कदमों से साफ लगता है कि उनका इरादा मुस्लिम वोटरों को गोलबंद करने का है. जाहिर है कि अगर मुस्लिम वोटर गोलबंद हुए तो हिन्दू वोटर भी एकजुट हो सकते हैं. ऐसा होने पर भाजपा को स्वतः इसका फायदा मिल जाएगा. कबीर की नवगठित पार्टी को भी थोड़ा-बहुत लाभ मिलना चाहिए. दोनों ही स्थितियां ममता बनर्जी को असहज करने वाली हैं. पहले से ही SIR के नाम पर बिदकीं ममता बनर्जी को इस असहज स्थिति का भी भान है. अगर उनके तेवर और भाषणों में चुनाव आयोग के प्रति रह-रह कर गुस्सा फूटता है तो इसकी वजह टीएमसी के सामने असहज स्थितियां ही हैं. भाजपा के सहयोग से कोलकाता में गीता पाठ के सफल आयोजन के बाद अब हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में अगले महीने कुरान के सामूहिक पाठ का ऐलान किया है.
ममता का अब मंदिर निर्माण अभियान
अपने को सेकुलर बताने वाली ममता बनर्जी को भी हिन्दू वोटरों की नाराजगी और मुस्लिम वोटों के बंटवारे का भय सताने ललगा है. शायद यही वजह है कि अब उन्होंने मंदिरों के निर्माण का अभियान शुरू किया है. सबसे पहले उन्होंने दीघा में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया. 2025 के आखिरी माह में न्यूटाउन में दुर्गा आंगन की आधारशिला रखी. सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर बनवा रही हैं. इस तरह उनका झुकाव साफ्ट हिन्दुत्व की ओर साफ दिखाई देता है. हालांकि इसका कितना लाभ उन्हें मिल पाएगा, अभी यह कह पाना मुश्किल है.
ममता को मिलते हैं मुसलमानों के वोट
वर्ष 2011 में बंगाल से वामपंथी शासन की विदाई का श्रेय ममता बनर्जी को जाता है. उनकी ताकत शुरू से ही मुसलमान रहे हैं. ममता ने भी उनके लिए ‘सात खून माफ’ वाला अंदाज दिखाया है. 2021 में भाजपा जब मोदी की लहर पर सवार होकर बंगाल में सत्ता परिवर्तन की जोरदार लड़ाई लड़ रही थी तो मुसलमानों ने भाजपा के भय से टीएमसी के पक्ष में इकतरफा वोट कर दिया. तब भी मुस्लिम वोट के बंटवारे के लिए 2 पार्टियां सक्रिय थीं. एक तरफ ओवैसी की AIMIM ने सीमित सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे तो दूसरी तरफ फुरफुरा शरीफ के पीरजादे ने अपनी पार्टी बना कर मुस्लिम वोट बांटने की कोशिश की. तब मुसलमानों ने वोट बंटने पर भाजपा की कामयाबी की आशंका से टीएमसी के साथ ही जाने का फैसला किया. नतीजन बढ़ी बढ़त के बावजूद भाजपा 77 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाआ. हालांकि यह भाजपा की सीटों में जबरदस्त उछाल था. उसकी सीटें 3 से बढ़ कर विधानसभा में 77 हो गईं. दोनों के वोटों का अंतर सिर्फ 10-11 प्रतिशत का था.
भाजपा बंगाल में बढ़ती ताकत से खुश
भाजपा के लिए 77 सीटें पाना खुशी की बात थी. वह अगली बार सत्ता परिवर्तन का सपना देख रही है. स्थितियां भी आहिस्ता-आहिस्ता भाजपा के अनुकूल बन रही हैं. अव्वल तो SIR में बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम रटे हैं, दूसरे मुस्लिम वोटरों के बाबरी मस्जिद के नाम पर बंटने के आसार भी बन रहे हैं. SIR पर ममता के रुख से भी मुस्लिम संतुष्ट नहीं दिखते. उनका मानना है कि ममता ने SIR का विरोध किया और दूसरों को भी इसके लिए उकसाया, लेकिन खुद चुपके से अपने कागजात जमा करा दिए. SIR के नाम पर बड़े पैमाने पर फर्जी वोटरों का पलायन भी हुआ है. बांग्लादेश बार्डर पर कड़ाके की ठंड में भागते लोग इसका उदाहरण हैं. ममता कहती रही हैं कि बंगाल में कोई घुसपैठिया नहीं है. वे बंगाल में डिटेंशन सेंटर नहीं बनने देंगी. इसके बावजूद बड़ी संख्या में बंगाल में फर्जी वोटर बने बंगलादेशी खुद भाग खड़े हुए. ममता उनका बचाव नहीं कर सकीं. मुसलमानों में इस बात की भी नाराजगी है.
3 चुनाव से मिलते हैं बदलाव के संकेत
बंगाल में सत्ता परिवर्तन की एक अलिखित परंपरा रही है. जब सत्ता परिवर्तन होना होता है तो उसके संकेत पहले के लगातार 3 चुनावों से मिलने लगते हैं. ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होने के बाद 1998 में तृण मूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की. पहली बार टीएमसी ने 2001 में विधानसभा का चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ा. टीएमसी को 60 सीटें मिलीं. यह ममता की वामपंथी सरकार की सतत मुखालफत का परिणाम था. दूसरी बाद टीएमसी ने अकेले चुनाव लड़ा तो सीटें घट गईं, लेकिन 30 सीटों के साथ उसे अपनी वास्तविक शक्ति का एहसास भी हुआ. तीसरे प्रयास में 2011 में ममता कामयाब हो गईं और बंगाल से वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका टीएमसी ने अपने बूते सरकार बनाई.
इस बार बीजेपी का मनोबल पहले से भी बढ़ा
भाजपा भी पहले 3 सीटों पर जीती. 2021 में उसे 77 सीटें मिलीं. भाजपा के बंगाल में आधार वोट का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 2014 में मोदी लहर के बावजूद लोकसभा चुनाव में उसे सिर्फ 2 सीटें मिली थीं. तब उसका वोट शेयर सिर्फ 17 प्रतिशत था. 2019 के लोकसभ चुनाव में सीटें 18 हो गईं और उसे 40 प्रतिशत वोट मिले. उसके बाद 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीटें 3 से बढ़ कर सीधे 77 पर पहुंच गईं. टीएमसी को 47.9 प्रतिशत तो भाजपा को 38 प्रतिशत से अधिक वोट मिले. इस बार तो भाजपा का मनोबल कई राज्यों में लगातार जीत से काफी बढ़ा हुआ है. वह इस बार पूरी ताकत से मैदान में उतरेगी. तीसरे प्रयास में उसे भी कामयाबी मिल जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी।

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