हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा डाॅ. नगेंद्र स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन
नई दिल्ली भारत पोस्ट हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा डाॅ. नगेंद्र स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन 19 अगस्त 2025 को किया गया। दो दिवसीय कार्यक्रम का यह पहला दिन था, हिंदी विभाग की अध्यक्ष वरिष्ठ प्रोफ़ेसर सुधा सिंह ने कार्यक्रम की शुरुआत में सभी विद्वजन का स्वागत किया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर चौथे सप्तक के महत्वपूर्ण कवि नंदकिशोर आचार्य आए थे। ‘छीलते हुए अपने को’ और ‘साहित्य का स्वभाव’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक लिखने वाले नंदकिशोर आचार्य द्वारा कार्यक्रम में विषय संबंधी व सारगर्भित विचार रखे गए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह थे। साथ ही विशेष उपस्थिति के तौर पर अधिष्ठाता महाविद्यालय प्रो. बलराम पाणि तथा एवं दिल्ली विश्वविद्यालय सांस्कृतिक परिषद के अध्यक्ष अनूप लाठर भी आए थे।
शुरुआती अभिवादन में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर सुधा सिंह ने ‘डाॅ. नगेंद्र स्मृति व्याख्यानमाला’ के इतिहास को सभी विद्वजन से साझा किया। पिछले 10 वर्षों से यह व्याख्यानमाला किसी कारणवश नहीं हो पा रही थी। अपने अभिवादन में उन्होंने हिंदी विभाग को प्रतिष्ठित करने वाले प्रोफ़ेसर नगेंद्र का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा यह स्मृति व्याख्यानमाला उन्हें याद करने का एक प्रयास है। रस से संबंधित विवेचना में उन्होंने कहा कि “रस का संबंध जीवन के आस्वाद से है। उसी उलझन द्वंद से से चलते हुए हम रस के समाहार की ओर बढ़ते हैं।” अपने वक्तव्य में उन्होंने हिंदी विभाग की लंबी परंपरा का भी ज़िक्र किया। प्रो. सुधा सिंह ने कुलपति योगेश सिंह का अभिवादन किया। कुलपति ने विभागाध्यक्ष को बधाई देते हुए अपने वक्तव्य की शुरुआत की। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि “हमें गर्व है कि डाॅ. नगेंद्र जैसे प्रोफ़ेसर हमारे विश्वविद्यालय की परंपरा में आते हैं।”
रस की विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि “जीवन से यदि रस निकल जाए तो वही होता है जो मिट्टी से पानी निकल जाता है, यानी वह रेत के अलावा कुछ नहीं हो सकती। रस जीवन को जीवन बनाता है, मनुष्य को मनुष्य बनाता है।” अपने वक्तव्य में उन्होंने बहुत सारगर्भित बातें श्रोताओं से कहीं। वक्ता रुप में मुख्य वक्ता नंदकिशोर आचार्य ने ‘रस की बुनियादी अवधारणा’ से छात्रों एवं सभागार को अवगत करवाया है। उन्होंने छात्रों से रस की शास्त्रीय वृति के तौर पर नहीं अपितु एक लेखक व आम व्यक्ति के तौर पर रस संबंधित बात कही। उन्होंने कहा कि “भवभूति के अलावा किसी दूसरे कवि ने रस की चिंता नहीं की, आधुनिक काल में भी जितनी बातचीत रस को लेकर होती है वह केवल उसे खारिज करने के लिए की गई।” उन्होंने रस की बुनियादी अवधारणा छात्रों व विद्वानों के बीच रखा। उन्होंने रस को “एक नैतिक अवधारणा के रुप में माना”



