करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ महत्वपूर्ण व्रत है।
करवा चौथ कल,
* बाजार से पार्लर तक उत्साह आज
– क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा में मिट्टी का करवा ही क्यों रखा जाता है?
अजित प्रसाद / सिलीगुड़ी: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
यह व्रत उस वर्ष कल यानि 10 अक्टूबर को है। लेकिन पार्लर ही या बाजार यहां आज से ही उत्साह है। सोना के दामों में आई तेजी से महिलाओं में कुछ उत्साह कम है पर भारी के बदले हल्के गहने जरूर खरीद रहे है। इस दिन का इंतजार विवाहित महिलाएं पूरे साल करती हैं और पति की लंबी आयु व दांपत्य सुख की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। शाम के समय वे चंद्र दर्शन के बाद पूजा-अर्चना करती हैं। पूजा के दौरान महिलाएं थाली में कई वस्तुएं सजाती हैं, जिनमें मिट्टी का करवा विशेष रूप से शामिल होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा में मिट्टी का करवा ही क्यों रखा जाता है?
मिट्टी के करवे का धार्मिक महत्व: सनातन परंपरा में करवा को बहुत पवित्र माना गया है. यह पांच तत्वों – जल, वायु, अग्नि, आकाश और पृथ्वी का प्रतीक है, जिनसे मानव शरीर भी बना है। माना जाता है कि ये पांचों तत्व मिलकर वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और स्थिरता बनाए रखने में सहायक होते हैं. करवा का आकार मटके जैसा होता है, जो समृद्धि और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक माना गया है। करवा चौथ के दिन महिलाएं इस मिट्टी के करवे को देवी माता का रूप मानकर श्रद्धा से पूजा करती हैं ताकि उनका वैवाहिक जीवन मंगलमय बना रहे।
माता सीता ने शुरू की थी परंपरा: धार्मिक कथाओं के अनुसार, करवा चौथ की परंपरा बहुत प्राचीन है। कहा जाता है कि जब माता सीता ने भगवान राम के लिए व्रत रखा था और जब महाभारत काल में माता द्रौपदी ने भी अर्जुन की लंबी आयु की कामना की थी, तब दोनों ने मिट्टी के करवे का ही प्रयोग किया था. तभी से करवा चौथ की पूजा में मिट्टी के करवे को शामिल करना शुभ और आवश्यक माना जाने लगा।
करवा चौथ पर मिट्टी का करवा ही क्यों रखा जाता है?
मिट्टी का करवा धरती मां का प्रतीक माना जाता है, जो स्थिरता, धैर्य और समर्पण का भाव दर्शाता है. यह वैवाहिक जीवन में सुख और सौभाग्य बढ़ाने का प्रतीक है।पूजा के समय करवे में क्या रखा जाता है?: करवे में जल या दूध भरा जाता है और उस पर ढक्कन रखकर दीपक जलाया जाता है. पूजा के बाद यह जल चंद्र देव को अर्पित किया जाता है। क्या मिट्टी के बजाय अन्य धातु का करवा इस्तेमाल किया जा सकता है?: हां, अगर मिट्टी का करवा उपलब्ध न हो तो तांबे या पीतल का करवा भी रखा जा सकता है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से मिट्टी का करवा सबसे शुभ माना गया है। करवा चौथ की पूजा कब की जाती है? यह पूजा सूर्यास्त के बाद और चंद्रमा के उदय से पहले की जाती है. चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने के बाद व्रत पूर्ण होता है।माता करवा की पूजा की जाती है. महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं. इस पूजा में मिट्टी के करवा और छलनी का विशेष महत्व होता है. इन दोनों चीज़ों के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है. ऐसे में पूजा के बाद इस्तेमाल की गई छलनी और करवा का क्या करना चाहिए, आइए जानते हैं इस लेख के माध्यम से।
करवा चौथ की पूजा के बाद करवा का क्या करना चाहिए?
पूजा के बाद करवा को किसी पवित्र पेड़ के नीचे रखना चाहिए. आप चाहें तो करवा को नीम, पीपल, आम या बरगद के पेड़ के नीचे रख सकती हैं. हिंदू धर्म में इन पेड़ों को बेहद पवित्र और पूजनीय माना गया है.आप चाहें तो करवा को नदी में प्रवाहित भी कर सकती हैं. ऐसा करना शुभ माना जाता है.अगर आप चाहें तो पूजा में इस्तेमाल किए गए करवा को अगले साल दोबारा उपयोग के लिए संभालकर रख सकती हैं. इसके लिए करवा को घर के किसी स्वच्छ और पवित्र स्थान पर सालभर के लिए रखें। करवा चौथ पर इस्तेमाल की गई छलनी का क्या करें? मान्यता के अनुसार, पूजा में इस्तेमाल की गई छलनी को संभालकर रखना चाहिए. यदि आप चाहें तो इसे अगली बार की पूजा में दोबारा उपयोग कर सकती हैं. इसे कहीं भी इधर-उधर न फेंकें। करवा चौथ की पूजा के बाद क्या नहीं करना चाहिए? पूजा में इस्तेमाल किए गए करवा को खंडित न करें.
करवा या छलनी को किसी अपवित्र स्थान पर न फेंकें।


