शुभ संकेत नहीं है। देखना होगा िक आने वाले चुनावों में क्या परिणाम निकलता है पश्चिम बंगाल में ।

- बंगाल का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट,

 

अजित प्रसाद / सिलीगुड़ी: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय यानि ईडी के साथ जो टकराव देखने को मिला यह स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत में पहली बार देखने को मिला।प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कोलकाता में आठ जनवरी को हुई एक घटना को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की है।वर्तन निदेशालय (ED) ने दावा किया है कि हवाला के जरिये 20 करोड़ रुपये कोलकाता से गोवा स्थित इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) के दफ्तर तक पहुंचाया गया. ईडी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा कि इस पैसे को जानबूझकर छह अलग-अलग लेन-देन के जरिये घुमाया गया, ताकि उसके स्रोत को छिपाया जा सके. ईडी के मुताबिक, इस पैसे का इस्तेमाल गोवा विधानसभा चुनाव 2021-22 के दौरान राजनीतिक अभियानों की फंडिंग के लिए किया गया।

ईडी जैसी केन्द्रीय जांच एजेंसी के आई पैक पर छापे के दौरान ममता बनर्जी के वहां पहुंचने और आई पैक के सह संस्थापक के दफ्तर से हरे रंग की फाइल और हार्ड डिस्क उठाकर चल देने की घटना अपने आप में बहुत कुछ कहती है। इस टकराव से ममता बनर्जी की स्ट्रीट फाइटर के रूप में वापसी हो चुकी है। शायद तृणमूल कांग्रेस को ईडी के साथ टकराव में राजनीति लाभ दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी ममता बनर्जी को जोरदार तरीके से निशाना बनाना जारी रखे हुए हैं और उनका कहना है कि ममता बनर्जी ने जो किया वह दंडनीय अपराध है। आई पैक पर छापे के दौरान हुए घटनाक्रम को लेकर मामला अदालत तक पहुंच चुका है। ममता बनर्जी ने ईडी के अधिकारियों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर भी दर्ज कराई है तो दूसरी तरफ ईडी ने भी अदालत में ममता बनर्जी के खिलाफ याचिका दी है। अब फैसला अदालत ही करेगी।
अगर पश्चिम बंगाल की राजनीति का अतीत देखें तो ममता बनर्जी शुरू से ही सड़क की राजनीति करती आई हैं। ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी नेतृत्व है। वह सत्ता में रहते हुए भी आम लोगों के बीच रही हैं। धरना, पद यात्रा और सड़क पर उतर कर विरोध करना उनकी राजनीतिक शैली का अहम हिस्सा रहा है। व्यक्तिगत जीवन में ममता बनर्जी सादगी की मिसाल है। साधारण साड़ी, चप्प और बेहद सामान्य रहन-सहन उनके व्यक्तित्व को अन्य नेताओं से अलग बनाता है। सत्ता और वैभव से दूर रहकर जनता के बीच रहने का अंदाज उन्हें खास बनाता है। ममता बनर्जी ने सड़कों पर उतरकर चोटें खाईं और अपने सहयोगियों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जिसके चलते वो एक के बाद एक सफलताएं अर्जित करती गईं। मां माटी और मानुष के नारे पर राजनीति करने वाली ममता बनर्जी का जुझारूपन लोगों को काफी आकर्षक लगा।

बंगाल में दीदी कही जाने वाली ममता बनर्जी ऐसी नेता बनी जिसने भारत की सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों लैफ्ट, कांग्रेस और भाजपा को हराकर जीत हासिल की। ममता ने इसकी शुरूआत लेफ्ट पार्ट से की और उन्होंने 1984 में लोकसभा चुनावों में दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया। पश्चिम बंगाल में दशकों से चले आ रहे वामपंथी शासन को उखाड़ फैंकने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर में ऐसी सड़क की राजनीति की जिसके बल पर खुद को गरीबों की आवाज बताने का दावा करने वाले वामपंथी शासन को 2011 में सत्ता से उखाड़ दिया। पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के दौरान राज्य का औद्योगिक विकास रुक गया था। ज्योति बसु के जाने के बाद मुख्यमंत्री बने बुद्धदेव भट्टाचार्य ने औद्योगिक विकास शुरू करने के लिए इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप को निवेश के लिए बुलाया। टाटा को नैनो कार प्रोजेक्ट के लिए बुलाया, पर जनता से जमीन लेने की कोिशश डंडे के दम पर की गई। मुआवजा भी बराबर नहीं मिल रहा था। इसको लेकर जनता सड़क पर आ गई थी। वामपंथी सरकार ने दमन का सहारा लिया। धीरे-धीरे किसानों का आंदोलन राज्यव्यापी होता गया। नंदीग्राम, सिंगूर में धरना-प्रदर्शन अपने चरम पर पहुंच गया। गोलियां चलीं, हिंसा हुई। एक नाबालिग तापसी मलिक का रेप और हत्या हो गई।

