मुंबई की लेखिका क्षमा राव से उनके शीघ्र प्रकाश्य कहानी संग्रह गिगल्स आफ बैलेंस के बारे में उनसे राजीव कुमार झा की बातचीत…
साहित्य: साक्षात्कार
प्रश्न: आप अपने इस कहानी संग्रह के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर: अक्सर कुछ अनजाने सामाजिक डरों की वजह से हमारे अपनों का बर्ताव और हमारे रिश्तों की डोर बदलने लगती है। मेरी किताब इन्हीं भावनाओं के मनोवैज्ञानिक सफर के बारे में है।
प्रश्न: आदमी के मन में जो भय व्याप्त रहता है उसे आप अनजाना कैसे कह रही हैं?
उत्तर : मैं इसे अनजाना इसलिए कह रही हूँ क्योंकि यह डर किसी बाहरी दुश्मन का नहीं है। यह वह डर है जो इंसान खुद अपने ही भीतर पालता है—जैसे समाज में अकेले पड़ जाने का डर, या दूसरों की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का डर। मेरी किताब इसी मानसिक उलझन को परत-दर-परत खोलती है, जिसे पाठक कहानियों के साथ खुद महसूस कर पाएंगे।
अपने आस-पास के परिवेश को करीब से देखकर और लोगों के व्यवहार को गहराई से महसूस करके ही मैंने अपनी कहानियों का यह ताना-बाना बुना है। इस किताब के ताने-बाने में महिला और पुरुष, दोनों ही किरदारों को बिल्कुल बराबर की अहमियत दी गई है।
प्रश्न: यहां इस किताब में जिन कहानियों को पढ़ने का मौका मिलता है उसमें क्या तमाम कहानियां एक ही विषय भय के आसपास केंद्रित हैं, या फिर इनमें विभिन्न प्रकार के विषयों का समावेश है?
जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सभी कहानियाँ एक ही ढर्रे पर चलती हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के विषयों का समावेश है—जैसे किसी कहानी में आपको सामाजिक रूढ़ियों से लड़ता हुआ एक युवा मन दिखेगा, किसी में अपनी जिम्मेदारियों और डरों के बीच संतुलन बनाता हुआ एक पुरुष, तो किसी कहानी में परंपराओं को अपने हौसले से चुनौती देती हुई एक महिला नज़र आएगी।
प्रश्न: इसमें आपने किस प्रकार के परिवेश में आदमी के जीवन और उसकी जिजीविषा के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उठाया है? मेरा आशय यहां कस्बाई शहरी और महानगरीय परिवेश से है। इसमें शामिल पात्र उच्चवर्ग के हैं या उनमें मध्यमवर्ग अथवा साधारण तबकों के लोगों का जीवन चित्रित हुआ है?
उत्तर: मेरी इन कहानियों का ताना-बाना मुख्य रूप से कस्बाई और मध्यमवर्गीय परिवेश के इर्द-गिर्द बुना गया है। मैंने जान बूझकर मध्यमवर्ग और साधारण तबके के किरदारों को चुना है, क्योंकि यही वह वर्ग है जो परंपराओं, सामाजिक उम्मीदों और अपने सपनों के बीच सबसे ज़्यादा पिसता है।
प्रश्न: अपनी कुछ कहानियों के उदाहरण से अपनी बात को स्पष्ट करें?
उत्तर: बिल्कुल, मैं अपनी एक कहानी के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करती हूँ।मेरी इस कहानी का परिवेश नर्मदा की घाटी का है, जहाँ अनिरुद्ध नाम का एक युवा किरदार है। वह जीवन की आपाधापी और हर काम में अंधाधुंध भागने की होड़ में लगा हुआ है। उसे लगता है कि अगर वह रुकेगा तो पीछे छूट जाएगा, और यही जल्दबाज़ी उसकी सबसे बड़ी मानसिक उलझन बन जाती है।लेकिन नर्मदा की शांत लहरों और वहाँ के परिवेश के बीच, वह ठहरने की अहमियत सीखता है। वह सीखता है कि लगातार अंधी दौड़ में भागने के बजाय, अपने कामों के बीच थोड़ा ठहराव लेना क्यों ज़रूरी है।
प्रश्न: आप अपनी कोई कविता यहां प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: यहां अपनी एक कविता मैं प्रस्तुत कर रही हूं –
ख्वाब और लाचारी
छोटे-छोटे सपने और कड़वी सच्चाई आँखों में उनके भी छोटे से सपने होते हैं,
चॉकलेट खाने और नए कपड़े पहनने के मन होते हैं।
जी करता है उनका भी गहनों से खुद को सजाने का,
पर वक़्त नहीं मिलता उन्हें बचपन मुस्कुराने का।
जब आता है हर महीने वो सहेली सा दर्द,
तो पैड्स खरीदने को भी पैसे नहीं होते हैं पास।
छुपाकर वो अपना दर्द, कपड़ों के टुकड़ों से काम चलाती हैं,
बीमारियों के साए में वो घुट-घुट कर दिन बिताती हैं।
घर चलाने की खातिर वो कड़ी धूप में जलती हैं,
कम उम्र में ही वो ज़िम्मेदारियों के बोझ तले चलती हैं।
बेबसी देखकर उनकी, कुछ लोग फ़ायदा उठाते हैं,
गरीब समझकर सब उनका शोषण कर जाते हैं।
अगर किसी को नया जीवन और सहारा देना है,
तो किसी गरीब घर की बेटी का हाथ थाम लो।
सँवर जाएगी उसकी दुनिया, मुस्कुरा उठेगा उसका कल,
ज़िंदगी भर तुम्हें उसकी सच्ची दुआएँ मिलेंगी हर पल।
इस कविता में एक गरीब लड़की के मन के द्वंद्व को दर्शाया गया है। जहाँ एक तरफ चॉकलेट, अच्छे कपड़े और सैनिटरी पैड्स जैसी बुनियादी चीज़ों के लिए उसके मन में मासूम ख्वाब हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीबी का भारी बोझ है। कविता दिखाती है कि कैसे कम उम्र में ही ये लड़कियाँ धूप में काम करने और समाज के शोषण का शिकार होने को मजबूर हैं। अंत में यह कविता एक खूबसूरत संदेश देती है कि किसी गरीब बेटी को सहारा देकर उसकी ज़िंदगी संवारना ही सबसे बड़ा पुण्य है।”
प्रश्न -जिन पात्रों के माध्यम से अपने अपनी कहानियों में कथा का ज्यादातर ताना-बाना बुना है, उसमें नारी और पुरुष इनमें किसकी प्रधानता है?
