सीमांचल में सैन्य कैंप का शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन, चिकन नेक को लेकर बढ़ाई जा रही है सुरक्षा
अजित प्रसाद/ सिलीगुड़ी: पूर्वोत्तर के सीमांचल स्थित चिकन नेक की ओर पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन की पैनी नजर है। इसे भारत को अलग करने की साजिश हो रही है। इसकी सुरक्षा को लेकर भारत सरकार तीन सैन्य बेसकैंप लगाने का निर्णय लिया है। इसमें बिहार के किशनगंज, बंगाल के चोपड़ा और असम के धुबरी में कार्य शुरू हो गया है। इसको लेकर यहां के लोग स्वयं को सुरक्षित महसूस करते है वही इसका विरोध शुरू हो गया। विरोध प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा एजेंसी काफी अलर्ट मोड में है।
बिहार के किशनगंज जिले के कोचाधामन और बहादुरगंज अंचल के सीमा स्थित सतभीट्टा,सकोर और नटुआ पाड़ा मौजा में प्रस्तावित फौजी कैंप का किसानों ने विरोध जताया है। ।इसे लेकर गुरुवार को किसानों ने जिला पदाधिकारी किशनगंज, एडीएम किशनगंज और भू-अर्जन पदाधिकारी किशनगंज को आवेदन दिया है। पदाधिकारियों को दिए गए आवेदन में आसिफ अहमद, गुलाम मुस्तफा, इमरान आलम, अंजार आलम,मुमशाद आलम, मुजम्मिल हुसैन,सवीह अनवर, नाजिर आलम, मुनाजिर आलम,मंजर आलम, जूबेर आलम, आजाद हुसैन इत्यादि ने जिक्र किया गया है कि कोचाधामन अंचल अंतर्गत सतभीट्टा कन्हैयाबाड़ी, बहादुरगंज अंचल अंतर्गत नटुआ पाड़ा और सकोर मौजा अंतर्गत प्रस्तावित फौजी कैंप को लेकर ढाई सौ एकड़ जमीन अधिग्रहण हेतु प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उन्होंने कहा कि इससे सैकड़ों किसान भूमिहीन हो जाएंगे। उक्त जमीन पर यहां के छोटे छोटे किसान फसल उगा कर अपना एवं अपने बाल बच्चों का भ्रमण पोषण करते हैं। कुछ लोगों का इसी भूखंड पर घर द्वार, ईदगाह और कब्रिस्तान है।यदि जमीन अधिग्रहण किया जाता है तो सैकड़ों किसानों के समक्ष भूखमरी की समस्या उत्पन्न हो जाएगी। ऐसे में किसानों को पलायन करना पड़ेगा। किसानों ने केंद्र एवं राज्य सरकार से मांग किया कि जहां बिहार सरकार की जमीन उपलब्ध है वहां फौजी कैंप बनाया जाए। चिकन नेक यह गलियारा देश के सात पूर्वोत्तर राज्यों को मेनलैंड भारत से जोड़ता है। अब इसी कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर वर्षों से रणनीतिक चिंता बनी हुई थी। नए सैन्य बेस असम के धुबरी के पास लाचित बोर्फुकान मिलिट्री स्टेशन, बिहार के किशनगंज में फॉरवर्ड बेस, और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में तेजी से विकसित हो रहे है। यह सैन्य ठिकाने भारत की रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत हैं। यह बेस महज सैनिक चौकियां नहीं, बल्कि तेज़ तैनाती बलों, खुफिया इकाइयों और पैरा स्पेशल फोर्सेज से लैस रणनीतिक नोड्स हैं, जिनका उद्देश्य है सिलीगुड़ी कॉरिडोर को किसी भी स्थिति में असुरक्षित नहीं होने देना।बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा फेरबदल होने से भारत की यह रणनीतिक सक्रियता उभर रही है। शेख हसीना की भारत-हितैषी सरकार के स्थान पर अब मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम प्रशासन कार्यरत है, जिसकी विदेश नीति में चीन और पाकिस्तान की ओर झुकाव स्पष्ट है। रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश चीन से 2.2 अरब डॉलर के J-10C लड़ाकू विमान खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और ड्रोन निर्माण में भी बीजिंग के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। इसी बीच पाकिस्तान भी JF-17 ब्लॉक C थंडर लड़ाकू विमानों की पेशकश कर चुका है।
भारत के लिए यह बदलाव एक बड़ी रणनीतिक चुनौती के रूप में उभर रहा है। दोनों देशों की साझा सीमा अत्यंत संवेदनशील है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर उसकी सबसे कमजोर कड़ी होने से बांग्लादेश की स्थिति में यह झुकाव नज़र आता है। यह 22 किलोमीटर का गलियारा 4.5 करोड़ से अधिक भारतीय नागरिकों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। किसी भी अस्थिरता की स्थिति में यह क्षेत्र कटाव की स्थिति में आ सकता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गहन खतरा होगा।
इसी परिप्रेक्ष्य में बांग्लादेश सीमा से मात्र एक किलोमीटर दूरी पर स्थित चोपड़ा का फॉरवर्ड बेस है, जो विशेष महत्व रखता है। यह भारत को सीमा के उस पार तक गहरी निगरानी की क्षमता देता है और आवश्यकता पड़ने पर त्वरित सैन्य तैनाती सुनिश्चित करता है। इससे भारत की सीमा प्रबंधन और प्रतिरोध क्षमता में व्यापक बदलाव आता है। इसके साथ ही भारत ने अपने वायुसेना और मिसाइल शक्ति को भी मजबूत किया है। राफेल लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस मिसाइलें, और उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम इस क्षेत्र को साधारण प्रतिक्रिया आधारित रणनीति से हटाकर सक्रिय और प्रभुत्व आधारित रक्षा-सिद्धांत में परिवर्तित कर रहे हैं। शक्ति-संतुलन भारत के पक्ष में है और किसी भी प्रकार की गलत आकलन का उत्तर अत्यधिक सशक्त सैन्य प्रतिक्रिया से दिया जाएगा।

