आज भी लाठी बिहार की खास पहचान बनी हुई है!
राजीव कुमार झा
बिहार में यादव लाठी से पहले अपने पालतू पशुओं को हांकते थे लेकिन जब वे समाज को हांकने में जुट गए तो विद्रोह स्वाभाविक था। यहां की अपनी संस्कृति है और सारे बिहारवासी अपने तमाम लड़ाई झगड़ों के बावजूद आपस में भाई हैं। यादवों ने लालू प्रसाद के नेतृत्व में सबको अपनी लाठी से बेहाल कर रखा था और यहां अर्से तक त्राहिमाम फैला रहा । नीतीश कुमार ने भाजपा को साथ लेकर बिहार को बदहाली से उबारा। बिहार में सचमुच हमारे नेतागण अब भी सभ्य हैं और राजनीतिक वैमनस्यता की वजह से विधानसभा में अत्यंत गंदी गालियों का प्रयोग वे आपस में नहीं करते हैं । आज भी लाठी से जुड़ी काफी गंदी गालियां बिहार में लोग बकते दिखाई देते हैं लेकिन गनीमत है कि बिहार विधानसभा में सदस्यों ने एक दूसरे के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के लिए लाठी से जुड़ी पराक्रम पूर्ण गालियों का प्रयोग नहीं किया है। लालू प्रसाद को लगता था कि उनकी सरकार में पुलिस प्रशासन की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। वह सरकार संचालन में मसखरी किया करते थे और पिछड़ी जातियों के सीधे सादे लोगों से नेताओं का चुनाव उन्होंने स्वामी भाव से किया। उनमें ज्यादातर लोग अब उनका साथ छोड़ चुके हैं। मनोज कुमार झा को अपवाद कहा जा सकता है। बिहार में मूर्ख चपाट लोग आज भी लालू प्रसाद के समर्थक माने जाते हैं और उनसे किसी पार्टी के किसी नेता का कोई मतलब नहीं है क्योंकि उनकी खुशामद करना मुसलमानों के खुशामद की तरह है। जिससे कोई फायदा नहीं है शायद इसीलिए उस दौर में नीतीश कुमार को लालू प्रसाद को सत्ता से बेदखल करने में काफी संघर्ष करना पड़ा और यह समय उन्होंने केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार के लिए मंत्री के रूप में कार्य करते व्यतीत किया। लालू प्रसाद को शासन और सत्ता का कोई ज्ञान नहीं था। पिछड़ तबकों के लोगों के जन समर्थन से उनको लगता था कि बिहार में सामाजिक माहौल बदलाव की ओर अग्रसर है। बिहार में आधुनिक विकास के लिए लालू प्रसाद ने भी कम प्रयास नहीं किया और उस समय भी अंबानी वगैरह के साथ अन्य उद्योगपतियों को यहां इंडस्ट्रीज समिट में आमंत्रित किया जाता था लेकिन किसी को उन पर कोई भरोसा नहीं होता था। रेल मंत्री के रूप में भी लालू प्रसाद ने दिल्ली के आजादपुर मंडी में बिहार की सब्जियों का बाजार विकसित करना चाहा । खैर जमाना बदल गया और औद्योगिक विकास अब विकास का आधार नहीं माना जाता है और अर्थशास्त्री बिहार के सामाजिक परिवेश और पर्यावरण के अनुकूल भी इसे नहीं मानते हैं। यह ज्ञानियों और तीर्थंकरों की निष्काम भूमि है। बिहार दिल्ली हरियाणा और पंजाब नहीं है। यह खेत खलिहानों की पवित्र धरती है। आज भी लाठी
बिहार की खास पहचान बनी हुई है।