उत्तर: अपने आस-पास के परिवेश को करीब से देखकर और लोगों के व्यवहार को गहराई से महसूस करके ही मैंने अपनी कहानियों का यह ताना-बाना बुना है। इस किताब के ताने-बाने में महिला और पुरुष, दोनों ही किरदारों को बिल्कुल बराबर की अहमियत दी गई है।
प्रश्न:यहां इस किताब में जिन कहानियों को पढ़ने का मौका मिलता है उसमें क्या तमाम कहानियां एक ही विषय भय के आसपास केंद्रित हैं, या फिर इनमें विभिन्न प्रकार के विषयों का समावेश है?
उत्तर: जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सभी कहानियाँ एक ही ढर्रे पर चलती हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के विषयों का समावेश है—जैसे किसी कहानी में आपको सामाजिक रूढ़ियों से लड़ता हुआ एक युवा मन दिखेगा, किसी में अपनी जिम्मेदारियों और डरों के बीच संतुलन बनाता हुआ एक पुरुष, तो किसी कहानी में परंपराओं को अपने हौसले से चुनौती देती हुई एक महिला नज़र आएगी।
प्रश्न: इसमें आपने किस प्रकार के परिवेश में आदमी के जीवन और उसकी जिजीविषा के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उठाया है? मेरा आशय यहां कस्बाई शहरी और महानगरीय परिवेश से है। इसमें शामिल पात्र उच्चवर्ग के हैं या उनमें मध्यमवर्ग अथवा साधारण तबकों के लोगों का जीवन चित्रित हुआ है?
उत्तर: मेरी इन कहानियों का ताना-बाना मुख्य रूप से कस्बाई और मध्यमवर्गीय परिवेश के इर्द-गिर्द बुना गया है। मैंने जानबूझकर मध्यमवर्ग और साधारण तबके के किरदारों को चुना है, क्योंकि यही वह वर्ग है जो परंपराओं, सामाजिक उम्मीदों और अपने सपनों के बीच सबसे ज़्यादा पिसता है।
प्रश्न: अपनी कुछ कहानियों के उदाहरण से अपनी बात को स्पष्ट करें?
उत्तर: बिल्कुल, मैं अपनी एक कहानी के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करती हूँ। मेरी इस कहानी का परिवेश नर्मदा की घाटी का है, जहाँ अनिरुद्ध नाम का एक युवा किरदार है। वह जीवन की आपाधापी और हर काम में अंधाधुंध भागने की होड़ में लगा हुआ है। उसे लगता है कि अगर वह रुकेगा तो पीछे छूट जाएगा, और यही जल्दबाज़ी उसकी सबसे बड़ी मानसिक उलझन बन जाती है।लेकिन नर्मदा की शांत लहरों और वहाँ के परिवेश के बीच, वह ठहरने की अहमियत सीखता है। वह सीखता है कि लगातार अंधी दौड़ में भागने के बजाय, अपने कामों के बीच थोड़ा ठहराव लेना क्यों ज़रूरी है।
प्रश्न: आप कविता लेखन भी करती रही हैं। अपनी किसी कविता को प्रस्तुत करें –
उत्तर: मैं अपनी एक कविता शीर्षक ‘ख्वाब और लाचारी’ को प्रस्तुत कर रही हूं।
छोटे-छोटे सपने और कड़वी सच्चाईआँखों में उनके भी छोटे से सपने होते हैं,
चॉकलेट खाने और नए कपड़े पहनने के मन होते हैं।
जी करता है उनका भी गहनों से खुद को सजाने का,
पर वक़्त नहीं मिलता उन्हें बचपन मुस्कुराने का।
जब आता है हर महीने वो सहेली सा दर्द,
तो पैड्स खरीदने को भी पैसे नहीं होते हैं पास।
छुपाकर वो अपना दर्द, कपड़ों के टुकड़ों से काम चलाती हैं,
बीमारियों के साए में वो घुट-घुट कर दिन बिताती हैं।
घर चलाने की खातिर वो कड़ी धूप में जलती हैं,
कम उम्र में ही वो ज़िम्मेदारियों के बोझ तले चलती हैं।
बेबसी देखकर उनकी, कुछ लोग फ़ायदा उठाते हैं,
गरीब समझकर सब उनका शोषण कर जाते हैं।
अगर किसी को नया जीवन और सहारा देना है,
तो किसी गरीब घर की बेटी का हाथ थाम लो।
सँवर जाएगी उसकी दुनिया, मुस्कुरा उठेगा उसका कल,
ज़िंदगी भर तुम्हें उसकी सच्ची दुआएँ मिलेंगी हर पल।
इस कविता में एक गरीब लड़की के मन …