ममता बनर्जी ने इस आंदोलन को युद्ध बना दिया और 26 दिन तक आमरण अनशन पर बैठी रहीं। इस आंदोलन के दौरान पश्चिम बंगाल की राजनीति का रक्त चरित्र भी सामने आया। आंदोलन सफल रहा और लेफ्ट की सरकार एक भी इंडस्ट्रीयल नहीं ला सकी। टाटा अपना कारोबार समेट कर गुजरात के सानंद में चले गए। तब गुजरात के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही थे। लेफ्ट के पांव तले की जमीन खिसक गई और उसे सत्ता गंवानी पड़ी। लेफ्ट को हराने के एक दशक बाद ममता बनर्जी ने एक टांग के सहारे भाजपा को हराया। वह भी तब जब भाजपा किसी भी क्षेत्रीय नेता के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि पश्चिम बंगाल में पिछले विधानसभा चुनावों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है और भारतीय जनता पार्टी ममता बनर्जी के लिए चुनौती बनकर उभरी है। ममता बनर्जी की सरकार में घोटालों की एक लम्बी लिस्ट भी दिखाई देती है।

सारदा चिटफंड घोटाला, पौंजी स्कीम घोटाला। नारदा स्टिंग कोयला तस्करी, राशन वितरण घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला आदि में पार्टी के कई मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। इन गिरफ्तारियों को ममता बनर्जी हमेशा बदले की कार्रवाई बताती रही और केन्द्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगाती रही। कई बार सीबीआई, ईडी जैसी केन्द्रीय एजेंसियां बंगाल पुलिस के बीच टकराव भी हुआ। टकराव तो राजभवन से भी खूब हुआ। फिर चाहे राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी रहे हों, जगदीप घनखड़ रहे हों या फिर सीवी आनंद बोस। ममता बनर्जी केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार पर बंगाल से भेदभाव का आरोप लगाती हैं। उज्ज्वला, पीएम आवास और मनरेगा जैसी केंद्र की तमाम योजनाओं के लिए फंड रोकने का आरोप लगाती हैं और कहती हैं कि मोदी-शाह किसी भी तरह से बंगाल को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं। वहीं, दूसरी तरफ राज्य की राजनीति में मुख्य विपक्ष की भूमिका निभा रही बीजेपी, ममता बनर्जी का चित्रण एक तानाशाह की तरह करती है।
2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बंगाल में आक्रामक चुनाव अभियान चलाया। टीएमसी के दिग्गज नेता और ममता बनर्जी के बेहद खास रहे सुवेंदु अधिकारी बीजेपी में शामिल हो गए। नंदीग्राम विधानसभा सीट पर सुवेंदु ने ममता बनर्जी को चुनौती दी और उन्हें हरा भी दिया। हालांकि, अपनी नेता की हार के बावजूद टीएमसी ने 2021 में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और 213 सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी के हिस्से 77 सीटें आईं। उधर लेफ्ट और कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। पश्चिम बंगाल का चुनाव बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव था और उसने इस नतीजे के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी और इसकी तैयारी भी काफी पहले से ही शुरू कर दी गई थी। लेफ्ट ने अपनी जमीन खो दी थी। सत्ता के साथ जो मशीनरी थी वह टीएमसी के साथ हो ली थी। ऐसे में विपक्ष के खाली स्पेस को बीजेपी ने तेजी से भरना शुरू कर दिया था।
भाजपा अब ममता बनर्जी के सिपहसलारों के सहारे हमलावर है। क्योंकि ममता बनर्जी के कई सहयोगी उन्हें छोड़ चुके हैं। ममता बनर्जी द्वारा आई पैक पर छापे के दौरान जो भी किया गया उसके कानूनी परिणामों से वह भी अवगत होंगी।

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